भारत प्रेमी लेख़क रोबेर्ट आर्नेट से मिलकर

प्रकाशन :01-04-2010
लावण्या शाह

कुछ वर्ष पूर्व जब मेरी मुलाक़ात सुश्री रॉबर्ट आर्नेट से हुई तब मुझे मेरे पति दीपक जी और रॉबर्ट आर्नेट जी को मेरी सहेली श्रीमती शुभदा जोशी जी ने, उनके आवास पर, सांध्य-भोजन पर निमंत्रित किया था ।

अब, आप को एक बड़े मार्के की बात से अवगत करवा दूँ - अमरीका में अपने नाम को अक्सर संक्षिप्त करने का एक ख़ास चलन है, जिसके कारण थोमसन नाम के इंसान को टॉम और चार्ल्स को चार्ली या रॉबर्ट को बोब, तो रिचर्ड को रीक और वीलीयम को बील के संक्षिप्त नाम से पुकारा और पहचाना जाता है । ये बात मैं, एक दीर्घ अंतराल के अमेरीकी निवास और उससे जन्मे अनुभव के बाद ही जान पायी हूँ ।

जी हाँ, तो इसी बात से, कुछ याद आया क्या ?

अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति का पूरा नाम विलियम ही है पर वे "बिल क्लिंटन" के नाम से ही सुप्रसिध्ध हुए हैं और पूरा संसार उन्हें "बिल" के संक्षिप्त नाम से ही आज पहचानता है । अत: रॉबर्ट आर्नेट जी ने अपना परिचय कराते हुए हमें अपना नाम, अमरीकी रस्म के मुताबिक़ "बोब" ही बतलाया । बोब से मिलकर हमने ये जाना के वे एक सौम्य, शांत और मृदुभाषी व्यक्तित्त्व के धनी ' बोब' भारत देश के अनन्य पुजारी भी हैं । और हमें ये भी पता लगा कि वे भारत की कई यात्राएँ कर चुके हैं और आम भारतीयों से मिलजुल कर बेहद प्रसन्न होते हैं ।

रॉबर्ट का जन्म संपन्न परिवार में हुआ था ये बात भी मैं समझ पायी थी । हालाँकि उन्होंने अपने बीते जीवन के बारे में ज़्यादा खुलकर उस वक़्त बातें नहीं कीं थीं । उनके जीवन में ऐसी कौन सी घटना घटी होगी जिससे उनमे पश्चिम की जीवन शैली को छोड़ कर भारत के प्रति अदम्य आकर्षण और अपनत्व का भाव पैदा हुआ, ये मैं नहीं जानती थी । रॉबर्ट के जीवन से सम्बंधित कुछ तथ्य बाद में जान पायी हूँ ।

एम. ए., मास्टर्स की शिक्षा, इतिहास के विषय में, इन्डीयाना विश्व विद्यालय से प्राप्त की, जोर्जिया, तुलाने विश्व विद्यालय, लन्दन विश्व विद्यालय में शिक्षा लेने के बाद, 2 वर्ष अमरीकी सेना में सेवारत रहते हुए टर्की राज्य में कार्य किया । मेरीलैंड विश्व विद्यालय में पश्चिमी सभ्यता का इतिहास विषय का अध्यापन कार्य किया था । रॉबर्ट ने अपनी पुस्तक की भूमिका में एक ये प्रसंग भी लिखा है - जब वे किसी कला प्रदर्शनी देखने गये थे और किसी मित्र की बातों ने उन्हें भारतीय योग प्रणाली तथा इतिहास, भारतीय सभ्यता के प्रति सर्व प्रथम आकर्षित किया था । नतीज़न, रॉबर्ट ने भारत-यात्रा का निर्णय ले लिया था और प्रथम यात्रा में ही उन्हें भारत भूमि ने आकर्षित कर लिया ।

दूसरी यात्रा तक वे इस क़दर भारत के मोहपाश में बंध चुके थे कि उन्हें भारत ही अपना असली घर महसूस होने लगा और फिर भारतीय रंग ने पूरी तरह उनके व्यक्तित्व को बसन्ती रंग में भिगो दिया ।

आज जो रॉबर्ट का व्यक्तित्व सामने देखा, वही सच था जिसे, अमेरीकी अंदाज़ में कहें तो 'फ़ेस वेल्यू' यानी 'जैसा पाया वैसा ही' इस मैत्री भावना से, हमने भी रॉबर्ट जी की मित्रता को और उनके व्यक्तित्त्व को अपना लिया ।

मेरी मान्यता है कि जन्म-जन्मांतर में जब हम चोला बदलकर, बसन्ती रंग का चोला धारण कर लेते हैं तब हम सच्चे भारतीय बन पाते हैं और हमारी अंतरात्मा भींग उठती है - मेरा रंग दे बसन्ती चोला माँ ये रंग दे बसन्ती चोला । तो बोब का चोला भी विशुद्ध बसन्ती, भारतीय रंग में रंग उठा था और भारत की ओर खिंचा चला आया था ।

उन्हीं के शब्दों में, सुनिए - " जब मैं भारत पहुँचा तब मुझे भरपूर विश्रांति मिली । ऐसा लगा मानों मैं बहुत बरसों बाद अपने घर लौट कर आ पहुँचा हूँ ।"

मुझे एक अनमोल रत्न की तरह, एक चमत्कृत करनेवाली आभा लिए भारतीय संस्कृति की ज्योति से दमकता हुआ सा ही दिखलाई दिया ।

उनसे प्रथम बार भेंट हो रही थी सो, मैं उनके लिए एक छोटा सा चांदी का सिक्का ( बिलकुल चार आने के सिक्के जितना ) ले आयी थी, जिसपर श्री ठाकुर रामकृष्ण परमहंस देव की पावन छवि बिराजमान थी जिसे मैंने कुछ अरसे से संजो कर रखा था।

मैं ठाकुर रामकृष्ण देव को अपने गुरु मानती हूँ और इस नवागंतुक बाह्य रूप से परदेसी परंतु मन से सर्वथा भारतीय लेख़क को यही भेंट करना चाहती थी । रॉबर्ट महोदय ने मेरा अनुरोध स्वीकार करते हुए इसे सहर्ष स्वीकार किया और जो उन्होंने इसे, लेते वक़्त कहा वह रहस्यपूर्ण था ।

उन्होंने कहा - ' मैं, जोर्जिया प्रांत ( जो दक्षिण में है ) से आ रहा था तब सागर किनारे कुछ पल रूका था और सागर की उत्ताल तरंगों का नीला रंग मुझे अभिभूत कर रहा था और मैं अनायास श्री रामकृष्ण परमहंस देव को याद कर रहा था चूँकि, " राम और कृष्ण" दोनों ही हिन्दू धर्मानुसार, नील वर्ण हैं ..और आप श्री रामकृष्ण का मिलाजुला स्वरूप भगवान ठाकुर मेरे लिए भेंट स्वरूप ले कर आयीं हैं । लीजिये पहना दीजिये ..." और इतना कहकर वे एक भोले भाले शिशु की तरह मेरे सामने गर्दन झुकाकर बैठ गये ।

सच । ऐसा निश्छल स्वरूप , मैंने इससे पहले किसी वयस्क में पहले कभी नहीं देखा था । मैंने वह लोकेट उनके गले में पहना दिया और तब रॉबर्ट ने सहर्ष आभार प्रकट किया ।

बातचीत के दरमियान मेरा अनुमान शीघ्र दृढ निश्चय में बदल गया और मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँची कि ऊपर से शांत सौम्य सर्वथा साधारण दिखाई देनेवाले अमरीकी बोब वास्तव में असाधारण ज्ञानी हैं । आगे पता चला क्रिया-योग में भी उनकी काफ़ी पहुँच है ।

रॉबर्ट आर्नेट ने बच्चों के लिए एक सचित्र पुस्तक लिखी है - Finders Keepers, जिसके नाम का भावार्थ है - जिन खोजा तिन पाईयान । उनकी दूसरी पुस्तक है - भारत की छवि बेनकाब सी या अँगरेज़ी में कहें तो India, Unveiled

प्रस्तावना में रॉबर्ट आर्नेट लिखते हैं - " ये पुस्तक मैं आटोबायोग्राफी ऑफ़ अ योगी लिखनेवाले परम योगी योगानंद जी की स्मृति को तथा सदियों से भारत भूमि पर अवतरित होते उन संत महात्माओं को समर्पित करता हूँ, जिन्होंने दुनयावी प्रलोभनों का परित्याग करते हुए, आत्मोसर्ग करते हुए योग के उद्धारक व महाज्ञान की ज्योति को सर्व धर्मानुलाम्बी मानव समुदाय के लिए उजागर किया । जिसके फल स्वरूप हर आत्मा उस " एक " में, पुन: प्रस्थापित हो पायेगी । "

आशा है आपको श्रीमान रॉबर्ट आर्नेट से मिलना सुखद लगा होगा । भारत माता के कई ऐसे सपूत हैं जिनका जन्म भारत भूमि पर न हुआ तो क्या हुआ, इन्होंने कर्म भूमि भारत को ही माना और आत्मोसर्ग का संबल भी भारत भूमि से ही पाया और भारत भूमि की सुगंध को इन सपूतों ने विश्व व्यापी बना दिया । जीवन में मौसम का आना और जाना सुनिश्चित है परंतु जीवन पथ पर हमारा कब, किससे मिलना होगा ये सर्वथा अनिश्चित है । आशा करती हूँ कि जीवन यात्रा के किसी ख़ुशनुमा पड़ाव पर फिर दुबारा रॉबर्ट आर्नेट सरीखे , भारत माता के सच्चे सपूत से मुलाक़ात होगी ...तब तक शायद उनकी कोई नयी पुस्तक भी तैयार हो जाए, क्या पता....

हो निर्भय हे पथिक तेरा हर पग
चलता चल तू, न हों डगमग पग

  लावण्या शाह
यूएसए
ई-मेल- lavnis@gmail.com

  

 
         
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