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गैस
का सिलेण्डर
कृष्ण
कुमार त्रिवेदी
हम
‘गैस’
न जोड़ते तो भी आप आशय
समझ जाते क्योंकि अपने देश में या कम से कम हमारे
जैसे छोटे नगरों में जो सिलेण्डर सबसे अधिक चर्चा में है, वह गैस का
सिलेण्डर ही है, पर यदि सिलेण्डर के स्थान पर उसका हिन्दी पर्याय
‘बेलन’
लिख देते तो हिन्दी का कट्टर से कट्टर समर्थक भी आशय तक शायद ही पहुँच पाता
क्योंकि जिस बेलन की चर्चा सबसे ज्यादा होती है वह हे रसोई में रोटी बेलने
वाला और रसोई गे बाहर चाँद मारी करने (चाँद का अर्थ यहाँ बदली या घूँघटवाला
नहीं, पगड़ीवाला ही जानें) या करने के लिए उतावला रहने वाला
मिसाइनुमा, लगड़ी का बेलन । कोई भी कार्टून देखें जिसमें पली गुस्सा हो तो
उसमें बेलन जरूर होगा –कम
गुस्सा हो तो हाथ में और ज्यादा गुस्सा हो तो पति के सिर से टकराकर हवा में
उछलता हुआ । इनमें पति का सिर गंजा ही बनाया जाता है ताकि चाँद जैसा दिखे
और भरपूर वार का प्रतीक ‘गुलम्मा’
जरूर उमरता हुआ और किरणें बिखेरता हुआ दिखे । सिर गंजा न हो तो भी बेलन की
मारक क्षमता को कम नहीं आँकना चाहिए, ऐसा हमारे एक पंजाबी मित्र एक घटना के
माध्यम से बतलाया करते थे।
हमारे लिए यह तय कर पाना आज भी सरल नहीं है कि
घटना आपबीती थी
या परबीती ।
घटना यों थी कि एक सज्जन बाजार में बेलन खरीदने
गए और दूकानदार से बोले कि अच्छा से अच्छा बेलन दो । उसने दियातो फिर पक्का
किया, ‘मजबूत
है, न ?’
उने कहा, हाँ जी, टूट आए तो में दूसरा दूँगा । उसे लेकर उन्होंने अपनी
श्रीमती जी को दिया । शायद उसी दिन या अगले किसी दिन जाने किस कारण से
भडकी
पत्नी के. हाथ में वही पड़ा और उन्होंने भरपूर
जोर आजमा दिया तो न पति
महोदय की पगड़ी उसे झेल पाया, नही घनी केशराशि । खोपड़ी की प्रतिक्रिया
(न्यूटन का गति का तीसरा नियम आपने भी पढ़ा ही है ) मे था अपनी ही सफलता से
बेलन शिवधनु की भाँति
कठोर शब्द करके
'तड़ाक'
से टूट गया । पत्नी के हाथ में
केवल मूठ रह गई, बाकी बेलन छिटककर दूर जा गिरा । पति सिर थामकर बैठने ही
वाले थे कि पत्नी ने जोर से गाली देते हुए मूठ भी फर्श पर पटक दी,
‘दख
लो, अपने बेलन की मजबूती
जिसका बखान करते नहीं अधाते थे।’
यह सुनते ही पत्ति सारा दुःख-दर्द भूल गए और बेलन के दोनों टुकड़े लेकर
दूकानदार के यहाँ पहुँचे । भाई साहब ,यह तो टूट गया ।’
‘कैसे
? ’
बड़ा
आश्चर्य हुआ दूकानदार को।
इस
अशोभनीय प्रश्न के लिए वे तैयार नहीं थे फिर
भी सँमलकर और कुछ सकुचाहट के साथ उन्हेंने हाल-ए- सिर कह सुनाया । दूकानदार
भी जवाँ दिल मर्द था । उसने
उन्हें दो बेलन दिए- एक बदले का दूसरा इनाम का। यह मित्र भी नही बतला पाए
कि इनाम पत्नी के शौर्य के लिए था या पति के धैर्य के लिए ।
यह
तो रही सिलण्डर और बेलन के बीच के तात्विक भेद की बात, अब फिर अपने
सिलेण्डर पर लौटते हैं । यह सिलेंडर हर घर की मूलभूत आवश्यकता है । इसके
बिना न चूल्हा चल सकता है, न पेट में कूदने वाले चूहों का आतंक समाप्त हो
सकता है और न ही घर में शांति रह सकती है क्योंकि तब एक
–
दूसरे पर दोषारोपण होगा-गैस जल्दी खत्म कर देने का, सिलेण्डर देखकर न
लाने का, समय पर सूचना न देने का, गैस लाने में हीला-हवाला करने का आदि,
आदि। इस व्यापक गृह-युद्ध-विराम गैस का सिलेण्डर ही कर सकता है। पर
युद्ध-विराम स्थायी कहाँ होते हैं
!
गैस की लाँ के सुर्खरू होते ही सबके चेहरों के रंग उड़ने लगते हैं, समूची
प्रक्रिया की निष्ठुर पुनरावृति की बर्छी अपनी ओर बढ़ती देखकर । गैस को हार्ट अटैक पड़ा नहीं कि सबके
रक्त-चाप असामान्य हो गए । यह असहज स्थिति कब उत्पन्न हो जाए, अनुमान लगाना
कठिन है, और अब तो और भी
अधिक क्योंकि पहले पानी केवल दूध की मात्रा
बढाता था, अब वह गैस की भी मात्रा बढ़ाने लगा है - कभी-कभी कहो आधा सिलेण्डर पानी से
ही भरा हो (जिसे लाते समय आप मुकुलित हुए होंगे कि
‘आज
बढिया भरा सिलेण्डर मिला !
गैस के
छूमंतर हो जाने पर जब आप सिलेण्डर को हिलाते हैं तब पता चलता है कि असली
भारोत्तोलक तो जलदेव थे जो विक्रेता के ही काम के होते हैं, क्रेता के भाग्य
पर तो वह पानी ही फेरते हैं ।
गैस का सिलेण्डर लेने आप भी जाते ही होंगे (भले ही लौटते खाली हाथ हों । )
जाने का सौभाग्य न मिल हो तो कभी सबेरे के आसपास गैस-
गोदाम के दर्शन करें । वहाँ पहुँचने पर आपको स्वयं पर बड़ी ग्लानि होगी कि
अब तक आप इतने नयनाभिराम दृश्य से वंचित रहे थे। सिलेण्डरों से आबाद
गैस-गोदाम पर आपको दिखेंगे भाँति
भाँति के चेहरे - गैस लेने जा रहे उत्सुक, देर से
लाइन में खड़े प्रियजनों को अवकाश देने जा रहे परोपकारपरायण, लाइन के ही
पंछी अलमस्त प्रतीक्षारत जिज्ञासु, देर से पहुँच रहे आशंकित, अजगरी लाइन की
पूँछ बने असहाय, धक्के दे-देकर लाइन को जिंदा बनाए आतुर,
सबकी ईर्ष्या के
आलम्बन बने शीर्षस्थ धैर्यवान, उनके थोड़ा पीछे आशावान,---पूर्णकाम
होकर लौट रहे प्रफुल्ल, आशान्वित उत्साही, निराश लौट रहे उदास, अनेक बार के
निराश खीझे, व्लैक का सहारा ले रहे जुगाड़ी,------ओर सुनाई पड़ेंगे
पंक्तिबद्ध प्रतीक्षकों के भाषा-शक्ति-वर्द्धक बहुआयामी
वार्तालाप,--------।
पर
सबसे ज्यादा मजेदार लगेंगे स्वयं गैस वाले । आप जानते ही हैं कि सार्वजनिक
वितरण प्रणाली का सूत्र सर्वथा सहज नहीं है । नीचे से ऊपर तक अथक परिश्रम
करके प्राप्त हुई एजेंसी दूसरे के श्रम में कटौती कैसे कर सकती है
!
अब, गैस कोई लकड़ी तो है नहीं कि हर टाल पर और हर समय उपलब्ध रहे, न मिट्टी
का तेल ही है कि कोटे के बाहर भी मिल जाए । वह तो अपनी एकलौती एजेंसी के
मातहत है ओर एजेंसी का कर्मचारी दूसरे का ताबेदार क्यों होने लगा
?
उनका मन
आये तो गैस देंगे न मन आये तो गैस से भरा हुआ ट्रक ही वापस कर देंगे । वापस
न भी किया तो उसकी ओर मुखातिब ही नहीं होंगे जो वह अपने आप और कहीं चला
जाएगा । फिर जब ब्लेक का बाजार गर्म हो तो आती हुई लक्ष्मी को आने से कौन
रोकेगा ?
और लक्ष्मी की यह अतिरिक्त कृपा तभी संभव है जब माँग-पूर्त्ति के शाखत
अर्थशास्त्रीय नियम को एक भारी
झटका देकर असंतुलित बनाए रखा जाए । तब ऐसी
मारा-मारी मचेगी कि कमजोर दिल वाला ग्राहक प्राणरक्षा को प्राथमिकता
देगा-जान रहेगी तो बहुत गैसे मिलेगी, जान ही न रही तो गैस किस काम की
!
इसके बावजूद सिलेण्डरों की संख्या कम होने के स्थान पर गुणोत्तर श्रेणी में
बढ़ती ही जाती है- हमारे नगर में (आपके यहाँ हो सकता है ओर भी गुणात्मकता
हो) जितने सिलेण्डर दिए गए होंगे, उनसे कहीं अधिक सिलेण्डरों हर दिन गैस
एजेंसी के द्वार पर जश्न पर जश्न मनाते रहते हैं घरों में उनके आधे तो
होंगे ही । हम आज तक नहीं समझ पाए कि ये अतिरिक्त सिलेण्डर रहाँ से आते हैं
। कहाँ चले जाते हैं और दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि कैसे करते जाते हैं ।
सिलेण्डर –प्राप्तिऔर
पारिवारिक सौहार्ड में सीधा समानुपात होता है । पर समस्तया पति के सामने
ज्यादा रहती है –गैस
लेने जाए तो गैस दूर रही, सिलेण्डर ही सकुशल वापस ले आए तो बहुत है, ओर न
जाए (अर्थात –पत्नी
को मेजे) तो गृह-कार्य और भी अधिक कष्टप्रद है । और फिर नज़ारा देखने से
चूको, वह ्लग से । दोनों का दूःख कम करने के उद्देश्य से दुहरे सिलेण्डरों
का विधान बना(ताकि फुर्सत से भराया जा सके और चूल्हा बंद होने की नौवतन
आए), पर उसका भी लाभ पहुँच वालों को ही मिला । बाकी को टालू मिक्स्चर ही
मिलता रहा । ) वैसे दुहरा सिलेण्डर पाने में अक्षफल रहने वालों को यह सोचकर
सांत्वना प्राप्त करनी चाहिए कि यदि उनके पास दो सिलेण्डर हो भी जायें तो
स्थिति उनके लिए सुखद न होकर दुःखद ही रहेगी क्योंकि तब कोई भी
‘अंतरंग’आ
धमकेगा तो वह आपसे सिलेण्डर भराने को थोड़े न कहेगा । वह तो खाली सिलेण्डर
आपको टिकाएगा और भरा लेकर चलता बनेगा,
‘भरा
लेना, खाली ही तो रहते हो !
कोई ज्यादा ‘अंतरंग’
हुआ तो रहो पैसे भी न दे जाए । ओर ऐसे अंतरंगों की कोई कमी थोड़े होती है ।
अब आप ही बतलायें कि दूसरो के लिए ही सिलेण्डर भराते रहना किस कोटि का सुख
है !
पुलिस के महान योगदान के उत्कृष्ट उल्लेख के बिना कोई भी प्रकरण पूरा नहीं
हो सकता, यह आप स्वयं जानते हैं । यह सार्वजनिक कार्य तो पुलिस का और भी
ज्वलंत कीर्तिमान स्थापित करता है । भरे सिलेण्डर उतर वाने से लेकर खाली
सिलेण्डर लदवाने तक पुलिस की व्यवस्था अनिवार्य होती है (नहीं तो बीमा
कम्पनियों के भी फेल हो जाने की नौबत आ जाए), पर यह परोपकार कोई कब तक
निःस्वार्थ करेगा । एकाध सिलेण्डर तो छोटा-मोटा सिपाही भी ले जाएगा, फिर
अधिकारियों का क्या कहना !
वे तो जब चाहें और जितने चाहें,
उन्हें मिलेंगे ही । और अधिकारी कहीं पुलिस का अधिकारी हो तो सोने में
सुहागा ही मानिए क्योंकि कानून के वे ही मालिक हैं, वे जो करें वही कानून है । वे तो केवल कहला देंगे कि इतने सिलेण्डर
चाहिए और इतने बजे तक । वे न पहुँचे तो दो-तीन पुलिस वालों को बोल दिया, पर
बोल दिया का अर्थ पैसा देकर भेज दिया कहाँ होता है
!
बस बोल दिया । अब वे पास से पैसा देंगे या खाली हाथ लौट आयेंगें
?
ऐसे में उनके सामने बकरी-जैसे
मिमियाते और उनकी हर इच्छा की सवाई पूत्ति के अतिरिक्त एजेंसी-मालिकों के
पास क्या विकल्प हो सकता है ?
पर वे घाटे में क्यों रहेंगे !
वे
तो एक-एक आघात की मनचाही पूर्ति करेंगे - दो सिलेण्डरों के तीन करेंगे, मन
आए तो कहो तीन के सात कर दें, भारोत्तोलन के लिए जलदेव हैं ही और उसके बाद
भी सिलेण्डर ड्योढ़े-......... दूने दामों पर बेचेंगे । अब कोई कसर रह गई
गया ?
भीड़ भड़की तो लाठी या गोली-चार्ज कराकर भगदड़ मचवा दी
। और आप जानते ही
हैं कि भगदड़ में खोए सिलेण्डर क्या आदमी तक को लोग खोजते ही रहते हैं
!

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