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अज्ञेय
जैसा सुदर्शन और शालीन व्यक्तित्व का कवि मैंने अब तक नहीं देखा था,
शोध प्रबंध की सामग्री जुटाने अक्टूबर 1975 के पूरे महीने मै दिल्ली
प्रवास पर था। जवाहर लाल ने
शाम को मैने अज्ञेय जी के यहाँ फोन लगाया। इलाजी ने फोन उठाया मैने पूछा अज्ञेय जी है ? उन्होंने प्रतिप्रश्न किया –आप कौन हैं ? मैंने कहा –छत्तीसगढ़ से बलदेव । आदरणीय से मिलना है। उन्होंने दूसरा प्रश्न किया - आप किस प्रयोजन से मिलना चाहते है, मुझे जरा रंज हुआ । मैने कहा आपसे मैने अज्ञेय जी हैं या कि नहीं पूछा, क्या आप बतला सकती है ? ऊंची आवाज सुनकर उन्होंने बड़ी विनम्रता से जवाब दिया- नहीं है, बाहर गये हैं । कब तकर लौटेगें ? रात तक । उन्हें बता देने का कष्ट करें, उन से ही मै मिलने आया हूँ । उन्होंने कहा आप कल दस बजे आ जाइये आपके आने की बात उन्हें मालूम है और यह समय उन्होंने ही दिया हुआ है।
कनाट- प्लेस में रात को आदरणीय विष्णु प्रभाकर, डॉ. विनय, सुधांशु आदि से इंडियन कॉफी हाउस में भेंट हो गयी । बाहर टेबिल से मैंने युग-परिबोध नामक एक पत्रिका उठाई, इसे रमेश उपाध्याय ने देख लिया । भाई साहब,युग-परिबोध हमारी ही पत्रिका है, एक प्रति आप रख लें । इसके बाद हम दोनों विष्णु प्रभाकर जी के अगल-बगल बैठ गए । नई कहानी पर जमकर चर्चा हुई, फिर सुधांशु जी ने छेड़ दिया-आपको चौथे सप्तक में लिया जा रहा है। मैने अनभिज्ञता प्रकट की तो वे थोड़ा मजाक के मुड़ में आ गए । बोले आप तो नया प्रतीक में छप चुके है। बातचीत के दौरान मालूम हुआ कि इलाजी अज्ञेय जी की धर्म पत्नि हैं। सोचा इसीलिए वे साधिकार पूछ रही थी मैं भी ठसके से जवाब दे रहा था, उसका भी कारण था। अज्ञेय जी मुझे नया प्रतीक के दूसरे ही अंक में छाप चुके थे और उस कविता (साँवला दिन) की काफी चर्चा भी हुई थी । प्रख्यात आलोचक नेमीचंद जैन ने पूर्वग्रह के दूसरे अंक में तीखी आलोचना कर उसे बहुचर्चित कर दिया था, उन्होंने कविता की कम अज्ञेय जी के ‘शौक’ की अधिक खिचाई की थी, आशय था अज्ञेय जी कहाँ-कहाँ से ‘प्रतिभाओं’ की खोज करते हुए अपनी “सुरुचि” का परिचय देते रहते हैं। अज्ञेय जी से मेरा पत्र व्यवहार था, इसलिए मेरी गर्वोक्ति भी स्वाभाविक थी।
दूसरे दिन मै टैक्सी लेकर गोल फील्ड जा पहुँचा । पास ही अज्ञेय जी का बंगला था । फेंस के बीच निकला रास्ता पारकर लॉन पर पहुँचा, देखा एक छरहरी वदन की ऊंची पूरी नारी आभूषणों से लदी लक्ष्मी की प्रतिमूर्ति सी द्वारा पर खड़ी है । मुझे देखते ही उन्होंने पूछा –बलदेव जी हैं न, आइए आइए । इस आवाज और उस आवाज में काफी फर्क था। ड्राईंग रुम में ले जाकर बोली, आप बैठिए मै अंदर ख़बर करती हूँ, मैने देखा अज्ञेय जी का ड्राईंग रुम बेशकीमती उपहारों, प्रतीक चिन्हों से दमक रहा था। तीन और दीवारों से सटी हुई भारी भरकम आलमारियाँ थी, जिसमें पुरानी किताबें और फाइलें करीने से सजी हुई थी। दो-तीन मिनट बाद ही अज्ञेय जी प्रकट हुए । पहली ही झलक में मंत्र मुग्ध उन्हें देखता रहा गया मैं । देखा अलाव में औटे दूध सा प्रशान्त मुखमणडल, ट्रीन की हुई सुफैद दाढ़ी, शीतल प्रकाश फेंकती चश्मे के भीतर से झांकती आँखे, सर से पांव तक शुभ्रवसन, भरे पूरे देव पुरुष अज्ञेय जी, अत्याधिक विनम्रता से बोले- बैठिए, मैंने उनके पैर छुए, उन्होंने मस्तक पर हाथ रखकर आशीष दिया, बोले - बैठिए । लगा पूर्व जन्म के पुण्य प्रकट हो रहे हैं, उन्होंने कुशलक्षेम पूछा । मैंने कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए कहा –आपकी बड़ी कृपा है, आपने मुझ जैसे नये कवि को नया प्रतीक में स्थान देकर काफी उत्साह बढ़ाया है, मैं उसके लिए ध्न्यवाद ज्ञापन करता हूँ । अज्ञेय जी ने बड़ी शालीनता से कहा –आपकी कविता में मुझे कुछ नयापन दिखा, मैंने छाप दिया, इसमें अहसान जैसी कोई बात नहीं । उन्होंने दिल्ली आने का कारण पूछा । मैंने कहाँ हिन्दी के आप जैसे विद्वानों से मिलने ही आया था । आदरणीय डॉ. नगेन्द्र जी मिल से चुका हूँ, उन्होंने अपनी निजी लायब्रेरी पहले देख लेने को कहा, इन दिनों पं. भागीरथ मिश्र जी भी उन्हीं के यहाँ रूके हुए हैं । तीन दिनों के बाद वे मुखातिब हुए । आशय जाना और उन्होंने मुझे डा. निर्मला जैन के पास भेज दिया । उन्होंने काफी समय दिया, उन्होंने अपने आफिस में बैठाकर मुझे अनेक प्वाइन्ट लिखाये। निर्मला जी से भी पूर्व में मेरा पत्राचार हुआ था, और उन्होंने पत्र से उत्तर देने को अव्यवहारिक बतलाया था, इसलिए भी मुझे दिल्ली आना पड़ा ।
अज्ञेय जी बहुत कम बोलते थे, सुनते थे, वे बड़ी शालीनता से बीच –बीच में एक दो वाक्य ही बोलते थे। सहसा ही मैं मुख्य प्रयोजन से हटकर, अपनी उत्सुकता न दबाने के कारण पूछ पड़ा –पूर्व ग्रह ने तो पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर नया प्रतीक पर कड़ा प्रहार किया है, आपने देखा है क्या ?
उसमें देखने जैसी बात ही क्या है ? नेमीचंद जी विद्वान आलोचक हैं, जो लिखा होगा ठीक ही लिखा होगा, अज्ञेय जी की वाणी संयंत और संक्षिप्त थी, मैंने कहा-मैंने उसका कड़ा जवाब भेजा है, लेकिन पूर्वग्रह उसे शायद ही छापे । अज्ञेय जी चुप रहे, उनके प्रशान्त चेहरे पर कोई भाव नही उभरा उन्होंने मेरी बात पर कोई दिलचस्पी न लेते हुए पूछा-आपका विषय क्या है ? मैंने कहा –आख्यानक प्रगीत काव्य, रायपुर औऱ सागर विश्वविद्यालय में कोई विशेष सामग्री नहीं मिली, तो इधर आना पड़ा ,उन्होंने फिर पूछे आपने विषय क्या बतलाया । मैंने दुहराते हुए कहा-उसमें असाध्य वीणा,राम की शक्ति पूजा तथा प्रलय की छाया की मुख्य रूप से विवेचना है। मैंने असाध्य वीणा के अख्यान में प्रगीत तत्व की चर्चा की तो अज्ञेय जी ने उसकी विशिष्ट लय की बातें बतलायीं । बीच-बीच में मैं असाध्य वीणा की कुछ पंक्तियों की चर्चा कर लेता था । खासकर इस पंक्तियों पर अज्ञेय जी अधिक सजग हो गए । ओ शरण्य/मेरे गूंगेपन को तेरे सोये स्वर सागर का ज्वार डुबा ले/ आ मुझे भुला तू उतर बीन के तारों पर अपने से गा / अपने को गा /अपने खग कुल को मुखरित कर लय पर /अपने जीवन-संचय को कर छन्द युक्त अपनी प्रज्ञा को वाणी दे /तू सन्निधिपा-तू खो/तू आ/तू हो/ तू गा तू गा...
अज्ञेय जी मुखर हुए “हाँ यह महामौन के साथ एक संवाद ही हैं” महाशून्य/ वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय /जो शब्द हीन / सब में गाता है ।” अज्ञेय जी से ये पंक्तियाँ सुनते हुए मैं अपार शान्ति का अनुभव कर रहा था। पूछने का उद्वेग एक प्रकार से समाप्त प्राय था। जब मैंने प्रगीत शब्द पर उनकी टिप्पणी चाही तो उन्होंने मैथिलीशरण जी की कई रचनाओं को सुनाकर, उसमें अबाधित लय की बात कही, मैंने कहा, गुप्त जी की रचनाएँ तो वस्तुमुखी हैं, उनमें वैयक्तिकता की कमी है, अस्तु क्या उनकी लघु आकार के खंडकाव्य जैसे –रंग में भंग, विकट भट्ट बकसंहार को आख्यानक प्रगीत की श्रेणी में ले सकते हैं ? तो अज्ञेय जी बोले आप उनका पंचवटी काव्य क्यों नहीं देखते, देखिए उसमें अबाधित लय के साथ ही वैयक्तिक चेतना अधिक मुखर हुई है, और उसमें निहित प्रगीत तत्व को विस्तार से उन्होंने समझाया । इलाजी आतिथ्य सेवा में लगी हुई थीं, डँटकर नाश्ता के बाद काफी लेते हुए मैंने असाध्य वीणा के कई स्तरों की चर्चा की तो उन्होंने कहा-आपने असाध्य वीणा को खूब पढ़ा है। उत्साहित होते हुए अपना लेख जो असाध्य वीणा पर केन्द्रित था मैने उन्हें दिखा दिया । कुछ पंक्तियों पर उन्होंने दृष्टि डाली फिर सरसरी निगाह सें देखते हुए कहा-आपने खूब मेहनत की है, आपका लेख संतोषंप्रद है। खूब लिखते रहिए यह काम आप जल्दी पूरा कर लीजिए-कृतज्ञता से मैं भर चुका था, बोला - पंडित जी आपका बहुत समय ले लिया है, क्षमा करेंगे । चल रहा हूँ, हम दोनों बैठक से उठ गए । अज्ञेय जी और इला जी लॉन तक छोड़ने आए । इला जी ने मुझे नमस्कार किया और एक वार फिर अज्ञेय जी के मैने चरण छुए और आगे बढ़ गया ।
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आशा वह शक्ति है जिसका संचय किया जाना चाहिए। - जून डट्टन |
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