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।। अपने समय के महत्वपूर्ण लेखकों की आलोकित रचनाएं ।। |
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साहित्य
बुनियादी तौर पर मनुष्य को केन्द्र में
रखकर आगे बढ़ने से सरोकार रखता है और अगर साहित्य का केन्द्र मनुष्य नहीं
तो वह कुछ और भले हो, सहित्य नहीं हो सकता ।
विचार ग्रहण लेखक की पसंदगी नापसंदगी पर निर्भर रहता है और इसके लिए वह स्वतंत्र है । यदि विचार के अनुरुप बचपन से उसका आचरण नहीं रहा और तात्कालिक स्वार्थ या फौरी चमक में वह किसी कैम्प में उसका अनुयायी बन भी जाता है तो उसमें यह थोपा हुआ, नैसगिक नहीं और वह लेख कभी बड़ी रचना नहीं दे पाएगा, कुएं का मेढक हो जाएगा। नोबल पुरस्कृत चीन के रचनाकार गाओ शिंग च्यान द्वारा नोबल समारोह के अवसर पर अपने वक्तष्य में कही गई ये पंक्तियाँ गौरतलब हैः- “मैं यहाँ कहना यह चाह रहा हूँ कि साहित्य व्यक्ति की केवल आवाज़ भर हो सकता है. और सर्वथा ऐसा ही हुआ है। एक बार यदि साहित्य को राष्ट्र का भजन, जाति की ध्वजा ,राजनीतिक दल का प्रवक्ता या किसी वर्ग अथवा समूह विशेष का मान लिया जाए तो यह प्रचार का एक सशक्त एवं सर्वग्रासी यंत्र मात्र बन कर रहा जाएगा ऐसा साहित्य किन्तु अपनी विशेषता खो देता है। वह साहित्य नहीं, सत्ता और लाभ का अनुकल्प बन कर रहा जाता है ।”(वागर्थ, सहस्त्राब्दी स्वागत अंक, 2001 ,पृष्ठः 8)
शिंगच्याँन की ये पंक्तिया साहित्य के सार्वत्रिक और सार्वदेशिक संदर्भ में सौ फीसदी सच है । इसलिए भी कि मनुष्य की आवाज सार्वत्रिक हैं । साथ में, बावजूद इसके यह रूद्धश्वास चिंता सद्य-समाप्त शती में रही कि साहित्य को इसी दुर्भाग्य का सामना करना पड़ा । विचार की भूमिका तो बहुत बाद में कहीं शुरू होती है साहित्य में प्रारंभिक बिन्दु आत्मालाप है । शिंगच्यान का विचार है कि ‘लिखते वक्त उपयोगिता का विचार तक नहीं आता, न ही यह ख़याल आता है कि यह कभी प्रकाशित भी होगा या नहीं फिर भी लेखन एक बाधा है क्योंकि यह लेखन सुख प्रदान करता है।’ लेखन में अपने अनुभव के आधार पर जो धारणा शिंगच्यान की साहित्य के बारे में बनी वह अनुकरणीय है-” साहित्य मनुष्य के अंतर्मन में निहित भाव की अभिव्यक्ति है जो लेखन के समय अभिपुष्ट होती है। साहित्य का जन्म प्राथमिक तौर पर दरअसल लेखक की आत्म–पूर्णता इच्छा से होता है। समाज पर उसका कोई प्रभाव है कि नही यह रचना की पूर्णता के बाद की बात है और यह प्रभाव निश्चित रूप से लेखक की इच्छाओं द्वारा तय नहीं है ।
लेखन में आचरण की शुद्धता लेखन की में पहली शर्त है । सर्वहारा की बात करने के लिए जरूरी है कि उसने सर्वहारा लेखक स्वयं सर्वहारा रहा हो या सर्वहारा के बीच रहकर उनके जीवनानुभवों में साझीदारी की हो । दलित लेखन के लिए भी यह नियम उसी तरह लागू होगा या किसी अन्य वर्ग लेखन विशेष के लिए भी । अतिबौध्दिकता के शगल में समकालीन वायुमान के अनुसार किसी साँचे में खुद को ढालने की कोशिश एक नकली मनुष्य बनाकर रख देती है। इस नकली मनुष्य के शब्दों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उसके शब्द चाहे तात्कालिक रूप से कितने ही चमकदार लगते हों उनकी उम्र तत्काल तक ही होती है, काल में भी नहीं, काल के पार तो हो ही नहीं सकती। इसका मूल उस ओढ़ी हुई संवेदना में है जिसका प्रयोजन कुछ आनन–फानन में पा लेना है, देना नहीं । साहित्य का काम कुछ लेना नहीं है, देना ही देना है, खुद को होम करना है। लेने की वृत्ति तो वणिक -वृत्ति है साहित्य की मूल प्रवृत्ति नहीं । इसलिए नैसर्गिक संवेदना जो जन्मजात मनुष्य में रहती है उसे बचाए रखना बहुत बड़ी चुनौती है, जो इसे बचा लेता है वही लेखक आचरण की शुद्धता अपनाते हुए संवेदना में शब्दों की भिगोकर कुछ ऐसा अप्रतिम रच पाता है जिसकी महक काल में और दिक्काल में बनी रह पाती है । किसी विचार की पीठ पर लदी ऐसी रचना विरल ही होगी जो काल और दिक्काल में उपस्थित रह पाई हो। इससे विचार की कहाँ, कब कितनी होनी चाहिए यह स्पष्ट हो जाता है । जब तक जीव अपने प्राण में अपने सरोकार नहीं महसूस करता तब तक विचार धोखे की टटिया ही है। यह एक सहायक (हैल्पर) हो सकता है, सर्वेसर्वा नहीं । झंडे, डंडे के साथ चला विचार तात्कालिक लेखन करवा सकता है, सृजन नहीं । क्योंकि सृजन लेखन से बहुत बड़ी चीज है। लेखन मर सकता है सृजन अमर रहता है।
शब्द का संवेदना में भीगंना होता कैसे है ? यह भी एक नैसर्गिक प्रक्रिया के अनुसार होता है । साहित्य का उद्रेक करूणा से होता है। करूणा अपने आप में स्वायत्त नहीं है । करूणा का उद्रेक प्रेम से होता है। अगर प्रेम है तो वहाँ करूणा होगी ही । यह प्रश्न ऊपरी तौर पर उत्पन्न हो सकता है कि कई अवसरों पर प्रेम के विपरीत क्रोध और घृणामें भी करुणा निहित रहती है । ऐसे प्रसंग में यह जानना चाहिए कि अततः यह एक विरुध्द संयोग है, एक शोषित पीड़ित पात्र के प्रति क्रोध से घृणा जन्म लेती है । कालान्तर में यदि शोषक और प्रताड़न पात्र भी मनुष्यता के उच्च स्तर को प्राप्त कर लेता है तो उसके प्रति भी प्रेमका प्रस्फुटन संभव होता है । प्रेम वहाँ उत्पन्न होता है जहाँ दाता और ग्राही दोनों मनुष्यता के उच्च स्तर पर अपस्थित होते हैं । ऐसे तादात्म्य में जब प्रेम, करुणा का प्रक्षेपण करता हो और शब्दों में सनकर बहता है तब वह शब्द संवेदना में भीगा होता है । इस तादात्म्यीकरण में दाता-ग्राही का रिश्ता औपचारिक हो या अनौपचारिक हो गहरी संवेदना में पगा होता है । ऐसे में दाता का और ग्राही का हर शब्द नैसर्गिक संवेदना का उदाहरण बनता है, वहीं बनावट के षब्दों में वह बात आ नहीं सकती । यही वे शब्द होते हैं जिन्हें साहित्य में जिया और भोगा हुआ कहा जाता है । ये शब्द जब सृजन-समाधि में साहित्य का रुप धारण करते हैं तो देर तक और दूर तक जीवित रहते हैं । सिर्फ भाषा , शैली, प्रयोग और प्रतिबध्दता का खाद पानी देकर रचना-उत्पादन तो बढ़ाया जा सकता हे लेकिन इस खाद-पानी मे पैदा साहित्य की फसल समाज को अपने विषाणु भी सौंपती है । इसके बहुत साइड इफैक्टस होते हैं, जबकि नैसर्गिक संवेदना मे उत्पन्न भाषा शैली, प्रयोग और प्रतिबध्दता से सृजित रचना समाज के विषाणुरहित स्वस्थ और दीर्घायु- जीवन का सबब बनती है इसलिए यह कभी अप्रासंगिक हो नहीं सकती, जबकि बनावटी उत्पादन के तहत होने वाला लेखक उसके बाजार बंद होने के साथ ही ज़मीदोज़ हो जाता है । विचारधारा की बुनियद पर खड़े साहित्य की प्रासंगिकता भी विचार के प्रासंगिक रहने तक ही रहती है, जबकि मनुष्यता केंद्रित साहित्य कभी बासा नहीं पड़ता है।
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इस संसार में सबसे बड़ा जादूगर स्नेह है- बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय |
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