सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

E-mail-srijangatha@gmail.com   

 

 

 

अंक-4, सितम्बर, 2006      

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

पुस्तकायन

 

कृति-समीक्षा.....

 

मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ/व्यंग्यकार-गिरीश पंकज/समीक्षक-जयप्रकाश

प्रत्रकारिता पर तीन किताबें/ लेखक-संजय द्विवेदी/समीक्षक-गिरीश पंकज

बाबूना जो आयेगी/हायकुकार- डॉ. सुधा गुप्ता/समीक्षक-प्रदीप कुमार दास

चंद्रकला/ उपन्यासकार- डॉ.जे.आर.सोनी/ समीक्षक- डॉ.परदेशी राम वर्मा     

 

 
 

डॉ. सुधा का एक रम्य हाइकुं संग्रह-बाबुना जो आयेगी

प्रदीप कुमार दास दीपक

 

      डॉ.सुधा गुप्ता जी ने जीवन की विविध अनुभूतियों को जीवन्त हाइकु काव्य में प्रस्तुत किया है । संपूर्ण रूप से प्रकृति में रमी सुधा जी अपने प्रकृति जन्य हाइकु काव्य के विषय में कहती हैं –“अन्ततः प्रकृति मेरा एक मात्र अभ्यारण्य है, एक मात्र शरणस्थल...... चिड़ियाँ और परिन्दे मेरे सहज साथी....यदि हो सके तो मुझे मेरे इस संसार के साथ सहज रूप में स्वीकार कर लीजिए ।

 

      'बाबुना जो आयेगी' रचना-क्रम की दृष्टि से सुधा जी का सातवाँ हाइकु संग्रह है इसमें 185 हाइकु एवं 56 तांका कविताएं सम्मिलित हैं । हाइकु लेखन में सुधा जी निरंतर प्रगति करती जा रही हैं । डॉ. सुधा जी हिन्दी हाइकुकारों में प्रथम पंक्ति के मूर्धन्य हाइकुकार हैं, इनके हाइकुओं में प्रकृति सौन्दर्य एवं प्रकृति के प्रति सम्मोहन का भाव सहज देखने को मिल जाता है। संग्रह में कवयित्री की सम्पूर्ण दृष्टि प्रकृति को देखना, प्रकृति की खुशी में खुश होना, उसकी पीड़ा, दुःख दर्द आदि को महसुसना, इस तरह उसमें पुरी तरह रम जाना ही देखते ही बनता है। डॉ. सुधा प्रकृति के सौन्दर्य से अभिर्भूत हैं । प्रकृति सौन्दर्य और प्रकृति प्रेम की अभिव्यंजना इन हाइकुओं में अधिक प्रांजल व परिपक्व रूप में हुई है ।

 

      प्रकृति से स्वभावतः सम्बद्ध होने के कारण डॉ. सुधा प्रकृति को विविध रूपों में देखी, परखी और समझी हैं। उनकी हाइकुओं की सौन्दर्यानुभूति में काल्पनिकता व अनुभूत्यात्मकता का दृष्टिकोण व्यापक है। प्रकृति के विशाल प्रांगण में कवयित्री ने अपने लिए विविध उपकरणों का खोज किया है। प्रकृति के ऐसे अनेक तत्व होते हैं ,जिससे मावन प्रभावित होता है, हाइकुकार भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकीं हैं ।

 

हाइकुः      (1) मेघ-शशक / करने छुड़काव / पावस आया                             (पृष्ठ -23)

(2) फटती गई / अँधेरे की चादर / चाँद उघरा।                            (पृष्ठ-7)

(3) नन्हा घोंसला / बिल्ली की ताँक-झाँक / सहमी शाख          (पृष्ठ-21)

 

      इन हाइकुओं में प्राकृतिक अभिव्यंजना की प्रौढ़ शैली पाठक को सहज मुग्ध कर रही है, क्योंकि कवियित्री के चिन्तन की अभिव्यक्ति भी प्रौढ़ता के स्तर को स्पर्श कर चुकी है ।

 

      हाइकु की भूमि हाइकुकार की कल्पना भूमि होती है, इस भूमि में स्वाभाविक है कि चारों ओर हर्ष, उल्लास, दुःख, दर्द,वेदना, आशा व निराशा का जगत प्राप्त होगा । अतःसुधा जी के हाइकु भी हर्ष-उल्लास के साथ-साथ गहन दुःख को भी प्रकट करने में नहीं चुकते । इस प्रकार के हाइकुओं में कवयित्री के स्वयं की असीम पीढ़ा व वेदना भी सामने उपस्थित हुई है। कुछ हाइकु दृष्टव्य है-

 

(1) चन्द लकीरें / समय खींच गया / देह की माटी ।                      (पुष्ठ - 23)

(2) साथ जो छुटा/ दुःख पहाड टूटा / जीवन रूठा।                            (पृष्ठ - 33)

(3) नमन तुझे / असह्मओं से दुःख / ढोते न बना।                      (पृष्ठ 40)

 

      सुधा जी कहती हैं बाबुना एक छोटी पीले रंग की पंछी है जो पेड़ों की ऊंची शाखाओं में बैठकर गीत गाना पसन्द करती है। डॉ. बाबुना अब नहीं आती, सुधा जी दुःखी है: चिन्ता उन्हें सताती है, हाइकु रचती हैं

      न काटो पेड़ / बाबुना जो आएगी / कहाँ गाएगी।              (पृष्ठ -41)

     

     यह हाइकु पूरे संग्रह का सचमुच केंन्द्र बिन्दु बन गया है, जो हृदय को एक मीठा सा दर्द, तीखी सी टीस दे जाता है। सुधाजी स्मृतियों में खो जाती हैं, बस हाइकु रच जाती हैं-

 

      भटक गई/यादों के बीहड़ में /वहीं बसी हूँ ।                 (पृष्ठ-23)

 

              बाबुना’ से मिलने का बहाना भी कितना पीड़ादीयक हैं

 

      आँसू क्यों ढाऊँ /दुःख  से मिलूँ गले/सुम्हें ही पा लूँ ।          (पृष्ठ-33)

 

      सुधा जी के हाइकुओं के संदर्भ में प्रो, सत्यभूषण वर्मा कहते हैं –‘सुधा गुप्ता के हाइकुओं का मूल प्राण प्रकृति के रूप सौन्दर्य, उसके क्षण-क्षण परिवर्तित परिवेश और उससे जुड़ी मानवीय संवेदनाओं की सक्षम अभिव्यक्ति है। उनका प्रत्येक हाइकु एक लघु शब्द चित्र है । निश्चत ही डॉ. सुधा जी शब्द शिल्पी हैं, उन्हें शब्दों की आत्मा व उनकी भावानुकूलता का ज्ञान है यही कारण है कि उनकी भाषा कान्तिमयी बन पक पाठक पर जादू सा प्रभाव डालती है। प्रकृति से सम्बन्धित उनके कई सुन्दर हाइकु देखते बनते हैं-

 

(1) ढंग अनूप / बरगद के नीते / सुस्ताली धूप।             (पष्ठ -10)

(2) आग का गोला / डुबकी मार गया / हरे समुद्र ।          (पष्ठ-17)

(3) धूप के पाखी / आँगन में फुदके / चढ़े मुँडेर ।           (पष्ठ-29)

(4) असंख्य जीव/ ममता भरी गोद / मनाते मोद ।          (पष्ठ -44)

(5) लाल गुलाल / पूरी देह पै लगा / हँसे पलाश ।           (वसन्त का चित्रण पृष्ठ-19)

 

      पुस्तक के अंत में कुछ ताँका कविताएं हैं । तांका शब्द का अर्थ है- लघुगीत

इसमें क्रमशः5,7,5,7,7 के वर्णक्रम में कुल इकतीस वर्ण होते हैं । हेइयान युग में कविता प्रतियोगिता होती थी, जिसमें एक व्यक्ति पूर्वांश की तीन पंक्तियों की रचना कर के उत्तरांश की रचना दूसरे व्यक्ति के लिए छोड़ दिया जाता थाे। इसमें एक व्यक्ति 5,7,5 वर्णक्रम की तीन पंक्तियों की रचना करता है, दूसरा 7,7 वर्णक्रम की दो पंक्तियाँ जोड़कर कविता को पूरा कर देता है। इकतीस वर्ण की यह कविता तांका कविता कहलाने लगा । इस संग्रह में सुधा जी की 56 ताँका कविताएं संकलित है । इन ताँका कविताओं में भी जीवन्त प्रकृति का स्पष्ट छाप परिलक्षित किया जा सकता है-

(1) काम न आई / कोहरे की रजाई ठण्डक खाई / छींक-छींक रजनी / आँसू टपका रही। (पष्ठ -51)

(2) पौष का सूर्य / सामने नहीं आता / मुँह चुराता /बेवफा नायक सा/ धरती को रूलाता । (पष्ठ-66)

(दोनों ताँका में प्रकृति का सुन्दर मानवीकरण किया गया है।)

 

      मैं सुधा जी की अन्य दो ताँका कविताओं का उदाहरण देना चाहूँगा जिसमें उनकी स्वयं की पीड़ा है, जिस पीड़ा के जलन से स्वयं सुधा जी दग्ध हैं

          (1) माँ पिता छूटे/ भाई बहना रूठे /चले तुम भी/ आया न क्यों तरस/तुम भी थे बेबस। (पष्ठ-56)

          (2) प्रेम की यात्रा /फूले से शुरू हुई /शोलों पे खत्म /भटक रही राख सिसक रही यादें । (पष्ठ-57)

 

प्रस्तुत संग्रहके कई हाईकु विताँका मन व हृदय को आनंदित, आन्दोलित कर जाते हैं । इन रचनाओं को पढ़ने से एक सुखद अनुभूति हो रही है। डॉ. शैल जी कहते हैं सुधा के हाइकु मन  को छूते हैं, और जो रचना मन को छुए, वही रचना श्रेष्ठ होती है। निश्चय ही सुधा जी के हाइकु हिन्दी हाइकु जगत के उत्कृष्ट हाइकु हैं ।

 

   श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी जी के इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है कि-सुधा जी जीवट वाली कवयित्री हैं । इनके यहाँ कोई रंग उपेक्षणीय नहीं है वे इन्द्रधनुष की पूर्णता में जीवन को देखने और जीने के पक्षधर हैं । अत) हमारी कामना है कि प्रकृति की हर छोटी-बड़ी हलचल इसी तरह सुधा जी को प्रभावित करती रहे एवं सुधा जी अपनी प्रतिक्रिया स्वरूप अपने अभिव्यक्ति को हाइकु रचनाओं के माध्यम सो व्यक्त करती रहें, इससे हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास भी है कि हिन्दी हाइकु का भण्डार उनकी इस साधना से काफी समृद्ध होगा ।

 

 

विद्या स्वयं ही एक संपत्ति है- बेकन

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ