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“जिमि मुख मुकुर मुकुर निज पानी गहि न जाइ तिमि अद्भूत बानी।” -गोस्वामी तुलसीदास श्रेष्ठ साहित्य विशेष रूप से उत्कृष्ट कविता ‘अद्भुत वानी’ ही तो है। और जब-जब मैंने किसी पसंदीदा कविता के भाषान्तर का मु बनाया, गोस्वामी तुलसीदास की यह अर्धाली बरबस अपने सम्पूर्ण अर्थ-गौरव के माथ गूंजने लगी । ‘अद्भुत वाणी’ को ग्रहण करना उतना ही असम्भव है जिनता कि अपने ही कर में स्थित दर्पण में प्रतिविम्मबत अपने चेहरे को पकड़ पाना । ‘रामचरित मानस’ की संरचना के समय गोस्वामी जी ने सृजनात्मकता के इस संगट को बड़ी गहराई से अनुभव किया था। भारतीय वाड्मय और संस्कृति के जो शाश्वत मूल्य संस्कृत साहित्य में युगों-युगों से चले आ रहे थे, उसे अवधी में सामान्यजन को उपलब्ध कराने के उनके दीप्त संकल्प ने मृजनात्मकता के इस संकट से टकराने के लिये उन्हें विवश कर दिया था। रामकथा के मर्मज्ञ शोधी विद्वानों ने संस्कृत के राम काव्यों के सारे अंशों का छायानुवाद उनकी अमर कृति ‘रामचरित मानस’ में संकेतित करने का सफल प्रयास किया है। संस्कृत को प्रायः सभी वर्तमान भारतीय भाषाओं की जननी कहा जाता है। अवधी, ब्रजभाषा, मैथिली, खड़ी बोली तथा राजस्थानी जैसी साहित्यक अभिव्यंजना के लिए विकसित बोलियों के सांस्कृतिक-भाषायी उत्म संस्कृत में ही हैं । अतः एक ही संस्कृति के मुहावरे को उसके मूल्यों की सर्वाधिक सशक्त वाहिका की कालांतर में विकसित उपाशाखाओं में ढालने के प्रयास में भी भारतीय रचनाकार को समय-समय पर काफी जूझना पड़ा ।
भाषायें सांस्कृतिक संकेतों की संहितायें होती हैं। विश्वास से कहीं अधिक सुविधा के कारण हम मान लेते हैं कि एक भाषा की संकेत-संहिता का पर्याय दूसरी ..........है । इसी धारणा के फलस्वरूप एक भाषा की ‘अद्भूत वाणी’ को दूसरी भाषा की संकेत संहिता में स्थापित करने का मन बनाते ही रचना प्रक्रिया मात्र शब्दों का आखेट बनकर नहीं रह जाती। वह अपार शब्द-सागर में चतुर गोताखोर द्वारा दुर्लभ मोतियों, की खोज के साहसिक अभियान में तब्दील हो जाती है। यह साहस निश्चय ही दुस्साहस का रूप धारण कर लेता है, जब एक सर्वधा भिन्न सांस्कृतिक संकेत –संहिता के मुहावरे में ढालने के जोखिम का खुद व खुद वरण कर लिया जाये । ‘आ बैल मुझे मार’ जैसी कहावत को चरितार्थ करने वाले सभी मनोरंजक तत्व इस जोखिम के वरण में विद्यमान रहते हैं।
अंग्रजी भाषा और साहित्य से हिन्दी का साक्षात्कार लगभग सवा सौ वर्ष पुराना तो होगा ही। खड़ी बोली में लिखी गई हिन्दी कविता की यह जान-पहचान लगभग सौ वर्ष पुरानी होगी । तमिल, बंगला, मराठी ,मलयालम जैसी भाषायें अंग्रेजी के संपर्क में काफी पहले आगई थीं । उनमें से कुछ का संपर्क तो फ्रेन्च, उच और पोर्चगीज भाषाओं से भी गोहे-बगाहे रहा । इस दौर में अंग्रेजी की अभिव्यक्ति और उसके साहित्य मे मुहावरों को आत्मसात करने का प्रवास समस्त भारतीय भाषाओं सहित हिन्दी में भी जारी रहा । अंग्रेजी और अंग्रेजी के माध्यम से योरोपीय साहित्य परम्परा अपने समपूर्ण सौन्दर्य-शास्त्र एवं काव्य-शास्त्र के साथ भारतीय भाषाओं के प्रबल आकर्षण का विषय रही । इस प्रणय-आकर्षण में अनुवाद की प्रक्रिया अपरिहार्य थी। अनुवाद के समय हमारे साहित्य-मनीषियों और रचनाकारों ने अंग्रजी भाषा की साहित्यिक अभिव्यक्ति के मुहावरों का भारतीय भाषाओं में पर्याय बताते हुए शब्दों के कलेवर के बजाय अर्थ की आत्मा की ओर अधिक ध्यान दिया था और जब संस्कृत की विपुल शब्द-सम्पदा के मौक्तिक उन्होने पाश्चात्य साहित्य, संस्कृति और दर्शन के मूल अभिव्यक्तियों के पर्याय के रूप में समानान्तर बनी रही। महर्षि देवेन्द्र नाथ ठाकुर ने ‘द टूथ’ ‘द गुड’ ‘व्यूटी’ के संस्कृत पर्याय जब ‘सत्यम’ ‘शिवम्’ ‘सुन्दरम’ गढ़े, तो उस समय को ‘बड़ छोट कहत अपराधू’ वाली स्थिति पैदा हो गई । अच्छे खामे लोग इन संस्कृत शब्दों को अनुवाद न समझ कर मूल मान बैठे । आज भी इन शब्दों को उपनिषदों से जोड़ने के प्रयास अक्सर दिखाई पड़ जायेंगे । इसलिये अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में अनुवाद की परम्परा रोई नई नहीं है । अंग्रजेजी भाषा और साहित्य के मुहावरों को,जो उकी मूल शक्ति है, हिन्दी साहित सभी भारतीय भाषाओं ने अद्भूत रचनात्मकता के साथ पचाया है। साहित्यक और दार्शनिक कृतियों के अनुवाद- प्रयास इस धारणा की भूमि पर आश्रित होते हैं कि अपनी मूल भाषा के सम्पूर्ण ैचित्र्य और वैशिष्टय के बावजूद उनमें ऐसा बहुत कुछ होता है जिसे व्यूनाधिक रूप से दूसरी भाषा की जमीन पर, उनके जीवन्त रग-रेशों को बिना आहत किये स्वापित किया जा सकता है। अक्सर हमारे अनुभव इस धारणा को झुठला देता हैं। अत्यन्त विश्व के बीच ही अपनी रचनात्मकता को अधिक समप्रेष्य बनाने में सफल होती है। मूल भाषा के प्रकृति –वैभव के बीच ही अपनी रचनात्मकता को अधिक सम्प्रेष्य बनाने में सफल होती है। भूल भाषा के संगीत के शब्दार्थ और उसके शब्दार्थ के संगीत अनुवाद के परे हैं । अनुवादक की इसी सीमा को दृष्टिगत रख कर नवोकोव ने शायद चिढ़ कर कहा था-
“अनुवाद क्या है ? एक तश्तरी पर किसी कवि का जर्द तरेरती आंखों वाला सर एक तोता-रटन्त, एक बन्दर की चिचियाहट और किसी दिवंगत आत्मा का घोर अनादर ! नवोकोव ने जो प्रश्न अपने इस तीखे कथन के चरिये उठाये हैं, उसका अत्तर हां और ना दोनों में दिया जा सकता है। श्रेष्ठ साहित्य की रसानुभूति और उसमे उत्पन्न् आनन्द मात्र ‘गूंगे के मुंह में गुड़ का स्वाद’ बन कर नहीं रह जाना चाहते । वे भावक को अन्य लोगों के साथ उसमें भागीदारी के लिये उद्वेलित करते हैं-उनके साथ भी जिनकी पहुंच उस भाषा तक नहीं है जिसमें मूल कृति का अवतार हुआ है।
इसकी कल्पना तो की ही जा सकती है कि आधुनिकता का आज क्या रूप होता यदि बीकेंगार्द महज डेनिश भाषा में ही उपलब्ध होते ? विश्व का आधुनिक नाटक-साहित्य किस रूप में होता, यदि इब्सन नार्वेजवन भाषा की लक्ष्मण-रेखा में अवरूद्ध कर दिये गये होते ? मार्क्स और और फ्रायड यदि जर्मन भाषा के पुस्तालयों की ही शांभा बढ़ा रहे होते , तो आज के विश्व की आर्थिक,सामाजिक-राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक-साहित्यिक विकास यात्रा किन मोड़- घुमाओं से होकर गुजरती ? शेक्सपीयर और कालिदास यदि अंग्रजी संस्कृत में ही उपलब्ध होते तो जर्मन भाषा में साहित्य का रोमांटिक आनदोलन अपनी सर्वथा नई स्फूर्ति से योरोप की अन्य भाषाओं को कितना उद्वेलित कर पाता ? रूम के महान कथाकार यदि महज रूसी में उपलब्ध होते तो आज विश्व का कथासाहित्य किस रूप में होता ? किन्तु इसमें दो राय हो ही नहीं सकती कि गम्भीर रचनात्मक साहित्य विशेष रूप से कविता और दर्शन की कृतियों के अनुवाद बहुत ही दुष्कर है । पर इस दिशा में प्रयास ही न किया जाये तो मनुष्य की बिराट चेतना से उद्भुत प्रतिमा के तिजस्वी स्फुलिंग किसी एक भाषा की अंगीठी की राख के नीचे ही दबे रह जायेंगे । उनकी रचनात्मकता की जांच से प्रतिभा के नये अंगारे नहीं दहक पायेंगे और सृजन की धरती की उर्वरा शक्ति कम हो जायेगी । तभी शायद महान रूसी कवि-रचनाकार पुश्किन जो-स्वयं अनुवादकों के लिये एक समस्या रहे हैं । भकुवाये-सहमें अनुवादकों की पीठ पर हाथ रचते हैं । उन्हें वह मानवीय चेतना के दूरगामी सम्वाहक के रूप में निरूगति करते हैं। इस सबके बावजूद नवोकोव के कथन के पीछे झांकती वैलौस मच्चाई और उससे उत्पन्न चुनौती आंख में आखें डाल कर धूरती रहती है ।
अनुवाद कर्म यदि धनानन्द के सहारे कहें तो, ‘तलवार की धार पे धावनो हैं ।’ भाषा के स्थूल पक्ष पर ध्यान दें तो सृजन का मर्म आहत हो जाता है और यदि मर्म की केन्द्रीयता बनाये रखने का प्रयास करें तो भाषा का कलेवर ‘खदर’ जाता है। दोनों के बीच का सन्तुलन ,सख्त दुश्वार है। अनूदित साहित्यिक रचना के इस संकट को छोड़ा मसखरे लहजे में भी बयान करने की कोशिश हुई है। अनुदित रचना उस स्त्री की तरह कही गयी है जो यदि सुन्दर होती है तो बफादार नहीं होती और यदि वफादार हुई तो सुन्दर नहीं होती । हर सजग-सम्वेदनशील अनुवादक मूल के मर्म और उसके सूक्ष्म तत्वों के साथ भाषा के स्थूल पक्ष के प्रति वफादारी बरतने की पूरी कोशिश करता है। दोनों के बीच तनाव को वह काफी हद तक झेलता है। सम्भव है इस तनाव में कभी-कभी उसका धैर्य साथ छोड़ दे । पर वह बाज नहीं आता-पूरी रचनात्मक बेहयाई से जुटा रहता है। और इसके परिणाम हमेशा ही निराशाजनक और निष्फल नहीं होते । रचना के सूक्ष्म पक्ष, उसके अर्थ-संगीत और मर्म की अभिव्यक्ति भाषायी स्थूलता के अभाव में अकल्पनीय है । भाषा जिस चाक्षुष बिम्ब की संरचना करती है, रचना अपने पूरे अर्थ-गौरव और अर्थ-संगीत को उसी के जरिये अभिव्यक्त करती है । मिर्जा गालिब ने इसे बड़े ही पुराअसर ढंग से व्यक्त किया है- “तलाफ्रत वे कसाफत जल्वा पैदा कर नहीं सकती । चमन जंगार है आईनये-बादे-बहारीका ।”
(सूक्ष्मता अथवा लालित्य बिना स्थूल माध्यम के अपनी छटा बिखेर ही नहीं सकता । उपवन बासन्ती समीर के लिये दर्पण के पीछे लगे मंडूर का काम करता है । )
हिन्दी कविता में अंग्रेजी कविता से अनुवाद का शायद पहला गम्भीर प्रयास पं. श्रीधर पाठक ने गोल्डस्मिथ के ‘द डेजटें विलेज’ का ‘उजड़ा ग्रम’ नामक काव्य-पुस्तक के रूप में किया था। दूसरा महत्वपूर्ण प्रयास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का था जिन्होंने एड्विन अर्नाल्ड की सुप्रसिद्ध काव्यकृति ‘दि लाइट आफ एशिया ’ का अनुवाद ‘बुद्ध-चरित’ नाम से किया था। डा.हरिबंशराय बच्चन द्वारा उमर खैयम की रूवाईयों के अनुवाद अंग्रेजी में फिट्जेराल्ड के विश्व विश्रुत अनुवाद से ही किये गये थे। बच्चन जी ने डव्लू.बी. यीट्स की कविताओं के भी श्रेष्ठ अनुवाद किये हैं । पिछली पीढ़ी के भोजपुरी और हिन्दी के श्रेष्ठ गीताकर मीती बी. ए., ने शेक्पीयर के कुछ सानेट्स के बड़े ही मनोहारी अनुवाद किये थे। इधर रघुबीर सहाय, गिरजा कुमार माथुर, स्व. श्रीकान्त वर्मा, कुंवर नारायण, डा. रमेशचचंद्र शाह, डा. नन्दकिशोर आचार्य, गिरधर राठी, मंगलेश डबराल, विष्णु नागर, विष्णु खरे, सोमदत्त, वंशी माहेश्वरी, असद जैदी, प्रयाग शुक्ल, सुश्री प्रभाखेतान, असद जैसे नये-पुराने मंजे हुये कवि-रचनाकार भी इस दिशा में प्रवृत्त हुए । अनुवाद निश्चय ही किसी मौलिक सृजनात्मक्ता का स्थान नहीं ले सकता । पर एक बात ध्यान में रखने की है । आज नाइजीरियाई कविता और उशके शिल्प में लगातार हो रहे परिवर्तनों और उसके शिल्प में लगातार हो रहे परिवर्तनों और प्रयोगों से अंग्रेजी के माध्यम से बराबर जुड़े रहे। उससे उन्होंने गहरा सरोकार रखा। तभी वे अपनी मिट्टी की निखालिस गन्ध आधुनिक काव्य-शिल्प के जिरये पूरे विश्व में फैला पाये । यदि इसे गलत अर्थ में न लिया जाये तो मैं निवेदन करना चाहूंगा कि हिन्दी हृदय-प्रदेश के हम लोग अंग्रेजी पर उतना अधिकार नहीं कर सके जितना बंगला, मराठी, तमिल और मलयालम भाषी हमारे बंधु कर पाये । फलम्वरूप जहां एक ओर, उन्होंने अंग्रेजी से अपने गहन सम्पर्क के कारण अपनी भाषाओं की श्रेष्ठ कृतियों का हिन्दी की अपेक्षा अंग्रेजी में शीघ्रतर अनुवाद का उपक्रम किया, वहीं, दूसरी ओर अंग्रेजी और इसके माध्यम से योरोप की अन्य भाषाओं के अनूदित हारित्य से हिन्दी भाषियों से कहीं अधक रचनात्मक बैचैनी से वह चककराये । इस पृष्ठभूमि में हिन्दी अनुवादों के माध्यम से बोरोप की अन्य भाषाओं के अनूदित साहित्य से हिन्दी भाषियों से कहीं अधिक रचनात्मक बेचैनी से वह टककराये । इस पृष्ठभूमि में हिन्दी अनुवादों के माध्यम से वे श्रेष्ठ, ऊर्जम्वी और अछूती सृजनात्मक सम्भावनाओं से पूर्ण रचनाकार, जिन्हें किसी भई कारणवश अंग्रेजी पर अच्छा अधिकार प्राप्त करने का सुयोग नहीं मिला, विश्व की आधुनिक रचनात्मकता के सम्पर्क में आने का कुछ हद तक अवसर प्राप्त कर सकते हैं। पर अनुवाद तो अनुवाद ही है। जो भाषा के साधिकार ज्ञान के अभाव में मूल का रसास्वादन नहीं कर सकते, उन्हीं के लिये इसकी कुछ उपयोगिता हो सकती है।
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विद्या की परिपूर्णता का कोई बिन्दु नहीं होता- टॉमस जे. वाट्सन |
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