सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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अंक-4, सितम्बर, 2006   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

लोक-आलोक

भाषाःक शब्द.... लगाना- डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

मीडिया-विमर्श.....समसामयिक पत्रकारिता का परिदृश्य- संजय द्विवेदी

विचार.....मृत्यु पर विजय- पुष्करलाल केडिया

लोक-आलोक....जिन्ने ट्रिनबैगो (ट्रिनिडाड-टुबैगो) नहिं देख्या- सुवास कुमार

तकनीक.....इंटरनेट पर उपलब्ध हैं रोजगार- रविशंकर श्रीवास्तव

मूल्यांकन.....आनुवाद यानी तलवार की धार- वीरेन्द्रकुमार वरनवाल

प्रसंगवश.....शरद जी की लेखन विधा का मूल सौंदर्य- राम पटवा

अंतरजाल.....हिंदी मीडिया की दिशा बदल सकता है यूनिकोड- बालेन्दु शर्मा दाधीच

 

 
 

जिन्ने ट्रिनबैगो (ट्रिनिडाड-टुबैगो) नहिं देख्या 

सुवास कुमार

 

        बड़े देशों में बड़ी खबरें होती हैं। खबरें होती भी हैं बहुत । इसलिए कि लोग बहुत होते हैं । जनसंख्या बड़ी होने से समस्याएँ और दुर्घटनाएँ भी बहुत होती हैं और बड़ी बना दी जाती हैं । अखबार उठाइए तो वे देश के भीतर की खबरों से खचाखच भरे होते हैं। साधारण चीजें भी खबरों में शुमार कर ली जाती हैं । बड़े देश में बड़े-से-बड़े आतंक के नीचे रहते हुए लोग बहुत कुछ झेल लेते हैं । छोटे देश में छोटा भय भी आतंक के क्लोज-अप में दिखाई देता है। छोटा देश अपनी छोटाई में रहकर दुनिया अपने प्याले में घुल जाने देता है जबकि बड़े देश के लोग देशदुनिया की खबरों से पस्त रहा करते हैं। बड़े देश के लोग इस बात से आश्वस्त अथवा घबराये रहते हैं कि मुहल्ले के लोग भी उन्हें नहीं पहचानतें, छोटे देश में शायद ही कोई अनपहचाना लगता है । दंगे बड़े लोगों की विलासिता हैं, छोटे देश दंगों का भौतिक अथवा आध्यात्मिक खर्च बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं होते । वे तो संगीत सुनते रहते हैं । संगीत मय होते हैं वहां भी संगीत सुनते हैं जहां वह होता ही नहीं । हाँ वे मुंह बांये अवाक् सुनते हैं वे हिंस्र आवाजें जो बड़े देशों से आती हैं ।

 

       ट्रिनिडा़ड सुन्दर है तो टुबैगो मीठा। ट्रिनिडाड कैरीबियन द्वीपों में सबसे दक्षिणी छोर पर, वेनेजुएला से सिर्फ दस किलोमीटर की दूरी पर, उसके उत्तर में बसा है । ट्रिनिडाड के उत्तरी छोर पर, तैंतीस किलोमीटर अलग, समुद्र में, टुबैगो द्वीप है। ट्रिनिडाड का क्षेत्रफल पॉच हजार वर्ग-किलोमीटर से थोड़ा कम ही है, टुबैगो का केवल तीन सौ वर्ग किलोमीटर । पन्द्रह लाख से भी कम ही जनसंख्या होगी-बहुमत भारतीय मूल के लोगों का है। व्रिटेन की गुलामी से देश को 1962 में मुक्ति मिली लेकिन वह भी भारत की तरह ही कॉमनवेल्थ का सदस्य बना।

 

       1498 में क्रिस्टोफर कोलम्बस ने ट्रिनिडाड का भी अमेरिका की भाँति ही पता लगाया । तब से यह स्पेन और ब्रिटेन के अधीन रहा । स्पेनी, चीनी,जर्मन, ब्रिटिश, भारतीय आदि अनेक मूल के लोग यहाँ इन्धनुष की रचना करते हैं । ट्रिनिडाड के कार्नवाल को अक्सर धरती पर सबसे बड़ा शो-महानतम प्रदर्शनकहा जाता है। रंगीन मदमस्त तबीयत, वेशभूषा, नृत्य और संगीत से भरा यह उत्सब अक्सर फरवरी महीने में होता है। ट्रिनिडाड-टुबैगो दुनिया का सर्वाधिक खूबसूरत देश कहा जा सकता हैं। प्राकृतिक दृश्य, समुद्री सोंदर्य और बेहद अनुकूल मौसम उसे भगवान का अपना देश बनाते हैं । पोर्ट ऑऱ स्पेन,माराकास, अरीमा, गैस्परी, टोको, शंगुआनाज, सैंग्रीग्रैंडी, मयारो फर्नाडो, पिचलेक आदि ट्रिनिडाड के दर्शनीय स्थल हैं । ट्रिनिडाड में चहल-पहल है, चुलबुलापन है। टुबैगो में चैन ही चैन है-सीधी-सरल और शांत जिंदगी । दुनिया के सबसे खूबसूरत समुद्री तटों में एक और कोरल रीफ के लिए विश्वविख्यात टुबैगो में पहाड़ और जंगल भी आंतरिक शांति और उदात्तता प्रदान करते हैं । स्कैरबरो, प्वायमाउथ, बको रीफ, ब्लैक रॉक, फोर्ट किंग जार्ज, पिजन पॉइन्ट रॉक्सबरो वगैरह देखते ही बनते हैं ।

 

       इंडिया के टुकड़े जा गिरे थे कभी मॉरीशस, सूरीनाम, गयाना, फीजी में-एक छोटा खूबसूरत दुकड़ा ट्रिन-ट्रिन करता जा पड़ा ट्रिनिडाड में-उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के बीच समुद्र में । चमक वही भारत की। अब इंडिया जैसे पश्चिम को धावित है, ट्रिनिडाड वैसे ही भारत को भावित है। लेकिन अपनी समझ के लहजे में । ट्रिनिडाड में सोका, कैलिप्सो और चटनी के नृत्य-गीतों की बहार है-शुद्ध भारत न भारत में है न ट्रिनिडाड में एक मसालेदार मिश्रित संस्कृति में मुब्तिला होना चाहते हैं दोनों । ट्रिनिडाड को चाहिए एक ही साथ भारत, अमेरिका, कैनाडा, ब्रिटेन, अफ्रिका और चीन-इन सबका ऐतिहासिकता । प्राचीन और अर्वाचीन साथ-साथ । यह द्वीप निरन्तर महसूस करता रहता है हलके भूकंपी झटके, लेता है मजे-गोया हो लेटा झूले मे । छोटी-छोटी ज्वालामुखियाँ उगलती है सफेद गीली मिट्टी जिससे बना लेते हैं यहाँ के निवासी प्रसाधन-सामग्री । पहुंच जाते वहां मनाने पितनिक ।

 

         उपनिवेशवाद को योग्यता और न्याय से एलर्जी थी। अब भी है क्योंकि उपनिवेशवाद अब भी है दिमागों में और यह है बाहरी प्रजातांत्रिक आचरण के बावजूद । इसने लूट की सभ्यता को वैध बनाया । उपनिवेशवाद जा घुसा है सभी संस्थाओं में-संस्कृति में, शिक्षा में, पूरी व्यवस्था में । लुटेरे होते है छद्मवेशी व्यवहार-कुशल- वे पदासनों में विराजमान हो, पुचकारते-फुसलाते धमकाते-डराते-जोर-जबर्दस्ती करते । खैरियत है कि लुटने वाले भी रहे हैं बदल और लेने लगे है चालाकी से काम । वे बना और बचा पाये हैं समतल सवाना (Savannah) सब्जबाग को कर पाये हैं हासिल । समतल मैदान की सुखद सवारी है उन्हें अब मयस्सर । दुनिया की सबसे अच्छी रम और कैरिब बीयर के कैन और बोतलों के साथ वे नाचते हुए होते शरीक दुनिया के बेहद खूबसूरत कार्निवाल में । भारत में ढेर-सारे लोग हैं ऐसे जिन्होंने अपने देश के सारे सिक्कों और नोटों को एक नजर देखा तक नहीं-खायी नहीं कभी सूखी रोटियाँ भी पेटभर । जा पहुँचे जब वे ट्रिनिडाड-वगैरह तो जा निकले अपने पिछले जहन्नुम से बाहर । आगे की पीढियाँ बन गयीं कुबेर मेहनत से अपनी । एक ही सिद्धांत-जीवन को जीने लायक बनाना । रहना चैन से संगीत में, नृत्य में, कला में, साहित्य में, धर्म में । उत्सवों-त्यौहारों में । फगुआ-दीवाली, ईद-मुहर्रम और क्रिसमस एक जैसे उत्साह से मनाते लोग । फागुन में झाल-ढोलक करताल हामोनियम बजातेगाते राग और रंगों में सराबोर होता देश । दीवाली  में महीने भर दीपों की कतारों से सजी-संवरी रातें । ट्रिनिडाड एक उत्सव है, कार्निवाल है अपने आप में ।

 

        पूरब की विनम्रता को पश्चिम की अकखड़ता से वह चाहता है जोड़ देना । छोटे देश की धारा को बड़े सम्मान की तरफ मोड़ देना । छोटे देश की धारा को बड़े सम्मान की तरफ मोड़ देना । हासिल किये हैं इसने ओलंपिक स्वर्ण-पदक । दुनिया के सामने रखीं अपनी दो-दो विश्व सुंदरियाँ । अपनी खूबसूरती पर, खुदा की कारीगरी पर हुआ करता है नाज खुद पर ट्रिनिडाड को । बसों के प्लैटफॉम पर, मैक्सीटेक्सी में, अनगिनत कारों में बाजारों में मिलते हैं जो भी चेहरे वे सब के सब हँसते-मुस्कराते, गाते-झूमते-मस्त और खुले । दो ही मौसम यहां होते हैं । भीग-भीग (Wet) या सूखा-सूखा (Dry) । छायें बादल तो माहौल कुछ घड़ी को धुँधला । फिर कभी घुप्प अँधकार । झिरझिर बरसात । फिर तुरत-फुरत खिलखिल धूप । साफ धुली सड़कें, मकान । पूरे परिदृश्य में पहाड़, जंगल समुन्दर । खिसकतीं शिलाएँ, फिसलन । घनी हरियाली में गुम होती पगडंडियाँ । झाडों, पत्तों पर टपकतीं-चमकतीं बूँदें । वीर हैं सचमुच के, ये सभी बहादुर हैं, ट्रिनिबैगो (ट्रिनिडाड-टुबैगो) वासी । हाफपैंट-बनियान में ज्यादातर नजर आने वाले लोग स्पोर्ट्स-मैंन लगते हैं ज्यादातर । तरह-तरह  की स्टाइलें-केशों की (घुटे सिर भी!), दाढ़ी और  मुछों की। अथाह जिन्दादिली वाले लोग-अक्सर बोतल ही मुँह से लगाते हैं। समान गरमाहट के साथ अकवार में भर चूमकर स्वागत करते हैं। पेशा कोई भी हो, झिक-झिक झॉव-झॉव होता ही है । यहां भी मिल जाते हैं तरह-तरह के पेशे- ओझाई से लेकर डॉक्टरी तक के । मेहनती है पिंटो रोड का रहने वाला किसुन रामसिंह । खेतों में उपजाता है सब्जियाँ खूब, और मुफ्त मालिश से किया करता है शर्तिया इलाज हड्डी के रोगों की । नहीं जानता ताम-झाम डॉक्टरी के, न मैनर्स। नारियल तेल की शीशी उडे़ल कर बदन पर मालिश से किया करता है । उँगलियाँ दौड़ती हैं नसों में ठहरे हुए लहू की जगहों में मांस-मज्जा हड्डी नसों की सारी उलझनों के बीच। उंगलियाँ दबाती हुई रक्त नलिकाएँ, चिटकाती हुई हडि्डयाँ , सीधी करती हुई रीढ़।  पीठ ठोककर कहेगा किसून रामसिंह कि आप हैं बिल्कुल ठीक-दौड़ कर देखिए तो जरा । आदमी गोरा, भूरा या काला, कैसा भी हो अगर भीतर से आदमी है मन और आत्मा रखता है तो जीवन के संगीत की सही धुन का इसे ज्ञान हो जाएगा ।

 

      यहाँ खूब मिलते हैं पिज्जा, हॉटडॉग,टोरंटों और मियामी के भड़कीले कपड़े और रंगीन चश्में । लोग आपस की दूरियाँ यहाँ भी तय करते हैं दारु के सहारे । मगर यहाँ भी मिलते हैं खूब आदमी सही आदमी, जैसे फूलों-फूलोंवाले हरे-भरे गदराये वृक्ष हों । उस मंझोले कद के सुघड़ पेड़ को युनिवर्सटी कैम्पस में घूमते हुए मैंने चीन्ह लिया था। चम्पे का है, सबको मैने बतलाया-दिखलाया था। चम्पई रंग के फूलों वाला मह-मह करता पुष्प वृक्ष वह भारत की याद दिलाने वाला था। पुरनिया जिले के फारबिसगंज कस्बे के पास एक बैलगाड़ी में । रह-रह कर महक-चहक उठता था चम्पे का एक फूल । यहाँ ट्रिनिडाड में चम्पे का वह फूल सुँघता हुआ मैंने पाया इसमें वही रुप,महक वही थी फारबिसगंज वाली ही, हालॉकि मैंने नहीं खाई कोई तीसरी कसम । इसी तरह देखे मैंने फूल अड़हुल के छाये थे ट्रिनिडाड में-क्या ये भी भारत से आये ? आम हो गये आम-यहाँ ट्रिनिडाड में भी,मिलते हैं खूब आमड़े भी। बैंगन, कुम्हड़े, कटहल, बेल-हर साइज के । सभी रंग के लाल,नारंगी,बैगनी, पीले, अड़हुल मिलते हैं । जूही, चम्पा, अमलतास, शेफाली, कौन फूल-फल नहीं यहाँ पर । फसलें भी सारी । अल्हुआ,सुथनी, अरहर, मटर, धान, मकई-कभी-कभी तो लगता जैसे छोटा सा भूगोल चला आया भारत से ट्रिनिडाड में । दालपूड़ी हो या हो चोखा-चटनी। छोले और भटूरे आकर यहाँ डबल्स बन गये । घास, वनस्पतियाँ, बादल नदियाँ, छोटे झरने । चौबीसों घंटे म्यूजिक बजता है भारत का । गोकि यहाँ पर के. एफ. सी.-पिज्जाहट-मैक्डॉनॉल्ड सभी काटते हैं चांदी । सभी तरह के लोग यहाँ हैं-सभी रंग के सभी ढंग के, हर लिबास में ।

 

       बस हुई दोस्ती मिलते ही लुई गुत्तिरेज से । वेनेजुएला (इंजीनियर,लेकिन अंतर्विद्यावर्ती अध्ययन का अध्यापक, कराकस युनिवर्सिटी में) का भला, कुँवारा, अभियंता जिसकी रुचि दर्शन में, कविता में है खास । कार में उससे संवाद करते हुए सानफर्नांदों के रास्ते उससे स्पेनी कविता पढ़ता-समझता रहा । उसने दुखपर कविता पढ़ी। दुख की परिभाषा होती कितनी कमजोर है। दुखी था लुई । वह ईसाई साधु बना था-छोड़े थे रिश्ते-नाते । कहाँ छोड़ पाया था। फोटो अपने परिवारजनों के,जिन्हें दिखाते वह कभी नहीं थकता था। उसका लगाव आँखों में छलक-छलक उठता था-फोटो में पहचान कराते माता-पिता की, बहनों, और उनके परिवारों की । कहाँ छोड़ पाया था दोस्त बनाना । उसने उसे जिसको था कविता से ढेर सारा प्यार । लुई प्यार करता है जीवन से जितना-उतना ही कविता से, उतना ही ट्रिनिडाड से भी।

 

      इंडिया ढूँढ़ने चला जो कोलम्बस व अमरीका को ही इंडिया समझा बैठा था। उसने ही ट्रिनिडाड को भी खोजा । नहीं पता था उसे कि उसने ढूँढ लिया था मिनी इंडिया ।

सानफर्नाडो में कैलिप्सो गाता हुआ बूढ़ा प्रतियोगी खुले स्टेज पर, बूढ़ा जरा भी नहीं लगता सफेद बढ़ी दाढ़ी में भी । सीधा, तनकर खड़ा करता रहा टिप्पणियाँ राजनीति पर । खुलकर वह दे रहा था चुनौती राष्ट्रसंघ को अफ़्रीका के नाम पे । नाच रहा था तीव्र वेग से । मिलीटरी-ग्रीन पैंट-टोपी में छींटदार शर्ट में जैसे वह कोई बन गया हो किशोर । सत्तर साल का बच्चा वह थिरक रहा है लोचदार अपने अंगों से कैसी निर्मल, निश्छल हँसी हँसता है वह । माइक के लम्बे तारों से बाँध रहा है सबके दिल को । सोका में सब को शामिल करके भिगो रहा है । ऊभ-चूभ कर रहे-हजारों औरत-मर्द,क्या जवान, बच्चे,क्या बूढ़े ।

एक बर्फ ही नहीं सिर्फ,बाकी सब कुछ प्रकृति का दिया तो है ट्रिनबैगो में । कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है । पटेल रामगणेश हिन्दी पढ़ते थे । हारमोनियम वादन में माहिर धुन निकालते । हमने भी कह दीं धुन की संगत में कुछ कविताएँ, हो मुलाहिजा.....

 

बारिश धूप हवा हरियाली

नन्हें पर्वत गहरे सागर

इनको कोई एक नाम दो

गर, तो वह होगा ट्रिनबैगो....

 

इस धरती पर बहुत दूब है

यहाँ ऊख की उपज खूब है

बहुत यहाँ के लोग भी मीठे

ज्यों फल-फूलों पर पलते हों

सबसे सुन्दर देश कौन है...

पूछा जब भी,कहा उन्होंने,

बस, ट्रिनबैगो .......

 

रोज नहा-धोकर निखरा है

इस धरती में रंग बिखरा है

यह स्वर्गिक उद्यान बना है

देश बहुत ही युवा-युवा है

कैरिब के ये जुड़वॉ दोनों

ट्रिनिडाड है और टुबैगो,,,,

 

भारत से बाहर आकर लगता है कि हमारा देश सचमुच महान है । यह भी कि भारत दुनिया भर में फैला है और फैलता जा रहा है। ट्रिनिडाड में नेशनल काउंसिल फॉर इंडियन कल्चर ने एक दिवाली नगर बसाया है। वहाँ साल भर सांस्कृतिक आयोजन, सेमिनार और प्रदर्शनियाँ होती रहती हैं-सभी भारत संबंधी विषयों पर । हिन्दी में बात करने की योग्यता इस देश में बड़ी उपलब्धि है। पुरोहिताई सबसे ग्लैमरस पेशा है। अंगरेज़ी भाषा के माध्यम से पूजा करायी और कथा कही जाती है। जो संस्कृत में पूजा करना और भजन, हवन, पूजन, भाषण करना जानते हैं उनकी चाँदी है। हिन्दुत्व पर एक से एक प्रवचनकार हैं और उनमें भी विशिष्ट है डॉक्टर अनन्त आनन्द रामवचन । प्रवचनकार अपनी बढिया कीर्तन मंडली के साथ समाँ बाँध देते हैं । हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। सांस्कृतिक समारोहों में टिकट लगती है। प्रवचनकार गंभीर भव्य व्यक्तित्व, सरल-सरस विश्लेषणात्मक भाषा और मधुर सुरों के धनी होते हैं । ट्रिनिडाड के हिन्दुओं का हिन्दुत्व, ईश्वर और भारत के प्रति भक्ति देखते बनती है। हर महत्वपूर्ण कार्यक्रम का रेडियो-टेलीविजन द्वारा सीधा प्रसारण होता रहता है। धर्म इस विदेश में आ बसे भारतीयों की रुहानी जरुरत बन गया है। उनका हिन्दुत्व-प्रेम और भारत प्रेम इसलिए भला है क्योंकि वह हानिकार नहीं है। कई ऐसे परिवार यहाँ मिलेंगे जिसका एक सदस्य हिन्दू, दूसरा मुसलमान और तीसरा ईसाई है । भारतवंशी भारतवासियों की अपेक्षा सुखी-संपन्न, उन्नत जीवन-स्तर वाले हैं । औसतन परिवार पीछे दो गाड़ियाँ कम-से-कम तो होंगी ही । अंगरेज़ी यहाँ के शासकीय तथा सामाजिक जीवन-व्यवहारों की भाषा है, लेकिन हिन्दी है उनकी आत्माकी भाषा जिसका वे मुखरता से प्रयोग नहीं कर पाते । ट्रिनिडाड के स्कूलों-कॉलेजों और यहाँ की एकमात्र युनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाने के व्यवस्था की गया है । हिन्दी-निधि तथा अन्य कई संस्थाएँ इस दिशा में जो कार्य कर रही हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं ।

 

 

 

ईश्वर निरोग करता है और चिकित्सक शुल्क लेता है - बेंजामिन फ्रैंकलिन

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ