सृजन-गाथा

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अंक-,4 सितम्बर, 2006   

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लघुकथा

लघुकथाएँ

एक टोकरी-भर मिट्टी - माधवराव सप्रे

संस्कृति - हरिशंकर परसाई

समय - जोगेन्दर पाल

आश्वासन  - पी. अशोक शर्मा

 माह के लघुकथाकार -  डॉ.जे.आर.सोनी

समकालीन साहित्य की पत्रिका

साहित्य-वैभव

(हिंदी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका)

संपादकः डॉ.सुधीर, शिवा इलेक्ट्रिकल्स के

 पास, पुरानी बस्ती, रायपुर- 492001

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एक टोकरी-भर मिट्टी

माधवराव सप्रे

 

        किसी श्रीमान् जमींदार के हमल के पास एक अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोंपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई । जमींदार ने बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई जमाने से बसी थी। उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोंपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पाँच बरस की कन्या को छोड़कर चली बसी थी। जब कभी उसे अपनी पूर्व स्थिति की याद आ जाती तो मारे दुख के फूट-फूटकर रोने लगती थी और जब से उसने अपने श्रीमान् पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना तब से वह मृतप्राय हो गई थी। उस झोंपड़ी में उसका मन लग गया था कि बिना मरे वहाँ से वह निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमानं के सब प्रयत्न निष्फल हुए, तब वे अपनी ज़मींदारी चाल चलने लगे । बाल की खाल निकालनेवाले वकीलों को थैली गरम कर उन्होंने अदालत से झोंपड़ी पर अपना कब्ज़ा कर लिया और विधवा को वहाँ से निकाल दिया । विचारी अनाथ तो थी ही । पास-पड़ोस में जाकर रहने लगी।

 

        एक दिन श्रीमान् उस झोंपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहाँ पहुँची और गिड़गिड़ाकर बोली कि महाराज, अब तो यह झोंपड़ी तुम्हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने वहीं आई हूँ, महाराज क्षमा करें तो एक विनती है। जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा कि जब से यह झोंपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने उसे बहुत समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चलकर वहीं रोटी खाऊँगी । अब मैंने यह सोचा पकाऊँगी । इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी । महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊँ । श्रीमान् ने आज्ञा दे दी ।

 

      विधवा झोंपड़ी के भीतर गई । वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी । अपने आंतरिक दुख को किसी तरह सँभालकर उसने टोकरी भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले गई । फिर हाथ जोड़कर श्रीमान् से प्रार्थना करने लगी। महाराज, कृपा करके इस टोकरी को ज़रा हाथ लगाइए जिससे कि मैं इसे अपने सिर पर धर लूँ । जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज़ हुए, पर जब वह बार-बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके मन में कुछ दया आ गई । किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने को आगे बढ़े । ज्यों ही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है । फिर उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, जिस स्थान पर टोकरी रखी थी, वहाँ से एक हाथ-भर उँची न हुई । वह लज्जित होकर कहने लगे कि नहीं,यह टोकरी हमसे न उठाई जावेगी ।

 

      यह सुनकर विधवा ने कहा, महाराज नाराज़ न हों, आपसे तो टोकरी भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और झोंपड़ी में तो हज़ारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी है। उसका भार आप जनम-भर क्योंकर उठा सकेंगे ? आप ही इस पर विचार कीजिए ।

 

      ज़मीदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्त्तव्य भूल गए थे, पर विधवा के उपरोक्त वचन से उनकी आँखें खुल गईं । कृतकर्म का पश्चात्ताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी ।    

 

 

संस्कृति

हरिशंकर परसाई

 

भूखा आदमी सड़क किनारे कराह रहा था । एक दयालु आदमी रोटी लेकर उसके पास पहँचा और उसे दे ही रहा था कि एक-दूसरे आदमी ने उसका हाथ खींच लिया । वह आदमी बड़ा रंगीन था ।

    पहले आदमी ने पूछा, "क्यों भाई, भूखे को भोजन क्यों नहीं देने देते ?"

    रंगीन आदमी बोला, "ठहरो, तुम इस प्रकार उसका हित नहीं कर सकते । तुम केवल उसके तन की भूख समझ पाते हो, मैं उसकी आत्मा की भूख जानता हूँ । देखते नहीं हो, मनुष्य-शरीर में पेट नीचे है और हृदय के ऊपर । हृदय की अधिक महत्ता है ।"

    पहला आदमी बोला, "लेकिन उसका हृदय पेट पर ही टिका हुआ है । अगर पेट में भोजन नहीं गया तो हृदय की टिक-टिक बंद नहीं हो जायेगी !"

    रंगीन आदमी हँसा, फिर बोला,  "देखो, मैं बतलाता हूँ कि उसकी भूख कैसे बुझेगी !"

    यह कहकर वह उस भूखे के सामने बाँसुरी बजाने लगा । दूसरे ने पूछा, "यह तुम क्या कर रहे हो, इससे क्या होगा ?"

    रंगीन आदमी बोला, "मैं उसे संस्कृति का राग सुना रहा हूँ । तुम्हारी रोटी से तो एक दिन के लिए ही उसकी भूख भागेगी, संस्कृति के राम से उसकी जनम-जनम की भूख भागेगी ।"

    वह फिर बाँसूरी बजाने लगा ।

    और तब वह भूखा उठा और बाँसूरी झपटकर पास की नाली में फेंक दी ।                          

 

समय

जोगेन्दर पाल

बूढ़ा ज्योतिषी मुस्कराने लगा तो उसकी दाढ़ी और सफेद और घनी मालूम होने लगी ।

          "नहीं बेटा , समय के पीछे कोई समय होता है, न समय के आगे । तुम जानते हो, हमारी धरती घूमती रहती है इसीलिए आज सूर्यास्त हो जाता है और कल फिर उदित हो लेता है और इस तरह हम समय को आप ही आगे-पीछे में बाँट लेते हैं ।"

            बूढ़े ज्योतिषि की मुस्कान किसी नन्हें-मुन्ने परिंदे की तरह उसकी दाढ़ी में घोंसला बनाने लगी ।

            "समय को इस तरह समझना चाहिए कि समय है, सारा का सारा, अब और इसी दम है, और.........."ज्योतिषी की मुस्कान मानों पर खोले उड़ने की सोच रही हो..........."और बेटा, समय अपने इसी अब पन के कारण अमर है, वरना कब का लुट-पिट गया होता !"

            "फिर बाबा, हमारी उम्र में ................."

            "मैं इसलिए अचम्भे में पड़ गया था कि तुम्हारी उम्र कैसे बताऊँ ?   -  तुम तो जन्म लेते ही मर गये थे बेटा, तुम तो अमर हो बेटा ।" (उर्दू से अनुवाद- योगेंद्र बाली )                                            

 

आश्वासन

पी. अशोक शर्मा

मंत्रीजी भाषण दे रहे थे कि अचानक सभा में हो-हल्ला होने लगा । मंत्रीजी ने पूछा, "क्या हुआ ?"

            एक कार्यकर्ता भाग कर स्टेज पर आया और उनके कान से मूँह सटाकर कहने लगा, "लगता है किसी नाबालिग लड़की का बलात्कार हो गया है...........।"

             मंत्री ने भाषण को गति देते हुए कहा, "मुझे अभी-अभी बताया गया है मेरे क्षेत्र में बलात्कार का कोई केश हो गया है । मैं वादा करता हूँ कि आरोपी को सूली पर टँगवाने का प्रस्ताव करवाऊंगा ।" लोगों का जोश तालियों की गड़गड़ाहट से साफ-साफ झलक रहा था ।

            इसी बीच एक अन्य कार्यकर्ता भागते हुए आया और आदतन कान में कहने लगा, "आरोपी अपनी ही पार्टी का है भैय्या ।" मंत्री ने अपने भाषण में फिर उस बलात्कार प्रकरण पर बात बढ़ाते हुए कहा, "अगर आरोपी को फाँसी न हो तो जेल तो उसे जरूर भिजवाकर रहूँगा ।" तालियों का छंद फिर पहले जैसा ही था । 

            भाषण जारी ही था कि एक बुजुर्ग कार्यकर्ता मंत्रीजी को इशारे से स्टेज के कोने में ले जाकर चिंतित स्वर में कहने लगा, " बड़ा अनर्थ हो गया, आरोपी तो आपका ही बेटा है ।" इतना सूनना भर था कि मंत्री जी फिर से माईक की ओर लपक कर आवाज़ को संयत करते हुए कहने लगे, "साथियों,  मुख्यमंत्री जी का मुझे बुलावा आया है तत्काल आपसे अनुमति लेनी होगी । और हाँ उस बलात्कार प्रकरण का सैं स्वयं जाँच करवाऊंगा । इस प्रकरण को आप बिलकुल भूल जायें । कल से ही आपके गाँव में सड़क बनना शुरू हो जायेगा । बिजली और नल के कनेक्शन सप्ताह भर के भीतर लग जायेगा । मैं यहीं से संबंधित विभागों के इंजीनियरों को आदेश देता हूँ । आप लोग हत्या, बलात्कार आदि की घटनाओं पर ध्यान न देकर अपनी मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित करें । मैं सदैव आपके साथ हूँ ..................।"

               मंत्रीजी बड़बड़ाते हुए काफिले के साथ पुलिस थाने की ओर रवाना हो गये ।                     

 

 

देवता उनकी सहायता करते हैं जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं- ईसप

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ