सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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अंक-4, सितम्बर, 2006      

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सौभाग्य  है पं.नरेंद्र शर्मा की बेटी होना -लावण्या शाह

बातचीत : जयप्रकाश मानस

      

       पं.नरेन्द्र शर्मा उन भारतीय संस्कृति पुरुषों में से एक हैं जो देशवासियों की स्मृति से कभी विस्मृत नहीं हो सकते । वे हिंदी गीतों के युगपुरुष थे । निराला जी के बाद जिन गीतकारों की पीढ़ी ने गीत-काव्य को एक नया धरातल दिया, शिल्प का नया आकाश रचा, उनमें पं. नरेन्द्र शर्मा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । हरिवंश राय बच्चन के समकालीन पंडित जी के प्रथम पड़ाव में प्रेम, वेदना, स्मृति, अतृप्ति का वरण है यानी संयोग-वियोग के आरोह-अवरोह में विचरण । कालांतर की गीति-रचनाओं में भारतीय दर्शन और साम्यवादी चेतना को वे आत्मसात करते जान पड़ते हैं । सम्यक दृष्टि में वे आस्था के गायक हैं, गीति-काव्य को नवीन दृष्टि प्रदान करने वाले उन्नायक हैं । उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं 1. प्रवासी के गीत 2. छंदमयी 3. मिट्टी के फूल 4. हंसमाला आदि । उन्होंने चलचित्रों में भी गीत लिखे जो अत्यंत लोकप्रिय हुए । यदि प्रसाद, निराला और पंत वृहत्रयी हैं तो नरेंद शर्मा, अंचल, और सुमन लघुत्रयी हैं।

       इसे काव्य-मनीषी पिता का संस्कार कहें या कर्तव्यबोध जो उनकी पुत्री लावण्या शाह भी प्रवासी ज़मीन में निवसते हुए भी न केवल पिता के योगदान को जीवंत बनाये रखने के लिए क्रियाशील हैं अपितु स्वयं अपनी रचनात्मकता से अंतरजाल पर हिंदी लेखन को समृद्ध कर रही हैं । पं. नरेन्द्र शर्मा जी के व्यक्तित्व के कई भावनात्मक पहलुओं को बता रही हैं - संप्रति अमेरिका निवासी साहित्यकार पुत्री आदरणीया लावण्या शाह जी ।

 

  - लावण्या जी, आप उम्र के इस मुकाम में, वह भी विदेशी भूमि में रहते हुए, रचना-कर्म से संबंद्ध है । यह हम भारतीयों के लिए गौरव की बात है । लेखन की शुरूआत कैसे हुई ? अपनी रचना-यात्रा के बारे में हमारे पाठकों को बताना चाहेंगी ?

   जयप्रकाश जी व अन्य लेखक-कवि मित्रों और समस्त पाठकों को मेरा सादर नमस्कार! भारत से मेरी भौगोलिक दूरी अवश्य हुई है किंतु आज भी हर प्रांत के प्रति मेरा आकर्षण उतना ही प्रबल है । यूँ लगता है मानो, विश्वव्यापी, विश्वजाल का संयोजन और आविष्कार शायद वृहत भू-मंडल के बुद्धिजीवी वर्ग को एक समतल पृष्ठभूमि प्रदान करना और अनन्योआश्रित, विचार व संप्रेरणा प्रदान ही इसका आशय हो और उद्भव का हेतु । अगर आप मेरे निजी जीवन के बारे में पूछ रहें हैं तो यह कहना चाहती हूँ कि -

"उम्र का बढ़ना न कह कर, उम्र का घटना कहो !

सफ़र में हर एक डग को, सफ़र का कटना कहो !"

(संदर्भः अप्रकाशित काव्य संग्रह 'बूँद से साभार' - पं.नरेन्द्र शर्मा)

       और ऐसी अनेक काव्य पंक्तियाँ मेरे दिवंगत पिताजी स्व.पं.नरेन्द्र शर्माजी की लिखी हुई हैं और वे दीप-शिखा की तरह मेरा मार्ग प्रशस्त करती रहती हैं । कविता देवी के प्रति रुझान और समर्पण भाव शायद पिता से मिला है, नैसर्गिक देन ही है । मेरी अम्मा स्व.श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्माजी ने एक खास " बेबी-रेकॉर्ड बुक" में लिखा था- लावण्या आज 3 वर्ष की हो गई है और कहती है कि उसने कविता रची है- "मैं तो माँ को मेरा मन कहती हूँ रे ! " और उसके बाद मेरी बड़ी मौसीजी स्व. विंध्यावतीजी जिन्हें हम 'मासिबा' पुकारते थे ने एक बड़ी सुंदर हल्के रंग पीले रंग की डायरी मुझे उपहार स्वरूप दी थी और आशिष के साथ कहा था कि- "इसमें अपनी कथा-कहानी और गीत लिखती रहना ।" बालकथा-3, सहेलियों की साहस गाथा इत्यादि उसी से शुरू किया था मैंने । आज मुड़कर देखती हूँ तो शैशव के वे मीठे दिवस और उत्साह को अब भी अक्षुण्ण पाती हूँ । मैने लिखकर बहुत सारा रखा हुआ है ।  अब उसे छपवाना जरुरी, लग रहा है ।  प्रथम कविता-संग्रह, " फिर गा उठा प्रवासी " बडे ताऊजी की बेटी श्रीमती गायत्री, शिवशंकर शर्मा "राकेश" जी के सौजन्य से, तैयार है । " प्रवासी के गीत" पापाजी की सुप्रसिद्ध पुस्तक और खास उनके गीत "आज के बिछुडे न जाने कब मिलेँगे ? " जैसी अमर कृति से हिदी साहित्य जगत से संबंध रखने वाले हर मनीषी को यह बताते अपार हर्ष है कि, यह मेरा विनम्र प्रयास, मेरे सुप्रतिष्ठित कविमनीषी पिता के प्रति मेरी निष्ठा के श्रद्ध-सुमन  स्वर स्वरुप हैं । शायद मेरे लहू में दौड़ते उन्ही के आशिष, फिर हिलोर लेकर,   माँ सरस्वती की पावन गँगा को पुन: प्लावित कर रहे हों, क्या पता ? जो स्वाभाविक व सहज है, उस प्रक्रिया को शब्द बंधन से समझाना नितांत कठिन हो जाता है ।

    सृजन स्वाभाविक व सहज है । उस प्रक्रिया को शब्द बंधन से समझाना उतना ही कठिन हो जाता है । सृजन भी कुछ ऐसी ही दुरूह क्रिया है । हो सकता है कि आप जैसे उत्साही बुद्धिजीवियों के इस प्रयास से "सृजनगाथा" में परिणत हो जाये । आप भारत के छत्तीसगढ़ प्रांत से आज हिंदी साहित्य के सर्वांगीण विकास के प्रति सजग है, क्रियाशील है, कटिबद्ध है । और आपका यह यज्ञ सफल हो, यह मेरी भी इच्छा है । अस्तु स्नेहाशिष और बधाई ।

  - क्या प्रवासी संसार में रचनाधर्मिता प्रभावित नहीं होती ? जहाँ आप निवसती हैं वहाँ का सृजनात्मक माहौल कैसा है ? खासकर हिंदी, साहित्य लेखन के कोण से ।

  प्रवासी भारतीय अलग-अलग परिस्थितियों में रहते हैं । सबका अपना-अपना कार्यक्षेत्र होता है । पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और अन्य संगठन होतै हैं । जिनमें उनकी सक्रियता समय ले लेती है । मेरी रचना-प्रक्रिया स्वांतःसुखाय तो है ही, साथ ही विश्वजाल के ज़रिये असंख्य हिंदीभाषी वेबपत्रिकाओं व जालघरों से मेरा लगातार संबंध बना रहता है । जैसे- जैसे- अर्पन आनलाइन,  एनआरआई, एफएम, मनस्कृति, हिंदीनेस्ट लेखक, हिंदी नेस्ट बचपन, अभिव्यक्ति, बोलोजी, आदि ।

 

      आज के युग का  "गूगल" चमत्कारिक आविष्कार, आपको, अंतरजाल पर, ' मेरा नाम, "लावण्या शाह " टाइप करेंगें तो तुरंत कई  सारी मेरी लिखी सामग्री, आपके सामने, अल्लादीन के चिराग की तरह, सिर्फ चंद क्षणों में, आपके सामनेप्रस्तुत कर  देंगीं । आज २१ वीं सदी के आरंभ मे, लेपटाप के जरिये, समस्त जगत की गतिविधियों से जुडना आसान सा तरीका हो गया है  । मेरे पति श्री दीपकजी के साथ अक्सर काम के सिलसिले मे  यात्रा पर लिखने पढने की सामग्री मेरे साथ रहती है और विशुद्ध शाकाहारी, खानपान की सुविधा भी । आजकल मैं पापाजी की कविताओं का गुजराती  अनुवाद करती रहती हूँ । गुजराती अम्मा से विरासत में मिली  मेरी मातृभाषा रही है और पापाजी ने हम ३ बहनों को गुजराती माध्यम की पाठशाला में ही रखा था । उनका कहना था कि, " पहले अपनी भाषा सीख लो, फिर विश्व की कोई भी भाषा को सीखना आसान होगा ।" मेरे इस उत्तर में यह भी साफ है कि पाश्चात्य जगत में  अँगरेज़ी  का वर्चस्व है  । भारत और चीन की उन्नति ने इस समाज की आँखें खोल दीं हैं । अगर भारत विश्व का तेजी से सम्पन्न होता हुआ, विकासशील देश है तब, उसके वैभव व सम्पन्नता में शामिल होना समझदारी का पहला कदम होगा । परंतु  स्वयं भारत में बदलाव जरुरी है । भारत के महानगरों से पढ-लिखकर शिक्षित वर्ग, जीवन-यापन की दौड़ में अक्सर विदेश ही पहुँचा है। इंजीनियर, डॉक्टर और तकनीकि विशेषज्ञ बहुधा ब्रिटेन या अमेरिका आकर तगड़ा वेतन पाना चाहते हैं - भले ही, मन से वे भारतीय संस्कृति से विलग नही हो पाते । फिर भी परिवार की समृद्धि व खुशहाली के लिये, परदेस आकर बस जाते हैं । यह स्थिति आज बदलने लगी है और ये खुशी की बात है की आनेवाले कल को प्रबुद्ध  विश्व नागरिक जैसी अपनी संतानों के पुनरागमन से और ज्यादा सम्पन्नता मिले ! मेरी यही प्रार्थना है कि, आनेवाला कल, यह शताब्दि, भारतीय संस्कृति की गौरव - गाथा बने जिसका वर्णन हम और आप साथ साथ पढें ।  हिंदी लेखन जब तक हिंदी लिखनेवाले और बोलनेवाले जहाँ कहीं भी रहेंगें, अबाध गति से आगे बढते रहेंगे ।  हाँ, आगामी पीढी हिंदी से जुडी रहती है या नहीं इस बात से ही भविष्य के हिंदी लेखन का स्वरुप स्पष्ट होगा  ।  

  - अपने वर्तमान निवास राज्य में आप हिन्दी और हिन्दी साहित्य, संस्कृति और सभ्यता की स्थिति कैसे मापना चाहेंगी ? 21 वीं सदी में वहाँ हिन्दी का भविष्य कैसा होगा  

  आज २१ वीं सदी के आरंभ मे, लेपटाप के जरिये, समस्त जगत की गतिविधियों से जुडना आसान सा तरीका हो गया है  । मेरे पति श्री दीपकजी के साथ अक्सर काम के सिलसिले मे  यात्रा पर लिखने पढने की सामग्री मेरे साथ रहती है और विशुद्ध शाकाहारी, खानपान की सुविधा भी । आजकल मैं पापाजी की कविताओं का गुजराती  अनुवाद करती रहती हूँ । गुजराती अम्मा से विरासत में मिली  मेरी मातृभाषा रही है और पापाजी ने हम ३ बहनों को गुजराती माध्यम की पाठशाला में ही रखा था । उनका कहना था कि, " पहले अपनी भाषा सीख लो, फिर विश्व की कोई भी भाषा को सीखना आसान होगा ।" मेरे इस उत्तर में यह भी साफ है कि पाश्चात्य जगत में  अँगरेज़ी  का वर्चस्व है  । भारत और चीन की उन्नति ने इस समाज की आँखें खोल दीं हैं । अगर भारत विश्व का तेजी से सम्पन्न होता हुआ, विकासशील देश है तब, उसके वैभव व सम्पन्नता में शामिल होना समझदारी का पहला कदम होगा । परंतु  स्वयं भारत में बदलाव जरुरी है । भारत के महानगरों से पढ-लिखकर शिक्षित वर्ग, जीवन-यापन की दौड़ में अक्सर विदेश ही पहुँचा है। इंजीनियर, डॉक्टर और तकनीकि विशेषज्ञ बहुधा ब्रिटेन या अमेरिका आकर तगड़ा वेतन पाना चाहते हैं - भले ही, मन से वे भारतीय संस्कृति से विलग नही हो पाते । फिर भी परिवार की समृद्धि व खुशहाली के लिये, परदेस आकर बस जाते हैं । यह स्थिति आज बदलने लगी है और ये खुशी की बात है की आनेवाले कल को प्रबुद्ध  विश्व नागरिक जैसी अपनी संतानों के पुनरागमन से और ज्यादा सम्पन्नता मिले ! मेरी यही प्रार्थना है कि, आनेवाला कल, यह शताब्दि, भारतीय संस्कृति की गौरव - गाथा बने जिसका वर्णन हम और आप साथ साथ पढें ।  हिंदी लेखन जब तक हिंदी लिखनेवाले और बोलनेवाले जहाँ कहीं भी रहेंगें, अबाध गति से आगे बढते रहेंगे ।  हाँ, आगामी पीढी हिंदी से जुडी रहती है या नहीं इस बात से ही भविष्य के हिंदी लेखन का स्वरुप स्पष्ट होगा  ।

  -अपने वर्तमान निवास राज्य में आप हिन्दी और हिन्दी साहित्य, संस्कृति और सभ्यता की स्थिति कैसे मापना चाहेंगी ? 21 वीं सदी में वहाँ हिन्दी का भविष्य कैसा होगा  -

  जैसा कि मैंने आगे कहा है, हिंदी भाषा का विकास पहले तो हम भारतीय, भारत में प्रशस्त करें । राजधानी नई देहली में ही, कितने वरिष्ठ नेता हिंदी को अपनाये हुए हैं ? बडे शहरों के अँगरेज़ी माध्यम से पढे लिखे लोग क्या हिंदी को फिल्मों के या टी.वी. कार्यक्रमो से परे, की भाषा मानते हैं ? सोचिये, अगर आप खुद उसी वर्ग के होते तब आपका झुकाव हिंदी साहित्य के प्रति इतना ही समर्पित रहता ? उत्तर भारत हिंदी भाषा का गढ रहा है और हमारी साँस्कृतिक घरोहर को हमें  एक सशक्त्त और सम्पन्न भारत में, इस २१ वीँ सदी में, आगे बढाना है । अमेरिका और ब्रिटेन की अपनी अलग सभ्यता और समृद्ध भाषा है । अमरीका के विषय में इतना अवश्य कहूँगी कि, आज, एडी-चोटी की मेहनत से, विश्व का सर्विपरि देश बना हुआ है । यहाँ, संगीत की कई भिन्न शाखाएँ हैं और हर सप्ताह, हर विधा में हजारों नए गीत रचे जाते हैं । लोक प्रसारण के माध्यमों का अपने हित में अपने प्रचार में उपयोग करना इन सभी क्रियाओं में वे सिद्धहस्त हैं । अफसोस की बात यह है कि एम. टी. वी. और सीएनएन  जैसे कार्यक्रमों की देखादेखी भारत की मीडिया भी अँधाअनुकरण कर रहे हैं । सर्वथा भारतीय विषय वस्तु और ठोस तत्वों से संबंधित, सर्वथा भारतीय प्रकारके कार्यक्रम ही कालजयी बन पायेंगें जिसमें सार नहीं वह, काल की लपटों में जलकर भस्मीभूत हो जायेगा । ऐसा मेरा मानना है ।