सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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अंक-4, सितम्बर, 2006   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

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एक शब्द

भाषाःक शब्द.... लगाना- डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

मीडिया-विमर्श.....समसामयिक पत्रकारिता का परिदृश्य- संजय द्विवेदी

विचार.....मृत्यु पर विजय- पुष्करलाल केडिया

लोक-आलोक....जिन्ने ट्रिनबैगो (ट्रिनिडाड-टुबैगो) नहिं देख्याद- सुवास कुमार

तकनीक.....इंटरनेट पर उपलब्ध हैं रोजगार- रविशंकर श्रीवास्तव

मूल्यांकन.....आनुवाद यानी तलवार की धार- वीरेन्द्रकुमार वरनवाल

प्रसंगवश.....शरद जी की लेखन विधा का मूल सौंदर्य- राम पटवा

अंतरजाल.....हिंदी मीडिया की दिशा बदल सकता है यूनिकोड- बालेन्दु शर्मा दाधीच

 
 

लगाना

डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

 

      ब्दकोश में 'लगना' के अनेक अर्थ दिये गये हैं । सामान्यतः लगाना  का अर्थ जोड़ना, संलग्न करना, रोपना क्रम में रखना आदि होता है। लगाना क्रिया है । पर यही लगाना जब औरों के साथ लग जाता है तो अपने अर्थ बदल लेता है गाय दुहने को गाय लगाना और किसी चीज से कटने, टकराने आदि को लगाना या लग जाना कहते हैं । आग लगाना भी बहुअर्थी है। जंगल में खर-पतवार जलाने के पिये आग लगाई जाती है, दुश्मनी के कारण उनके घर-खेत खलिहान और बरेजों में आग लगाना भीतर की आग शान्त की जाती है, पर प्रेम की आग सबसे अलग होती है। भीतर जो ाग लगती है या तो लगाने वाला जानता है या जिसके भीतर लगती है। लावनहारा जानिहे कै जिहि लाई होय । इसका लौ (आग भीतर ही भीतर जलती है। आग लगाने का एक अर्थ इधर की बातें उधर करके दुश्मनी पैदा करना भी होता है। उसने ऐसी आग लगाई कि सर्वनाश ही हो गया। वैसे लगन भी लगाई जाती है। यह लगन आरध्य के प्रति हो सकती है और इच्छित वस्तु या जीव के लिए भी । भक्त के भीतर जो लगन लगती है वह भी व्याकुलता पैदा करती है। भक्त कहता है- मैने तो प्रभु से लगन लगाई । खेतों में पानी देने को पानी लगाना  कहते है। गन्ना या धान या अन्य खेतों में जो नहर का पानी पहुँचाया जाता है उसे पानी लगाना कहते हैं ।

 

       आँखों तो ऐसी कलाकार है कि वे कहीं भी लग जाती हैं । कभी नींद आने को आंख लगना कहा जाता है-जरा आँख लगी और चोर सामान ले गये और कभी यही आँखें किसी प्रेमी से लग जाती हैं । इन्हें नियंत्रित करना कठिन है- तोरे तिय तुरंग से नैना । लाज लगाम लगै ना।कई मनचले जबरन आँख लगाने की चेष्ठा करते हैं । नजर लग जाये तो बच्चे क्या, बूढ़ों तक को झड़वाना पड़ता है। नज़र लगना बड़ा खराब होता है। पढ़ने में चित्त लगाने को कहो तो बच्चों-युवकों को बुरा सा लगता हैपर वही लोग अपना चित्त यहाँ-वहाँ लगाकर सेहत और समय खराब करते रहते हैं । चित्त लगने पर लोग दूसरों पर चोरी का इलजाम लगाते हैं ।उसने मेरा चित्त चुरा लिया । निरपराध को चोरी लगाना अच्छी बात नहीं है। कभी कभी गुस्से में लोग मार भी लगा देते हैं और कभी बाय लगाकर राह से कुराह ले जाते हैं । कुछ कुचाली सिखा-पढ़ाकर पमचलों को किसी के पीछे लगा देते हैं ।पीछे लगने वालों को पिटाई भी लगाई जाती है। वैसे दुनिया की हवा जिसे बाय कहते हैं वह किसी को भी लग सकती है। जिस मन को बाय लग जाती है उसका मन कहीं नहीं लगता । मन लगाना चाहें तो भी विवश रहता है, लगता नहीं । कहीं का कहीं चला जाता है ।

 

       लगाना और लगना सहोदर हैं ।जहाँ एक है, वहीं दूसरा भी लगभग उपस्थित रहता हैं ।मन लगतना है, आँखों लगती हैं, चोट लगती है, दवा लगती है, दुवा लगती है। बात लगती है, लगन लगती है, लौ लगती है, हवा लगती है। कई बार बच्चें किसी के अंग लग जाते हैं, यानी हिलमिल जाते हैं। अपने लोग गले लगते है, लगाते हैं और प्रेम भाव व्यक्त करते हैं । दशहरा, होली, ईद आदि में सभी एक दूसरे को गले लगाते हैं ,गले मिलते हैं । जैसे बाय लगती है, वैसे ही करहते हैं कि भूत-चुड़ैल भी लग जाती है। इसके लिये लोग झाड़-भूंक, टोना-टोटका करते हैं ।कुछ लोगों का ख्याल है कि यह केवल अंधविश्वास है, पर जिसे लगती है वही उसकी पीड़ा जानता है। पान में चूना लगाकर आने से ओठ लाल हो जाते हैं, मजा आता है लेकिन जब किसी को चूना लगाकर धोखा दिया जाता है, तो पूरा चेहरा तमतमाकर लाल हो जाता है । चूना लगाने की कला अलग ही होती है । कोई-कोई बात इतनी तीखी होती है कि वह सीधे करेजे में लगती है । लगी करेजे चोट ऐसी चोट से भीतर ही भीतर लगी लग जाती है यानी बैरभाव उत्पन्न हो जाता है। कई लोग उस लगी को चुकाकर बदला भी ले लेते हैं ।

 

        वैसे लगना का अर्थ जान पड़ना, कसकना, गड़ना किसी चीज से कटना आदि भी होता है । गाँव में पायलागी पांव लगने या चरण छूने के लिए प्रयुक्त होता है। कई बार आँखें किसी की राह की ओर लगी रहती हैं, प्रतीक्षा करती हैं और कान किसी का स्वर सुनने के लिये उसी ओर लगे रहते हैं । गोपिकाओं की आँखें कृष्ण की राह की ओर और कान बंशी की ओर लगे रहते थे। यह लगना शब्द कहीं भी लग जाता है पर हमें संभालकर लाना चाहिये ताकि गलत जगह न लग जावें ।

 

 

 

 

विद्या की परिपूर्णता का कोई बिन्दु नहीं होता- टॉमस जे. वाट्सन   

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

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