सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

E-mail-srijangatha@gmail.com   

 

 

 

अंक-4, सितम्बर, 2006      

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

बचप

सीताराम गुप्त के शिशुगीत

प्रेरक प्रसंग/ वाणी का महत्व/ प्रगति

बाल कविता- वर्षा का आनंद उठायें, नाना जी के आँगन में

 

 

 

प्रेरक प्रसंग

 वाणी का महत्व

             बात प्राचीन समय की है । एक राजा जंगल की सैर पर निकले थे । उनके साथ सैनिकों का दल भी था । घूमते-घूमते राजा को प्यास सताने लगी । यह जानकर सैनिक पानी की तलाश में निकल पड़े । उन्होंने देखा कि एक कुआँ है जहाँ एक अंधा व्यक्ति राहगीरों को पानी पिला रहा है । सैनिकों ने उसे निर्देश के स्वर में कहा- अंधे ! एक बड़े लोटे में पानी भर कर दो ।

 

            अंधे को सैनिकों का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा । उसने कहा- मैं आप लोगों को पानी नहीं दे सकता ।राजा के सिपाही गुस्से में वापस आ गये ।  पानी नहीं ला पाने की कहानी जब सेनापति ने सुना तो वह भी कुएँ की ओर चल पड़ा । अंधा लोगों को पानी पिला ही रहा था । सेनापति ने उससे कहा- अंधे भाई, जरा मुझे एक लोटा पानी तो देना, प्यास से हाल बेहाल है ।अंधे को लगा कि यह सैनिक का सरदार है जरूर पर मन से कपटी है और ऊपर से मीठा-मीठा बोलता है । उसने सेनापति को भी साफ कह दिया कि पानी नहीं मिल सकेगा ।

 

       जब यह घटना राजा के कानों तक पहुँची तो वे मन-ही-मन मुस्काये और चुपचाप कुँए की ओर चल पड़े । वे आगे-आगे, सैन्य-सामंत पीछे-पीछे । उन्होंने अभिवादन कर बोला, बाबा जी, प्यासा हूँ, थोड़ा पानी पिलाने की कृपा कर देंगें क्या ?इस पर अंधे को बहुत प्रसन्नता हुई । उसने कहा, जी राजा साहब, अभी पानी पिलाता हूँ, आप यहाँ विराजें ।

 

            अपनी प्यास बुझाने के बाद उन्होंने अंधे व्यक्ति से पूछा, बाबा, आप देख नहीं पाते फिर भी कैसे जान पाये कि एक सिपाही, एक सेनापति और मैं राजा हूँ ?”

 

            अंधे व्यक्ति से बड़ी सहजता से कहा, महाराज, व्यक्ति की वाणी ही उसके व्यक्तित्व का ज्ञान कराती है कि व कितना शिष्ट और सभ्य है ।

 

प्रगति

 

 

 

वर्षा का आनंद उठायें

 

रिमझिम-रिमझिम बरसा पानी । 

भींगी सबकी छप्पर छानी ।

टर्र-टर्र कर मेढ़क बोले ।

बच्चों ने दरवाजे खोले ।

शोभित ने आवाज़ लगाई ।

शोर मचाते हो क्यों भाई ।

बोले मेंढ़क- तुम भी आओ ।

पोखर में डुबकियाँ लगाओ ।

एक साथ मिल गाना गायें ।

वर्षा का आनंद उठायें ।

0 अनिल द्विवेदी तपन

 

 

 

नाना जी के आँगन में

 

दाना चुगती, चिड़िया रानी

नाना जी के आँगन में ।

चींचीं चूँचूँ गाना गाती

नाना जी के आँगन में ।

 

बड़ी सलोनी है मतवाली

खूब फुदकती डाली-डाली ।

रंग जमाने को आ जाती

नाना जी के आँगन में ।

 

नदियाँ-झीलें, ताल-तलैया

खेत-खार में जाती भैया ।

फिर सुस्ताने आ जाती है

नाना जी के आँगन में ।

 

0 प्रमोद कुमार पुष्प

 

 

 

क्रोध में आदमी केवल दूसरों को दिल दुखाना चाहता है - प्रेमचंद

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ