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कविता और चिड़िया
कविता
और
चिड़िया में कोई
साम्य हो,
न हो, 'उड़ान'
की
अद्भुत क्षमता
होती है ।
दरअसल यह उड़ान ही दोनों की जीवंतता का रहस्य है । कविता निराकार शून्य
में
विचरती हुई संपूर्ण बनती है और
चिड़िया भी जीवन भर निराधार शून्य में जाने
क्या
तलाशती रहती
है । शून्य में कलाबाजी दिखाने में ईश्वर के बाद संभवत: कविता और
चिड़िया ही समर्थ हैं । 'उड़ान'
भी
कैसी ?
रंगमय,
रूपवान,
रसदार !
निराकार में साकार
की रचना
कविता और चिड़िया के अलावा और कौन करता है
?
कविता का आकाश मन है और
चिड़िया का मन आकाश में होता है । मन कविता का आकर्षण है और आकाश चिड़िया का
। मन और
आकाश का
आकर्षण उनकी शून्यता में है । यह शून्यता निर्मलता का भी पर्याय है ।
प्रदूषित मन और आकाश में आकर्षण की उपस्थिति नहीं होती । निर्मलता ही
'उड़ान'
का
केन्द्र है,
जिससे कविता
और चिड़िया दोनों चित्तरंजक बन जाते हैं । मनुष्य का स्वभाव
है-चितरंजक का सान्निध्य । चित्ताकर्षक वही हो सकता है,
जो
सर्वदा सत्य हो । सत्य
होगा
तो निश्चय ही उसमें आनंद की संप्राप्ति होगी । यही सत्,
चित्
और आनंद है ।
मनुष्य इसी
सच्चिदानंद को तलाशता है,
जाने या
अनजाने । कविता और चिड़िया दोनों
मनुष्य के लिए सुखद हैं,
सच्चिदानंद
के विषय हैं ।
कविता
स्वयं में मनुष्यता का
स्वप्न है । उसे अराजक घोषित करके पाबंदी के घेरे में लाने की कुचेष्टा और
चिड़ियों
को पिंजरे
में जकड़ने की मानसिकता में बुनियादी तौर पर मुझे किंचित् अंतर नहीं दिखाई
देता
। कविता की उड़ान चिड़िया-सदृश होनी चाहिए । उड़ान तो कविता में अंतर्निहित
होती
है । उड़ान
रहित कविता फुदक सकती है,
उन्मुक्त गगन
में उड़ नहीं सकती । कुछ आचोलक
यथार्थ को कल्पना के बरक्स खड़ा कर देते हैं । यथार्थ तो क्षणिक होता है ।
यथार्थ हर
क्षण बदलता
है । हर क्षण का एक विशेष यथार्थ होता है । फिर यथार्थ ऐसा नीम होता है,
जिसके
स्वाद और गंध से मन बिदकने लगता है । नीम में थोड़ा गुड़ और थोड़ा केवड़ा मिला
दिया
जाय तो क्या कहना ! नीम का अनुभव भी हो जाय और मन भी कड़ुआने न पाये ।
कविता
संवाद है ।
उसे वाद-विवाद की खाई में धकेलना बहेलिए का काम है । भावों की अनन्त
आकाश
में कवि जब तक नहीं उड़ेगा,
उसकी कविताई
उस पतंगबाज के तरह ही सिध्द होगी,
जो
चाहे
जब,
चाहे जिधर,
पतंग
की दिशा तो मोड़ सकता है पर कविता कोई पतंग नहीं,
वह तो
पक्षी
है,
जो अपने डैने
से हवा को काटते हुए सिर्फ उड़ना जानती है । मौसम के व्याकरण
से
उसे ज्यादा क्या लेना-देना ?
ऑंधी चली,
बिजली
कड़की,
ओले गिरे,
तो थोड़ा थम
लिया,
फिर उड़ान,
उड़ान,
और
सिर्फ उड़ान .......
चिड़िया गाती है,
गुनगनाती है
। कविता भी
गेय है ।
कविता में भी कलरव होता है । यह कलरव कविता का सौंदर्य है । ध्वनिवादियों
के
यहाँ कलरव को ही कविता कहा गया है । कुछेक मीमांसाकार सौंदर्य से कहीं
ज्यादा
सार्थकता का
समर्थन करते हैं। कविता में सर्वदा सार्थकता का आग्रह प्रकारान्तर से
अतिवाद है । सच है कि सौंदर्य और सार्थकता के द्वंद्व में हम बहुधा
सार्थकता को
पक्ष में जा
खड़े होते हैं,
किन्तु यह भी
उतना ही सच है जो इस विवशता से छुटकारा
पाते
ही सौंदर्य की समीपता के लिए छटपटाने लगते हैं । नन्हे बच्चों को अर्थहीन
शब्दों को गाते-दोहराते सुनकर हम उनकी सार्थकता पर
अँगुली नहीं उठाते,
बल्कि
गाने-दोहराने के रिदम पर,
सौंदर्य पर
रीझ-रीझ जाया करते हैं । उनके गान में हमें
कोई
अर्थ नहीं मिलता,
संभवत: उनके
लिए कोई अर्थच्छवि ही हों । बहरहाल ,
विहंग-गान
यानी कलरव में हम पक्षी
विज्ञानी हुए बिना,
समझे बिना भी
रस लेते हैं, जैसे
एक चिड़िया दूसरी
से कह रही हो,
'यहाँ
आओ न ! कहाँ हो तुम?'
तो दूसरी
चिड़िया कहती हो, 'तुम
आओ;
देखो,
गदराये फलों से लदी डालियाँ हैं यहाँ।'
कविता और चिड़िया दोनों के सर्जकों के
व्यक्तित्व में काफी मेल होता है । कविता कवि के अनुभव,
भावना
और बुध्दि की उपज है,
तो चिड़िया
प्रकृति या ईश्वर की । कवि को उसकी साधना के लिए
'ब्रह्म'
कहा
गया है ।
कविता का
मर्म एकान्त में खुलता है,
ठीक उसी तरह
चिड़िया का मर्म भी किसी चिड़ियाघर
के
शोरगुल में नहीं,
किसी निर्जन
वन में खुलता है । या फिर फूटते हुए भोर और चुकती
हुई
रात के बीच के एकांत में । कविता और चिड़िया उजियारे की ही मुनादी करती हैं
।
चिड़ियों की
प्रभाती से पहले सुरुजनारायन कभी नहीं जागते । कवियों के बारे में भी
मान्यता है,
अगर वह
ईमानदार है तो उसकी हर गुनगुनाहट अक्षरों में पहले रूपायित
होगी,
भोर
बाद में होगा ।
लोक विश्वास है-चिड़िया बहेलिया और साधु को पहचानने में
नहीं
चूकती। यदि उन्हें यह पता चल गया कि समीप पहुँचने वालों से नुकसान है तो
चिड़ियों में एकाएक हलचल मच जाती है । कविता भी अमानवीय पदचापों को भाँपकर
खतरों से
सावधान कराने
वाली हलचल है । हलचल जो बाहर नहीं,
भीतर-भीतर होता है :
दरअसल
कविता
ऑंख है
–
जिसमें भीतर की दुनिया
बाहर दिखाई देती है
दरअसल कविता
हथियार
है
जिसमें
बाहर की लड़ाई
भीतर लड़ी
जाती है
दरअसल
कविता क्या है ?
कविता है
या ऑंख या हथियार
दरअसल कविता
एक नन्हीं गौरैय्या है
जिसकी
चोंच में
सारा आकाश
है
(
डॉ. बलदेव,
साक्षात्कार,अंक
14,दिस.89-फर.90
)
स्मृति की सदानीरा कविता में कभी नहीं सूखती । स्मृति भविष्य
के
लिए बाधा नहीं,
वह भविष्य की
कविता है । अतीत के स्मरण में कुछ किरणें भी उभरती
हैं,
जिससे
भविष्य का चेहरा साफ-साफ दिखाई देता है । चिड़िया भी स्मृतिवान होती हैं
।
वन-पर्वत,
नदी-नाले,
गाँव-शहर,
देश-विदेश की
यात्रा के बाद
अपनी जमी-जमायी जमींदारी
छोड़कर
घर तक लौटने से उन्हें कोई नहीं रोक पाता । बदलते हुए मौसम से आदतन परदेशी
बन
जाते
छत्तीसगढ़िया आदमी को भले ही गाँव-घर की सुध न आये,
पर कई
प्रवासी पक्षी ऐसे
हैं,
जो
उसी दिन वापसी के लिए डेरा उसाल लेते हैं,
जिस
दिन वे गत वर्ष वापस आए थे ।
रसिक
पाठक या श्रोता का मन कविता का श्रेष्ठ घर है । चिड़ियों के तो
सैकड़ों-हजारों-लाखों घर हो सकते हैं,
पर
कविता का कोई एक घर नहीं होता । कविता
स्वयं
एक घर है,
कविता घरवादी
है,
पर उसे
वन-कानन का दुराव नहीं । चिड़िया मूलत:
आकाशचारी है,
पर उसे
घर-द्वार का परहेज नहीं । इस स्वभाव-साम्य के कारण मनुष्य की
दुनिया में कविता और चिड़िया जुड़ते चले गये । उसने गौरैय्या को उसकी
कूड़े-करकट
वाली विरासत
के साथ भी अपनी बैठकी में आश्रय दिया । सुग्गा-मैना- तीतर-बटेर को
संतान
की तरह पाला । खेत-खार भटक-भटक कर चारा जुटाया । पीतर-तृप्ति के लिए कौओं
को
श्राध्द
खिलाया । चाणक्य की नजरों में भले ही कौआ पक्षियों में चांडाल हो,
उसकी
वाणी
भले ही कर्कश हो,
पर लोकगीतों
में वह शगुन का संदेशिया बन गया-'काग
के भाग बड़े
सजनी.....।'
लोक-कथाओं की मुर्गी सोने के अंडे देने लगी । दादाजी का कबूतरों को
हथेलियों से चावल,
उड़द,
मूँग
के दाने चुगाने का सिलसिला सबके लिए धर्म की पगडंडी हो
गयी ।
हरी-भरी पत्तियों की ओट में शांत बैठे नीलकंठ को देख पथिकों के भीतर
शुभ-शकुन
दिखाई देने
लगे ।
प्राक् ॠषि दत्तात्रेय ने बड़ों-बड़ों को गुरु बना डाला,
ज्ञान
की
सीमा फिर भी वे छू न सके,
सो शुक के भी
शरणागत हो गये । गरुड़ विष्णु का संगी हो
गया ।
लक्ष्मी ने उल्लू को चुन लिया । सरस्वती तो नीर-क्षीर विवेक प्रिय हैं ।
उन्होंने हंस के साथ संधि -पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया । गोप वृदांवन के
कानन में
गायें चराते-चराते नंदलाल ने मोर क्या देखा,
जीवन भर अपने
मस्तक पर मोर पंख सजाये रखा ।
डाकिए
कबूतर नहीं होते,
तो शाहजहाँ
और नूरजहाँ की मुहब्बत परवान न चढ़ती ।
यह
चिड़िया ही थी,
जिसकी
वेदना से करुणा भी व्याकुल हो उठी । ॠषि मन का संताप पहली
कविता
बन गयी:
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वगम: शाश्वती:समा: ।
यत्
क्रौच्ञमिथुनादेक मवधी:
काममोहितम्
॥
(श्रीमद्ववाल्मीकीय
रामायण,
बालकांड
2/25)
क्रौंचों की पीड़ा से कविता का जन्म होना कोई मानसिक घटना नहीं,
मानव
संस्कृति के इतिहास का वह खास मोड़ है,
जहाँ
से शाब्दिक चेतना की शक्ति भी मानव से
संबध्द हो गई । इसका सारा श्रेय क्या सिर्फ वाल्मीकि के कवि को है
?
क्या उस
चिड़िया
को मात्र
निमित्त कहकर टाल देना उचित होगा ?
नहीं
ना ! चिड़िया सिर्फ चिड़िया नहीं,
मौसम
के अग्रदूत हैं । चिड़िया हैं तो बसंत है,
हेमन्त है,
शिशिर है ।
चिड़िया नहीं,
तो भोर का
विश्वास कहाँ,
चिडिया नहीं
तो शाम का उल्लास कहाँ ! छोटा-सा जीव होकर भी
वह
जाने कितनी भूमिकाओं का निर्वाह करती है । वह प्रकृति का संदेशवाहक है,
संगीतकार
है,
नर्तक
है,
जमादार है,
जमींदार भी है । ऐसा कौन कवि होगा,
जिसकी
कविता-वृक्ष की
डाल पर कोई न
कोई चिड़िया घड़ी भर सुस्तायी न हो,
या
फिर वहाँ उसके उड़ जाने के बाद की
उदास
स्मृति न हो ।
कबीर के लिए घर 'चिड़िया
रैन बसेरा'
है,
फिर
भी संसार की
रसमयता को तज
अकेले चल पड़ने वाले हंस (जीव) के मन में छोह तो है:
हंसा प्यारे
सरवर तजि कहँ
जाय
जेहि
सरवर बिच मोतिया चुगते,
बहुविधि के
लि कराय
सूखे
ताल
पुरइन जल
छाडे,कमल
गये कुम्हिलाय
कहै कबीर
जो अबकी बिछुरे,
बहुरि मिलो
कब
आय
चातक कभी घोंसला नहीं बनाता,
लेकिन उसने
भी तुलसी के कविता-वृक्ष में जैसे
अपना
स्थायी निवास बना लिया । आखिर क्यों नहीं
?
वहाँ स्वाति
की 'आस'
जो
है।
पपीहा आदि विहंग-वृंद के साथ भक्त कवियों के छंद गूँजते रहे,
पर
हंस तो जैसे
भक्ति-काव्य
का सिरमौर ही बन गया । इस समय का शायद ही कोई कवि होगा,
जिसने
जीवन की
निस्सारता पर
'हंस'
के उड़
जाने का बिम्ब न खींचा हो । वहाँ कविता ने समूची
मानव-जाति को 'पक्षी' कहकर
चेताया,
और संसार को
'वृक्ष',चाहे
वह सगुणवादी हो या
निर्गुणवादी:
सुन्दर पक्षी वृक्ष पर,
लियौ बसेरा
आनि
राति रहे
दिन उठि
गये,त्यौं
कुटंब सब जानि
(स्वामी
सुंदरदास)
जब कविता देह की आभा में खो गई
थी,
तब भी
उसने पक्षियों को नहीं बिसराया । बल्कि नायिका के अंग-प्रत्यंगों में
पक्षीगण ही झलकने लगे । सुन्दरी बाला की नाक तोता हो गई,
उसके
नयन खंजन,
ग्रीवा
सारस
और वाणी कोकिला ।
आधुनिक काल की कविता में चिड़ियों का प्रजातंत्र है ।
यहाँ
जाने-अनजाने सभी चिड़ियों की चहक है । कुररी को उदास पाकर मुकुटधर पांडेय की
संवेदना 'छायावाद'
की
हरियाली रचने लगती है :
बता मुझे ऐ विहंग विदेशी अपने जी
की
बात
पिछड़ा था
तू कहाँ,
आ रहा जा कर
इतनी रात ।
यह
ज्योत्सना रजनी हर सकती
क्या
तेरा न विषाद
?
या तुझको
निज-जन्मभूमि की सता रही है याद
?
'अज्ञेय'
की
उपस्थिति हारिल के लिए ज्ञेय की उपस्थिति है,
जो
ढाढस बँधाता है,
सृजन का
स्मरण
कराता है :
रुक न जाये यह गति जीवन की
ऊपर ऊपर ऊपर ऊपर
बढ़ा चीरता
चल
दिग्मंडल
इधर मुक्तिबोध बेचैन,
भटकते चील
में अपनी मन:स्थिति देखते हैं,
'देखता
रहूँगा एक दमकती हुई झील/या पानी का कोरा झाँसा,'
उधर
अकाल के बाद भी नागार्जुन
पाँखे
खुजलाते हुए कौवों से मिलते हैं ।
कुँवर
नारायण तो गिध्दों की बस्ती तक
पहुँच
गये । बूढ़ा संपाती धर्मवीर भारती के मुँह से अपनी बात कहलवाने में सफल हो
गया,
वह मैं नहीं/मेरा भाई जटायु
था/जो व्यर्थ के लिए जाकर भिड़ गया दशानन
से'
।
गरुड़ की
प्रतीक्षा में श्रीकांत वर्मा थक -हार जब कहते हैं,
'गरुड़
कभी था ही
नहीं'
तब
इसका मतलब यह भी होता है कि उसकी उपस्थिति कभी थी जरुर ।
जीवन भर
चिड़ियों के
पीछे-पीछे भागने वाले सालिम अली एक दिन केदार नाथ सिंह के सपने में आने
लगे ।
जो कुछ हरा-भरा था,
चूकने लगा ।
पेड़ उदास हो गये । फिर भी अशोक वाजपेयी की
कविता
का विश्वास कहाँ चुका,
'पक्षी
बार-बार आते हैं/उसी सूखी शाखा पर/न बसेरा
करने,
न झरे
हुए को याद करने/ न हरे को वापस लाने/ न किसी का सपना देखने /आते हैं
समय
को थोड़ा कुतरने'
।
सचमुच चिड़ियों की उपस्थिति समय के बीतने जैसा नहीं,
बिताने जैसा है। कविता भी यही करती है । कठिन समय चिड़िया और कविता के
सानिध्य से
कट ही जाता
है । वस्तुत: चिड़िया और कविता कठिन समय को लाँघने वाली संज्ञायें हैं
।
रस्सी,
सीकें,
घास,
पात,
कचरा,
कूड़ा
प्रमोद वर्मा ने बीन-बीन कर घर के बाहर
फेंक
दिया । उन्हें क्या पता था कि गौरैय्या उन्हें सँजोकर उनके घर पर टँगे फोटो
के
पीछे ही फिर
से जमा कर देगी ?
गौरैय्या में
कुछ भी खास नहीं होता,
फिर भी जब
रमेश
दत्त दुबे
कहते हैं,
तो जाने
क्यों मन सोलह आने सहमत हुआ जाता है,
'उसी
में /एक
ऑंगन में चहक
लेती है/एक पेड़ तक उड़ लेती है/पत्ते-पत्ते से पूछ लेती है ।'
गौरैय्या
जैसी हिम्मती
पक्षी की बात चली है तो मुर्गियों की बाँग भला क्यों सुनाई न दे !
यहाँ कचरे के टापू हैं
इन्हीं के पीछे से सूरज निकलता है
चूजों के
साथ
मुर्गियाँ
निकलती हैं
टापुओं पर चढ़ जाती हैं
(ध्रुव
शुक्ल )
मैना को याद न
करना
अच्छा नहीं होगा । वह तो विनम्र है,
निरहंकारी है । वह 'मैं-मैं
'नहीं
'मैं
ना ,मैं
ना'
ही कहती है ।
मैं उस मैना की कह रहा हूँ जो शांतिनिकेतन की फुलवारी में
सेमल
पेड़ के नीचे लँगड़ा रही है । रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता में उसका दर्द करवट
ले
रहा है ।
शिष्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की ऑंखें हैं कि अब झरी- तब झरीं। शायद ऑंसू
झरे
नहीं । वे ललित निबंध (एक कुत्ता और एक मैना ) के भाव-सूत्र बनकर द्विवेदी
जी
के मन के
भीतर संचित हो गये ।
साइबेरियाई चिड़िया हमारे देश में जीवन को आवाज
देती
हैं (शहंशाह आलम) । वे सैलानी हर साल आयें,
पर
भगवान करे कैसोवरी(ऑस्ट्रेलिया
की
सुंदर किंतु मनुष्य की हत्यारी चिड़िया) यहाँ कभी न आयें । हमें अंगरेज़ भी
शुरू-शुरू में सुंदर-सैलानी लगे थे,
पर
उन्होंने इन्सानियत को गटक लिया था । चिड़िया
वही
जो मनुष्य की कविता में शामिल है/देह में हीमोग्लोबिन की तरह/वृक्ष में
क्लोरोफील की तरह । जबकि कैसोबरी के आने का मतलब मनुष्यों का चला जाना है
और हममें
से हर कोई
ऐसे |