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व्यंग्य

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दुखहरण फाइल भंडारः रवि श्रीवास्तव

 मुद्दों का मुरब्बाः रविशंकर श्रीवास्तव

 

 

दुखहरण फाइल भंडार

रवि श्रीवास्तव

 

       दुखीराम ने जब अपने नये घर का नाम फाफी भवन रखा तो अनेक आश्चर्य करते रह गए । लोग दिमागी दौड़ लगाते रहे । उन्हें यह मसझ नहीं आया कि ये फाफी क्या बला है। आने-जाने वाले अपने-अपने ढंग से अर्थ निकालते रहे । वैसे हिन्दी शब्दकोश का सहारा लिया जाए तो ऐसा कोई शब्द नजर नहीं आएगा। कुछ इसे दुखीराम का देहातीपन समझते रहे । लेकिन दो अक्षर के इस छोटे से शब्द में बड़ी शक्ति छिपी हुई है। दुखीराम ने फाइल और फीता शब्दों के पहले अक्षरों को मिलाकर फाफी शब्द बनाया और अपने छोटे से घर का नाम रख दिया फाफी भवन । माता-पिता ने अपने कठिन दिनों में मजबूरीवश भले ही अपने बेटे का नाम दुखीराम रख दिया, लेकिन दुखीराम के जीवन में सुख ही सुख है। उसने जबसे सरकारी नौकरी शुरू की सुख की नाव में सवार होकर मौज कर रहा है।

 

       दुखीराम जिला कार्यालय का अदना सा चपरासी है। रोब-दाब में कलेक्टर से कम नहीं । वह उसी शान से उठता-बैठता है, जिस अकड़ से उसके अफसर । छोटी सी नौकरी में उसने जो रुतबा हासिल किया है, वह सबके बस की बात नहीं । ड्रेस बिना वह शायद ही किसी दिन ऑफिस आया हो । अपने डील-डौल से किसी फौजी जवान से कम नहीं लगता । छोटे कद-काठी के अफसर उससे झेंपे बिना नहीं रहते । वे उसे अपने से चार कदम दूर ही खड़ा रखते हैं । अफसरों से दूर-दूर खड़ा रहकर भी वह हमेशा पास बना रहा। उसका काम दिन भर फाइलों की साज-सँभाल करना है। इसके दुःखों को फाइलों  ने दूर किया । इसीलिए अपने बड़े पुत्र के नामकरण के समय उसने किसी की नहीं चलने दी । पुत्र का नाम रखा-फाइल प्रसाद । बाद में जब बेटी हुई तो नाम रखा फीताबाई । अब वे चारों प्राणी फाफी भवन में सुख के दिन काट रहे हैं । दुखीराम के घर के प्रवेश द्वार पर फाइल की सुन्दर आकृति बनी हुई है। घर के जिस कोने में देवी-देवाताओं की तस्वीर रखी है वहाँ एक सुन्दर-सी फाइल भी है, फीते में बँधी हुई । प्रतिदिन फाइल की पूजा-अर्चना होती है। अगरबत्ती लगती है। लोहबान का धुआँ भी कभी-कभी दिखाया जाता है।

 

       वह हर विभाग का चक्कर लगा आया है। उसके लिए हर विभाग एक पवित्र नदी की तरह है। कहीं साल भर पानी रहता है, कहीं सूखा ही सूखा । किसी विभाग की फाइलें साल भर चाँदी के सिक्के की तरह खनकती हैं । अभागे विभागों में चार माह की चाँदनी रहती है। बाकी के आठ माह सूखी नदी की तरह पानी को तरसते हैं । इन विभागों की फाइलें साक्षात् कामधेनु हैं, आधी रात को दूध देने को तैयार । थोड़े बहुत जो गहने गृहिणी की शोभा बढ़ाते हैं, वह सब इस विभाग की फाइलों की कृपा से हैं । जब तक यहाँ रहा उसकी जेब हमेशा गरम रही । दो बार तीर्थयात्रा कर आया । राहत कार्य की फाइलों का कोई मुकाबला नहीं । दुखीराम उसे कुबेर का भंडार कहता है । उसे चार साल वहाँ गुजारने का अवसर मिला । वह उसके जीवन का स्वर्ण युग था। उसके बड़े साहब तो कोठी बनवाने इस विभाग में आए थे। वे किसी मंत्री के नजदीकी रिश्तेदार थे। रिटायरमेंट के करीब पहुँच चुके थ। मंत्रजी ने अपना आदमी समझकर कमाने-खाने भेजा था । कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। वह दौर खाने-पीने का रहा । सूखा,बाढ़, अतिवृष्टि तूफान, भूकंप आदि प्राकृतिक विपदाएँ राहत विभाग की फाइलों के लिए सुख का संदेश लेकर आती हैं । ये विपदाएँ आती हैं और चली जाती हैं लेकिन फाइलों का सिलसिला पुनः चल पड़ता है। जब तक चलता है, पैसा अतिवृष्टि की तरह बरसता है। सरकारी खजाने से बाढ़ की तरह बह जाता है। इसी दौर में बड़े साहब की आलीशान कोठी बनी । उसका छोटा सा फाफी भवन बी राहत विभाग की फाइलों का चमत्कार है । साहब ने कोठी का नाम रखा-गुरु कृपा।

 

       दुखीराम फाइलों के लिए सुपर कम्प्यूटर है। किस फाइल को साहब की टेबिल पर आज पहुँचाना है, किस फाइल को कल । सुबह कौन-सी फाइल देखेंगे, दोपहर में किस फाइल को निपटाएँगे और चाय पीते वक्त किस फाइल को देखना पसंद करते हैं । इस एडजेसमेंट में उसे कमाल हासिल है। कौन-सी फाइल ऊपर रहेगी और कौन-सी नीचे, मजाल है कि कोई फाइल इधर से उधर हो जाए । वह यह भी जानता है कि किस फाइल का फीता खोलकर ले जाना है, किन-किन फाइलों का फीता साहब खोलना पसंद करते हैं । वह साहबों का चहेता है। साहबों के बनते-बिगड़ते मूड़ की उसे अच्छी पहचान है। साहब की बीवी धोका खा सकती है लेकिन दुखीराम नहीं ।

 

       फाइलों को लाल बस्ते में बाँधकर साहब के वाहन में रखना दुखीराम की जरूरी दिनचर्या है। वह यह जानने में भी दखल रखता है कि कौन सी फाइल साहब के यहाँ से हँसते हुए आएगी, किस फाइल की किस्मत में आँसू बहाना लिखा है। वह फाइलोंके आँसू पोछना भी अच्छी तरह जानता है । धूल खाती फाइलों के अम्बार से दुखीराम को विशेष लगाव है । ऐसी फाइलें जाड़-पोछकर बाहर निकाली जाती हैं तो मुट्ठी गरम करके ही वापस लौटती हैं । फाइलों ने और उसके खुलते और बंद होते फीतों ने दुखीराम के दुख का हरण किया है। अब दुखीराम को भविष्य की चिंता है। सरकारी नौकरी का एक साल बाकी रह गया है। उसका जीवन बिना फाइल नीरस हो जाएगा, फाइलों के बिना दिन काटना मुश्किन हो जाएगा । इसीलिए दुखीराम ने रिटायरमेंट के बाद भी फाइलों की दुनिया में खोए रहने का जुगाड़ बिठा लिया है। उसने तय कर लिया है, रिटायर होने के बाद फाइलों की दुकान खोलना । दिन भर फाइलों की बिक्री करेगा । फाइलों की चर्चा कर अपना और अपने ग्राहकों का मनोरंजन करता रहेगा। उसके चारों ओर रंग-बिरंगी फाइलें रहेंगी । वह अपनी दुकान का नाम रखेगा दुखहरण फाइल भंडार ।

 

 

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