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सीधा-सच्चा वकील |
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गिरीश पंकज |
बरगद
पर लटके बेताल को अपने दोनों कंधे पर लाद कर विक्रमार्क एक बार
फिर अपने महल की ओर चल पड़ा । रास्ता लम्बा था। मौन रहो तो एक
किलोमीटर भी पचास किलोमीटर लगने लगता है। बेताल नंबर एक का
बातूनी था। उसने बोलना शुरू किया-हे राजन् लगता है कि एक दिन
तुम जिद्दी, हठी विक्रमादित्य के रूप में मशहूर हो जाओगे ।
हारिए न हिम्मत बिसारिए न राम जैसी कहावत तुम्हारे जैसे ही
किसी व्यक्ति के लिए ही बनी है । खैर, मुझे क्या है । मैं तो
हमेशा की तरह एक कहानी सुना रहा हूँ । कहीं कुछ गलत बोलूँ तो
टोक देना ।
विक्रमार्क ने प्रण कर लिया था कि इस बार कुछ नहीं बोलेगा वरना
बेताल को उड़नछू होने का मौका मिल जाएगा । लाख उकसाए, इस बार
वह कुछ नहीं बलेगा । सो, विक्रमार्क चुपचाप चलता रहा ।
विक्रमार्क की ओरसे कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर बेताल हँसा और
शुरू हो गया
–
राजन्, चंदनपुर में एक सीधा-सच्चा वकील रहा करता था । अब तुम
सोच रहे होगे, कि वकील और सीधा-सच्चा
?
हद है न
!
लेकिन वह वकील सचमुच सीधा-सच्चा था । उसका नाम भी वैसा था
–
सत्यव्रत । सत्यव्रत बाल्यकाल से ही आदर्शवादी था । उसने गलती
से कुछ महापुरुषों के बारे में कुछ किताबें पढ़ ली थीं । तभी
से उसे लगने लगा था कि सच्चाई ही जीवन का सही रास्ता है । घर
में केबल कनेक्शन होने के बावजूद वह दूसरे बच्चों की तरह बिगड़
नहीं पाया । उसका मन टीवी चैनलों के रेलम-पेल में नहीं भटकता
था । वह न तो चैनल देखता था, और न सिनेमा । हर घड़ी बस किताबें
पढ़ता था । वैसे भी कोर्स की किताबें इतनी अधिक थी कि बेचारे
को सिर उठाने की फुर्सत नही मिलती थी । स्कूल में पढ़ाई कम
होती थी । वहाँ के शिक्षक ट्यूशन पढ़ाकर दोहरी कमाई कर रहे थे
। सत्यव्रत के पिता देवव्रत वकील थे । कंजूस भी थे । ट्यूशन
पढ़ाने में खर्च होता । पिता की इस मानसिकता के कारण सत्यव्रत
स्कूल से आने के बाद पढ़ाई में भिड़ जाता ।
देवव्रत चाहते थे कि उनका बेटा वकील बने । उनकी तरह
वकालत करे और मालामाल हो जाए । इसीलिए तो हाई स्कूल में अच्छे
अंक पाने के बावजूद देवव्रत ने सत्यव्रत को आदेश दिया कि वह
कला संकाय में प्रवेश ले ले । क्योंकि उसे वकील बनना है ।
सत्यव्रत चाहता था कि वह डॉक्टर बने ।
देवव्रत ने कहा, देखो बेटे, हर कोई डॉक्टर-इंजीनियर
बनना चाहता है । तुम तो वकील बनो, वकील ।
सत्यव्रत ने कहा- लेकिन पिताजी, वकालत में तो झूठ ही झूठ बोलना
पड़ता है । आत्मा को मारना पड़ता है । ले-देकर मेरे पास एक ही
आत्मा है ।
बेटे की बात सुनकर देवव्रत भड़क गए- अरे, आत्मा को गोली
मार, और मैं जैसा कहता हूँ, वैसा कर । एक आत्मा मरेगी, तो
दूसरी आ जाएगी । समझे न
!
संस्कारों की खूँटी में बँधा सत्यव्रत चुप हो गया । और वकालत
पढ़ने लगा । लेकिन उसका मन कानून की किताबों में बिलकुल न रमता
था । वह सपने देखता, कभी डॉक्टर बनकर मरीजों की सेवा कर रहा
है, तो कभी सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनकर देश-विदेश घूम रहा है ।
नतीजा सामने था । हाईस्कूल में टॉप करने वाले लड़के ने एलएलबी
की परीक्षा तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण की । बाप ने सिर पीट
लिया । क्या सोचा था, क्या हो गया । लेकिन देवव्रत ने ठान लिया
कि लड़के से वकालत ही करवाएँगे । उन्होंने सत्यव्रत को
हाईकोर्ट के एक सीनियर वकील बज्रभूषण के पास उनका जूनियर बनाकर
भेज दिया । बज्रभूषण देवव्रत का मित्र था । चलता-पुरजा । उसके
बारे में हर कोई जानता था कि यह बड़े से बड़ा कानूनी मामला
सुलटा देता है । इसीलिए वह टॉप का वकील माना जाता था । देवव्रत
ने मित्र से आग्रह किया कि बेटे को ऐसा ट्रेंड करो कि वह
तुम्हारी तरह तगड़ी कमाई करने वाला वकील बन जाए । बज्रभूषण ने
कहा- चिंता मत करो, ऐसा वकील बनाऊँगा कि सत्यव्रत से उसका सत्य
गायब हो जाएगा । केवल व्रत ही बचेगा । सत्यव्रत का डिवीजन खराब
आया है तो क्या, मेरे साथ रहेगा तो नया विजन आएगा । समाज में
वज़न भी बढ़ेगा । बज्रभूषण की बात सुन कर देवव्रत को बड़ा
संतोष हुआ और वे खुशी-खुशी घर लौट आए ।
बज्रभूषण के साथ रह कर सत्यव्रत ने काम शुरू कर दिया ।
लेकिन कुछ ही महीनों के बाद बज्रभूषण से सत्यव्रत को बैक टू
पैवेलियन कर दिया । यानी कि वह अपने घर लौट आया ।
इतना कह कर बेताल ने साँस ली । फिर बोला, राजन्, अब तुम
यह बताओ कि सत्यव्रत को बज्रभूषण ने वापस क्यों भेज दिया
?
क्या सत्यव्रत ने अपने शहर लौट कर वकालत शुरू की या कोई धंधा
करने लगा
?
सही-सी ज़बाब देना, वरना तुम्हारे सिर का ब्लाटीकरण हो जाएगा ।
विक्रमार्क को बोलना ही था । उसने कहा- दरअसल सत्यव्रत
बज्रभूषण का धंधा खराब करने लग गया था । जो भी पीड़ित लोग
मामले-मुकदमे के लिए आते थे, सत्यव्रत उनको साफ-साफ समझा देता,
कि आपके मामले में कोई दम नहीं है । आप तो मुकदमा हार जाएँगे ।
पैसे खर्च करने का कोई मतलब नहीं । बेचारे मुवक्किल लौट जाते ।
हालत यह हो गई कि धीरे-धीरे बज्रभूषण के यहाँ लोगों का आना कम
हो गया । उसे समझ ही न आया, कि मामला क्या है । और एक दिन
रहस्योद्घाटन हो ही गया कि सारा किया-धरा सत्यव्रत को है ।
इसकी साफगोई के कारण लोगों ने इधर आना बंद कर दिया है ।
बज्रभूषण उखड़ गया और सत्यव्रत को कड़ी फटकार लगाई । बोले-मेरे
मित्र के बेटे हो इसलिए तुम्हें जूनियर रख लिया था, लेकिन तुम
तो मेरे शत्रु निकले । मेरा धंधा, जमी-जमाई वकालत चौपट करने पर
तुले हो । अरे हर आने वाले क्लाइंट से तुमको एक ही बात कहनी
चाहिए कि मामला बड़ा सॉलिड है । आप ही जीतेंगे । दुनिया की कोई
ताकत आपको हरा नहीं सकती । लेकिन तुम तो ...........। जाओ
बेटा, अपने बाप के पास वहीं करना वकालत । तुमको सत्य का कीड़ा
काट चुका है । और अब इसका कोई इलाज संभव नहीं दिखता । मेरा मान
तू वकालत छोड़कर कोई दूसरा काम देख ले । समाज सेवा कर । इसी
में सार है । जा घर जा । मेरी जमी-जमाई दुकानदारी मिट्टी में
मत मिला ।
सत्यव्रत अपने शहर लौट आया । नौकरी के लायक उम्र निकल
गयी थी सो बेचारा मजबूर हो कर वकालत करने लगा । वकालत चलती तो
न थी लेकिन दो पैसा कमा ही लेता था । लोग आते और सलाह लेते ।
एवज में फीस के रूप में कुछ पैसे थमा के चलते बनते थे ।
सत्यव्रत इसी में खुश था ।
विक्रमार्क ने बेताल के सवालों को सटीक जवाब दिया मगर
उसका मौन भंग हो चुका था इसीलिए फिर बैतलवा डाल पर जा कर लटक
गया ।

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