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अनुभव जन्य यथार्थ को  अभिव्यक्त गीत-संग्रह/समीक्षकः हरि प्रकाश वत्स/गीतकार-अजय पाठक

डॉ. श्रोत्रिय के रचना कर्म का प्रीतिपूर्वक बखान/समीक्षकः डॉ. बलदेव/संपादक- उर्मिला शिरिष

 
 

अनुभव जन्य यथार्थ को  अभिव्यक्त गीत-संग्रह

हरि प्रकाश वत्स

 

          त्तीसगढ़ अंचल के सुपरिचित गीतकार तथा व्यंग्य- कार भी अजय पाठक के गीत संग्रह 'गीत गाना चाहता हूँ' के हाथ में आते ही इसमें संकलित सभी रचनाओं को एक बैठक में निरंतर पढ़ गया । रचनाओं में गीत, ग़ज़ल तथा दोहों का एक वैविध्य दृष्टगत हुआ । इस नवीन गीत-संग्रह के विषय में कुछ कहने के पूर्व मैं छत्तीसगढ़ जैसे नवप्रदेश के अभ्युदय के साथ ही इसकी गीत यात्रा को चर्चा करना आवश्यक समझता हूँ । इस प्रदेश के लिये वास्तव में ही गर्व का विषय है कि यहाँ के वातावरण में वर्षों तक छायावादी गीत की अनुगूँज सुनाई पड़ती रही । यहाँ के श्रोता उसके स्वर तथा शिल्प दोनों से भली भाँति परिचित थे। इसके साथ ही प्रगतिवादी कविता की बयार भी यहाँ किसी न किसी रूप में बहती रही । यह सौभाग्य की ही बात है कि स्व. मुकुटधर पाण्डेय के कारण छत्तीसगढ़ का नाम छायावाद से जुड़ा रहा। उसका मधुर गीत 'किशुक कुसुम मेरे प्राण अकुलाते हैं ।

 

       वास्तव में यह एक दुर्भाग्य की बात रही कि छत्तीसगढ़ का गीत उपनी पहचान अखिल भारतीय स्तर पर बनाने में पिछड] गया । यद्यपि यहाँ अच्छे गीतकार भी रहे जिनमें स्व. हरिठाकुर का नाम शीर्ष पर लिया जा सकता है। यहाँ के गीत की परम्परा को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तक लेजाकर समृद्ध बनाने का कार्य स्व. नारायण लाल परमार ने ही सर्वाधिक किया । इनके साथ ही अंचल में भी दानेश्वर शर्मा, राम प्रताप सिंह विमल, विद्याभूषण मिश्र तथा श्रीमती इन्दिरा परमार के अतिरिक्त गीतकार के रूप में स्वीकार करने योग्य कोई अन्य नाम सुनाई नहीं पड़ता हाँ । स्व. भगवान स्वरूप सरस अवश्य ही इस अंचल के एक मात्र नवगीतकार रहे ।

 

       गीत का एक दुखद पहलू यह भी है कि यहाँ के गीतों का प्रकाशन में न आना, उन्हें ईमानदार समीक्षक तथा आलोचक न मिलना ही छत्तीसगढ़ के गीत को विस्मृत करने में जिम्मेदार रहा । इतना कुछ होने के बावजूद भी इस बात की प्रसन्नता है कि यहाँ के गीत कारों ने मंच के आकर्षक पाश से मुक्त होकर इस विधा के प्रति अपनी आस्था तथा विश्वास को जीवित रखा। इसी परम्परा को समृद्ध तथा गतिशील बनाने का एक पुनीत प्रयास है अजय पाठक का गीत संग्रह गीत गाना चाहता हूँ

 

       जहाँ तक गीत का प्रश्न है कविता को एक निशांत हो कोमल विधा कहना कदाचित् कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । यही मायने में कोई भी साहित्यिक अभिव्यक्ति जो कुछ भावात्मक न हो कविता या गीत कहीं नहीं जा सकती । चाहे गीत हो या प्रगीत दोनों का आशय एक ही है कल्पना माधुर्य या आवेश का समर्थ अंकन अथवा पाठक के लिये सफल एकीभूत प्रभाव सृजित करने वाली एक संक्षिप्त आत्मपरक कविता ही गीत अथवा प्रगीत कहलाती है। मनुष्य की आनंदानुभूति जब अपने तीव्र वेग में होती है तब गीत का जन्म होता है। गीत को हम लय और लयात्मकता का संगम भी कह सकते हैं। गीत में व्यक्ति के अन्तर एवं बाह्मा जगत की अनुभूतियों, वेदना-सम्वेदनाओं, नैराश्य आम आदमी की पीड़ाओं, संवेगों तथा जीवन के निष्कर्षों को जितने प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया जा सकता है उतना किसी अन्य विधा में नहीं । गीत के लिये छांदिक तथा सकारात्मक प्रतिबद्ध्ता आवश्यक है वैसे कथ्य है का महत्व गीत में छंद से अधिक होता है क्योंकि छंद तो एक ऐसी व्यवस्था है जिसके द्वारा गीत को गति दी जा सके । गीत अपनी पारम्परिकता में बोझिल होना पसन्द नहीं करता क्योंकि गीत ऐसी कोमल विधा है जिसे सरला शव्दावली ही पसन्द है ।

 

       श्री अजय पाठक का छत्तीसगढ़ अंचल में हिन्दी गीत रचना स्तर पर एक विशिष्ट अवदान है। वास्तव में वह गीत में पयोगधर्मी रचनाकार नहीं है इसलिये उनके गीतों को भाषा का मुहावरा नहीं है जो किसी पारम्परिक गीतकार का होता है । अपने गीतों को दुरुहता से बचाने के लिये उन्होंने गीतों में नये छंदो का प्रयोग भी नहीं किया । वे इस बात को स्वीकारते हैं कि उनके गीतों में शब्दों का घटाटोप तथा फिजूलखर्ची दोनों ही नहीं है। उनकी कुछ गीत-पंक्तियाँ हष्टव्य है-

 

घायल  होकर हम लौटे हैं । धाव हरे हैं पाँव के। 

अलगू भैया कुछ मत पूछो । हाल बुरे हैं गाँव के।

पगडंडी पर शूल बिछे हैं  । दिशा दिशा है धुँआ-धुआँ

नदिया सूखी पनघट सूना  । पत्थर पत्थर है कुआँ-कुआँ

रगद-पीपल सूख चुके है  । पंछी हैं बिन छाँव के।

 

       अपने जीवन में शासकीय सेवाओं से जुडे सघन अत्तरदायित्व तथा जीवन की विविध व्यस्तताओं के गहन दबाकें के कारण भले ही श्री अजय पाठक के गीतकार की परिधि उन्हें एक विस्तृत आकाश न दे पाई हो किन्तु जितना भी उन्होंने रचा है उसमें अभिव्यक्त लालित्य सुधी पाठकों को बाँधने की क्षमता अवश्य ही रखता है । उनके गीत आत्मकेन्द्रित होते हुये भी उनका मूल-स्वर सार्वजनीन होता है जिससे वे आम आदमी से अनायास ही जुड़ते चले जाते हैं- टूट कर बिखरे हुये घर-बार है अब । अब रहाँ की बस्तियाँ ? बाज़ार है अब । प्रेम की वह बाँसुरी बजती नहीं है। अब नहीं अभिसार की बातें यहाँ पर । हर तरफ चलता हुआ व्यापार है अब

 

       अजय पाठक के रचनाकार ने अपने गीतों में उस समस्त परिवेश को एक वाणी देने का प्रयास किया है जिसमें वे स्वयं रहते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि आज के जीवन में जो कमिटमेंट है वह भी गीतों में आवश्यक है । उनके गीत उनके अपने निर्णल हृदय से निःसृत हुये हैं । वे शब्द-सज्जा से बनी रचनाओं के काव्य-कौशल को स्वीकार नहीं, करते गीतों में चित्रित अनुभूतियाँ भी प्रामाणिक रूप से लोक सम्पर्कित हैं

 

       स्वारथ को सब रिश्ते नाते । स्वारथ का सब खेल है बाबा । जलती है बाबा । जलती है दियने की बाती । जब तक उसमें तेल है बाबा । चिंटी जैसे लोग जुरेंगे । तेरे आँगन ड्पोढ़ी पर । हाथों में तेरे माता है। तब तक रेलमपेल है बाबा । उम्रकैद की सज़ा मिली है । बिना किसी अपराधों के । मरने पर ही मु्क्त करेगी । दुनिया ऐसी जेल है बाबा ।

 

       गीत गाना चाहता हूँ के गीतों को गुनगुनामें से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि रचनाकार के कुछ गीत लोगरंगी धुनों पर आधारित हैं । वैसे भी इस अंचल के गीतकार होने के नाते उनकी रचनाओं में लोक तत्वों का समावेश होना एक विशिष्टता का द्योतक है क्योंकि छत्तीसगढ़ का लोग अपने मूल चरित्र में अवश्य ही प्रभावशाली होता है औऱ उसमें आंचलिक संस्कृति तथा संस्कारों की सुगंध आती ही है

 

आज मन की रूद्र वीणा को बजाना चाहता हूँ ।

मैं तुम्हारी अस्मिता के गीत गाना चाहता हूँ ।।

कौन जाने कब तलक है आज पलकों पर सबेरा

कालिया को रात लेकर आ न जाये फिर अंधेरा

आज माटी के दीयों में भावना की बातियों से

रोशनी का एक दीपक मैं जलाना चाहता हूँ ।।

 

       यह कहना यहाँ न्यायसंगत है कि अजय पाठक के गीत सर्जना एवं शिल्प की दृष्टि  से पारम्परिक होते  हुये भी उनके कथ्य में कोमलता है, सहजता है तथा रोचकता भी जो उन्हें रोचक और पठनीय बनाती है तथा स्मरणीय भी। गीतों की भाषा अत्यंत  सरल है तथा सहज भी। इसीलिये गात गाना चाहता हूँ के सभी गीत गीतकार के सम्पूर्ण मनोभावों का ईमानदार तथा अनुभव जन्म वक्तव्य है ।

 

       इस संग्रह में गीतों के साथ 2 ग़ज़लों को भी समाहित किया गया है । यद्यपि ग़ज़ल को अरबी, फारसी तथा उर्दू से जन्मी आयातीत काव्य विद्या निरुपित किया जाता है किंतु वास्तव में हिन्दी ग़ज़ल ऐसी खूबसूरत बुनावट वाला रेशमी वस्त्र, है जिसमें उर्दू-फारसी के ताने-बाने पर हिन्दी का गहरा रंग चढ़ा है। अब हिन्दी और उर्दू में भाषाई तालमेल इतना अधिक करीबी हो गया है कि वह खड़ी बोली को ग़ज़ल बन चुकी है। ग़ज़ल के क्षेत्र में भी श्री पाठक ने जहाँ अपने शब्दों को अपने परिवेश की जीवंत प्रतिक्रियाओं को भी अभिव्यक्ति दी है। इनकी ग़ज़लों में आज की ग़ज़ल की सम्पूर्ण प्रवृतियां जैसे रूमानियत से मुक्ति, विषय-वस्तु की विविधता, समसामयिका लोकोन्मुखता, व्यंग्यात्मकता, नये प्रयोगों की प्रचुरता, भाषा की सहजता तथा रोचकता इत्यादि अपनी समग्रता के साथ दिखाई देती हैं

(1)     तन बदन है शाख़ पर हिलते घरौंदे की तह ।

मन ! वही बेसाख्ता, उड़ते परिन्दे की तरह ।.

देखता हूँ शोख परियों की नुमायश दर-बदन ।

सब्र अपने साथ है, पर नेक बन्दे की तरह ।।

(2)     सावन के बादल ने जब भी धरती को पैग़ाम लिखा।

मेरे हक़ में काली रातें, सूरज तेरे नाम लिखा।।

शम्मा के रौशन चेहरे पर सच्ची सच्ची बात लिखी।

उल्क़त का मज़मूल लिखा है चाहत का अंजाम लिखा।

 

      इस प्रकार देखा जाय तो भी अजय पाठक की ग़ज़लें भी काव्य सौन्दर्य की बुलंदियों को छूने के साथ-साथ वर्तमान जीवन की यथार्थ भूमि में अपनी जड़ें और गहराई तक स्थापित करती प्रतीत होती हैं । जहाँ भाषा की सहजता इस ग़ज़लों में है वहीं इनकी शैली भी आकर्षण है तथा शिल्प सौकत भी इनमें विद्यामान है। इनकी मौलिकता गज़लों को ग्राह् बनाती है जो रचनाकार की महती उपलब्धि है।

 

       अजय पाठक के इस संग्रह में कुछ दोहे भी पढ़ने को मिले जिनका स्वरूप गीतों में ढला सा लगा । दोहों की भाषा सरल, सहज तथा प्रभावशाली है जो हृदय तक उतरने में सक्षम है । एक बानगी देखियेगा

 

(1)  सबको देता ही रह, रोटी पानी छाँव।

    आज वही याचक बना फटेहाल है गाँव।।

(2) गाँधी के आदर्श का ऐसा हुआ हिसाब ।

    गाँव गली चौपाल में बिकने लगी शराब ।।

(3)     संक्रामक होने लगा, लोकतंत्र का रोग ।

जनता का धन खा गये जनता के ही लोग ।।

(4)     अब तो अपनी धारणा बदलें भी श्रीमान ।

ना तो अब वह गाँव है ना ही सरल किसान ।

     यद्यपि  अजय पाठक का यह काव्य संग्रह हर दृष्टि से अपनी एक विशिष्ट छाप मन पर छोड़ता दिखाई देता है किन्तु कहीं-कहीं व्याकरण की अशुद्धियाँ बरबस ही ध्यान आकर्षत कर लेती हैं जो पाठक-मन के लिये एक व्यवधान अत्पन्न करदा है। पाठक जी को अपने आगामी संग्रहों में इनका ध्यान रखना होगा ताकि वे दोबारा न हों-कुछ उदाहरण स्वरूप देखों-

 

पृष्ठ- 34 (कैसे गाऊँ) दसवी पंक्ति-

जिन अधरों ने व्यास जगाया यहाँ प्यास जगाई होना था।

पृष्ठ -16 (मर्यादा) सोलहवी पंकित

उनके आँसू गंगाजल हैं-अपनी बहते नाली का जल

यहाँ अपने (आँसू) बहता नाली का जल होना चाहिये था।

पृष्ठ 074 (गजरा टूटा) सातवी पंक्ति

साँसो की संतूर बजी थी यहाँ संतूर बजा था होना चाहिये था

पृष्ठ-73 (सपना देख) नौं ती रंक्ति

तेरा शक्कर तेरा सीधा में तेरी शक्कर होना चाहिये था।

पृष्ठ -90 (पुण्य क्या है ) तीसरी पंक्ति

यह नियति है सृष्टि का तो में सृष्टि की तो होना चाहिये था

 

   कुल मिलाकर  अजय पाठक का काव्य-संग्रह गीत गाना चाहता हूँ अत्यंत ही उत्कृष्ट बन पड़ा है जिस की सभी रचनायें उत्तम हैं । इसके लिये श्री पाठक जी साधुवाद के सुपात्र हैं। पुस्तक का मुद्रण अच्छा  है तथा मुख पृष्ठ भी आकर्षक एवं कलात्मक है ।

 

कहानी संग्रहःगीत गाना चाहता हूँ

गीतकार-अजय पाठक

प्रकाशनः

मूल्यः

 

 

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प्रसन्नता सभी गुणों की माँ है - स्पेन्सर

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