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कुंठित मानव मन की कहानी |
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समीक्षकः रवि श्रीवास्तव |
किसी
कहानी को सफल बनाने में कहानी के प्रमुखतः तीन तत्व मायने रखते
हैं
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कहानी की पठनीयता, कथ्य और भाषा, और मेरे विचार में, इसी
अनुक्रम में. अगर आपको कोई कहानी प्रथम पंक्ति से बाँध कर चले
और अंत तक कहानी की पठनीयता बरकरार रहे, कथ्य में नयापन,
नायाबपन, खरापन हो और भाषा में कुछ नए किस्म की कलाकारी हो, तो
बस समझिए कि कहानी सफल है।
संजय विद्रोही के कहानी संग्रह
‘कभी
यूँ भी तो हो’
में पंद्रह कहानियाँ हैं, और यह कहा जा सकता है कि संग्रह के
प्रत्येक कहानी में संजय न सिर्फ अपना विद्रोही तेवर बरकरार
रखने में कामयाब हुए हैं, बल्कि कहानी
‘कहने’
में भी सफल हुए हैं।
संजय विद्रोही की भाषा यूँ तो सरल है, और उसमें कोई भारी
पच्चीकारी नजर नहीं आती है, परंतु वे कथ्य में नयापन लेकर आए
हैं और उन्होंने अपनी कहानियों में किस्सागोई अंदाज में
पठनीयता को बरकरार रखा है। अपने अंदाज को किसी टाइप्ड स्टाइल
में बाँध कर नहीं रखा है।
संजय विद्रोही ने अपनी कहानियों में मानव जीवन के विरोधाभासों
और जीवन के असंतुलनों के बारे में बड़े ही कड़वे, मर्मस्पर्शी
अंदाज में लिखा है ।
‘कंबल’
हो या
‘कब
तक आखिर’
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कहानीकार मानव जीवन की विद्रूपताओं को पाठक के समक्ष प्रस्तुत
करने में सक्षम हुआ है।
वैसे, हिन्दी कहानीकार के रूप में संजय विद्रोही कुछ प्रयोग
करते भी दीखते हैं। उनकी कुछ कहानियाँ मसलन
‘झूठ
के सहारे’
व ‘झुलसे
सपने’
में यौनाचारों, यौनकुंठाओं की कहानियाँ हैं, परंतु नए तेवर की
हैं । आमतौर पर ऐसे विषय की कहानियाँ ऐसे धारदार अंदाज में
लिखने में हिन्दी के कथाकार बचते रहे हैं, परंतु इन कहानियों
में कुंठित मानव मन की वास्तविकता की कहानी बयान करने में संजय
विद्रोही ने अच्छा प्रयास किया है।
कहानी संग्रह पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है और यही इस कृति
की उपादेयता भी है । संजय विद्रोही ने अपनी कहानियों के लिए
ग्राफ़िक्स और चित्र स्वयं बनाए हैं । किसी कहानी के कथ्य और
तेवर से मिलते जुलते भावों को केनवस पर सही तरीके से स्वयं
लेखक ही उतार सकता है यदि वह स्वयं भी एक मँजा हुआ कलाकार हो.
कथाकार संजय विद्रोही यहाँ पर एक मँजे हुए कलाकार भी नजर आते
हैं । कहीं-कहीं उनकी बनाई कुछ कलाकृतियाँ उनकी कहानियों से भी
ज्यादा प्रभावित करती हैं । पाठकों को कहानीकार के बहुआयामी
प्रतिभा का दर्शन उनकी इन कलाकृतियों से सहज ही हो जाता है ।
(संजय
विद्रोही का यह कहानी संग्रह
रचनाकार में इंटरनेट पर हिन्दी भाषा
में किसी जीवित कथाकार का प्रथम प्रकाशित संग्रह बना, जिसे
पीडीएफ़ प्रारूप में इंटरनेट से डाउनलोड कर पढ़ने योग्य भी
प्रकाशित किया गया है ।)
कहानी संग्रहः कभी यूँ भी तो हो’
कहानीकारः संजय विद्रोही
प्रकाशनः रचनाकार
मूल्यः मुफ़्त

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