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डॉ. श्रोत्रिय के रचना कर्म का प्रीतिपूर्वक बखान/समीक्षकः डॉ. बलदेव/संपादक- उर्मिला शिरिष

 
 

डॉ. श्रोत्रिय के रचना कर्म का प्रीतिपूर्वक बखान

समीक्षकःडॉ. बलदेव

 

         

      डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय पर केंद्रित आलोचना की तीसरी परंपरा उर्मिला शिरीष के संपादन में प्रकाशित रचना-कर्म की एक विशाल ग्रंथ है । डॉ. श्रोत्रिय पर केंद्रित यह किताब, व्यक्तित्वः संकल्प और प्रतिश्रुति, आलोचक तीसरी परंपरा, नाटककार संवेदन के सरोकार, संपादक सृजन के पक्षधर, निबंधकार, चिंतक की दुनिया, बातचीत एक अलग आवाज़ और पत्र, सम्मतियाँ और लेखक परिचय आदि सात खंडों में विभक्त है, इस ग्रंथ के अध्ययन से डॉ. श्रोत्रिय का चेहरा भिन्न-भिन्न मुद्राओं में प्रत्येक पृष्ठ पर हमसे संवाद करता नज़र आता है ।

 

       डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय श्रमजीवी साहित्यिक संपादक हैं । उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी दक्षता, कुशलता और सामर्थ्य का प्रदर्शन एक सीमा में जिस निष्पक्षता, लोकतांत्रिकता, वस्तुपरकता और आभिजात्य के साथ किया है, वह विरल है, वे अंकुठित गंभीर चिंतन के व्यक्ति हैं । वे बीमार मानसिकता के नहीं स्वस्थ और तेजस्वी मानसिकता के आलोचक हैं । राजनीतिक दखल और दबाब के चलते भवानी प्रसाद मिश्र, धूमिल, मुक्तिबोध, राजकमल चौधरी, धर्मवीर भारती को उनके समय में जो श्रेय मिलना था वह नहीं पाया था, परंतु डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के प्रखर वैचारिकता ने उन लेखकों से पहले अधिकाधिक महत्व प्रदान किया । डॉ. श्रोत्रिय को शिविरबद्धता पसंद नहीं, वैयक्तिक जीवन में भी वे, असंयमित टिप्पणी नहीं करते । लेकिन, उत्पीड़क, अन्यायी, मानवद्रोही और भ्रष्ट सत्ता पर अत्यंत निर्भीकता और तेजस्विता के साथ प्रहार करते हैं, जो कि उनकी गहरी मानवीय प्रतिबद्धता का पता देती है, इस बात को ज्ञानोदय के प्रत्येक संपादकीय में देखा जा सकता है । इसके पीछे भी कारण हैं-

 

       डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय बचपन से ही स्वाभिमानी छात्र थे । उन्होंने अपना कैरियर प्रायमरी स्कूल की मास्टरी से की थी और नौकरी करते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय की उच्चतम डिग्री डी.लिट् तक हासिल की । विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरी की । प्रोफेसर बनते-बनते प्रभाकर एक नामचीन लेखक के रूप में ख्यात हो चुके थे । प्रभाकर अपने सिद्धातों के प्रति बेहद जिद्दी हैं, आपाधापी, उठापटक, कतरव्योंत उन्हें नहीं भाता । उन्होंने साक्षात्कार, अक्षरा, वागर्थ जैसी पत्रिकाओं को स्तरीय बनाया । प्रभाकर माचवे जी के निदेशकीय कार्यकाल में उन्होंने एक ताजा हवा के झोंके के साथ इस संस्थान में प्रवेश किया, और अपनी निर्माणधर्मी नयी योजनाओं ने अहिंदी भाषा कोलकाता के हिंदी के स्वागत में बाहें पसारने के लिए अग्रसर कर दिया । ज्ञानोदय के निदेशक होते ही उन्होंने संस्था-प्रतिष्ठान को बहुआयामी सृजनधर्मी, चितनपरक, मौलिकता सपंन्न और कल्पनाशीलता का प्रकाश पुंज ही बना दिया । वर्तमान में वे एक अद्वितीय संपादक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं ।

 

       डॉक्टर साहब एक रसवादी आलोचक हैं, रमेश दबे उनकी कविता की तीसरी आँख की चर्चा करते हुए लिखते है- वे काव्य सत्ता से टकराते हैं, काव्य की आस्वाद भूमिका का उत्खनन करते हैं और रस की धारा के प्रवाह को पकड़ते हैं । उनकी आलोचना सर्जक और आलोचक के बीच संवाद की जो स्पेस रचती है उससे रचना के अनेक सूत्रों का पता चलता है और अनेक शून्य सर्जक की ध्वनि से मुखर हो उठते हैं । राजेश जोशी ने कविता की तीसरी आँख को काव्य आलोचना के नये उपकरण ढूढ़ने की एक सार्थक कोशिश मानते हैं । डॉ. श्रोत्रिय रस की कला-वृति की सफलता को जोशी के शब्दों में अंतिम निर्धारक पदार्थ मानते हैं ।

 

       श्री श्रोत्रिय निबंधकार, उपन्यासकार तो हैं ही वे एक सफल नाटककार भी हैं । उनके नाटकों में सत्य का सामना और अगले संघर्ष की तैयारी देखने को मिलती है । उनके प्रथम नाटक की भव्यता की चर्चा करते हुए डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी सही टिप्पणी करते हैं- इला’  रंग-दृष्ठि नाट्यशिल्प और नाटक की अंतर्वस्तु को लेकर एक परिपक्व नाटककार का परिचय देती हैं । नाटक के रंगविधान में भारतीय और  सात्विक वृत्तियों के साथ कौशिकी और आरभटी का द्वंद्वात्मक सहगुंफन इसे आस्वादन का सुंदर धरातल बनाता है ।

 

       डॉ. श्रोत्रिय हमारे समय के एक समर्थ आलोचक ही नहीं श्रेष्ठ निबंधकार भी हैं, सर्जना का अग्निपथ नामक उनके निबंध संग्रह की चर्चा करते हुए हरियश राय ने सटीक टिप्पणी की है । पुस्तक के सभी लेखों में अमेरिका द्वारा पल्लवित और पोषित साम्राज्यवाद और बाजारवाद से उत्पन्न विविध संदर्भों का विश्लेषण श्री श्रोत्रिय जी ने इस किताब में एक महत्वपूर्ण बात कही है- इस साम्राज्यवाद ने प्रतिस्पर्धा की एक ऐसी लड़ाई को जन्म दिया है, जहाँ मानवीयता, भाईचारा, मनुष्यता, उदारता सब खतरे में पड़ गये हैं । इस ग्रंथ का सबसे महत्वपूर्ण अंश है कुछ चुने हुए पत्र जिससे डॉ. श्रोत्रिय के विराट व्यक्तित्व पर विपुल प्रकाश पड़ता है । सुमन लिखते हैं- तुम्हारी लेखनी ने अपनी अलग पहिचान बना ली है जो जो सर्जक की संवेदनाऔं को बिना किसी पूर्वग्रह के परखने का प्रयत्न करती है । अशोक इला को पढ़ते हुए अपनी प्रतिक्रिया लम्बी चिट्ठी के रूप में व्यक्त करते हुए लिखते हैं । इसमें नाटक की अपार संभवानाओं का एहसास होता है । संवाद की प्रशंसा आचार्य विनयमोहन शर्मा ने इन शब्दों में किया है- नयी कविता और कवियों को समझने के लिए संवाद से अधिक विश्वसनीय समीक्षा कृति अभी तक मेरे पढने में नहीं आयी । बधाई

 

       संक्षेप में आलोचना की तीसरी परपंरा डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के रचना कर्म का प्रीतिपूर्वक बखान तो करती ही है, इससे अधुनातन साहित्य पर भी यथेष्ट प्रकाश पड़ती है । कुल मिलाकर उर्मिला शिरीष का यह संपादकीय कर्म भी अनूठा है, निर्विवाद है रस का सुंदर नियोजन भी है, मैं इस के लिए जितना साधूवाद करूँ कमतर है ।

 

आलोच्य ग्रंथ           आलोचना की तीसरी परंपरा

संपादक               उर्मिला शिरीष

प्रकाशक               नेशनल पब्लिकेशन हाउस नयी दिल्ली

पृष्ठ संख्या             542

मूल्य                 मात्र 600 रुपये

 

 

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विद्वानों के परिश्रम को विद्वान ही जानता है - अश्वघोष

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ

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