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ललित निबंधों में- विद्यानिवास मिश्र नारियल की बात अलग है । वह संपूर्ण जीवन है, एक कठोर आवरण में मधुर रस संहत रूप से संचित करने वाला जीवन है । जो लोकगीत मैंने पहले उद्धृत किया था उसका यही तो अभिप्राय है कि तुम संपूर्ण जीवन जियो, कठोर भी बनो, मधुर भी बनो । बिना कठोर हुए, बिना कर्तव्यपरायण हुए करुणा कहाँ से आएगी।
'मानस’ में शक्ति-भक्ति का संगम विवेकी राय कहानियों में- मक्सिम गोर्की
लोगों से कहने के लिए मेरे पास क्या है
?
क्या वे ही सब चीजें, जि
उमेश द्विवेदी
संस्मरण में-
नीरजा द्विवेदी
संस्कार में विष्णु प्रभाकर कथोपकथन डॉ. महेशचन्द्र शर्मा
ललित कुमार
कृति-समीक्षा में-
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