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लघुकथा जीवन की
आलोचना है |
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कमल किशोर गोयनका
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मेरे
विचार में लघुकथा के चर्चित एवं विवादास्पद होने के मूल में एक बड़ा कारण यही है कि इसे पिछले दशक
के युवा रचनाकारों ने अपनी रचनाधर्मिता का मूलाधार बनाया और इसे
स्थापित एवं स्वीकृत कराने में उसी प्रकार का प्रयास किया, जैसा उसके
पूर्व युवा पीढियाँ साहित्य के मैदान में कर चुकी थीं । मेरा कहना यह है कि यदि आठवें दशक से पूर्व और उस कालखंड में प्रौढ़ और वयोवृद्ध
पीढ़ी के लेखकों ने लघुकथा को उचित प्रश्रय दिया होता, उसकी रचना की एक
सशक्त परंपरा बना दी होती तो आठवें दशक में लघुकथा का ऐसा विस्फोटक
आंदोलन आरंभ नहीं होता और न वह चर्चित एवं विवादास्पद होती। हाँ,
उसमें युगधर्म के अनुरूप विषय एवं शिल्प में परिवर्तन होते जो किसी भी
विधा में काल के प्रवाह के साथ होते रहते हैं ।
लघुकथा के इस आंदोलन के
पीछे मुझे एक और कारण भी दृष्टिगत होता है । हम सब जानते हैं कि
स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद हिंदी कहानी में नई कहानी, सचेतन
कहानी, समांतर कहानी, अकहानी, सक्रिय कहानी तथा कविता के क्षेत्र में
अकविता-आंदोलन के उपरांत साहित्यकाश में कुछ ऐसा वैक्यूम तथा शून्य छा
गया कि किसी नए आंदोलन की संभावना निर्मित होने लगी, किंतु एक बात
ध्यान में रखना आवश्यक है कि जहाँ नई कहानी तथा अकविता जैसे
साहित्य-आंदोलन अपने समय की साहित्यिक प्रवृत्तियों की प्रतिक्रिया से
उत्पन्न अपनी-अपनी विधाओं को नई दिशाओं की ओर उन्मुख करने वाले थे, वहाँ
लघुकथा का आंदोलन उसे विधा के रूप में स्थापित या स्वीकृत कराने
के मूल लक्ष्य को लेकर चला रहा था। इस प्रकार आठवें दशक का
लघुकथा-आंदोलन इस अर्थ
में विशिष्ट बन जाता है कि जिस रूप में लघुकथाकारों
ने लघुकथा के आस्तित्व को स्थापित करने तथा उसे निरंतर बलशाली, युगधर्म
के अनुरूप एवं संदर्भो में परिपूर्ण विधा बनाने का सफल प्रयत्न किया,
वह साहित्य के इतिहास में एक अनूठा उदाहरण ही माना जाएगा । लघुकथा से
पूर्व के साहित्य-आंदोलन अपनी विधा को नई गति दे रहे थे, उसे नया रूप
दे रहे थे, जबकि लघुकथा-आंदोलन अपनी विधा को साहित्यिक मान्यता दिलाने
के लिए, उसके लेखक सामूहिक प्रत्यन कर रहे थे। इतनी बड़ी संख्या में,
इतने एकमत से तथा इतनी विपुल रचनाओं के साथ पहली बार हिंदी में कोई
साहित्यिक आंदोलन हो रहा था, परंतु
निश्चय ही विचारणीय प्रश्न
है कि जो परिणाम नई कहानी, अकविता आदि आंदोलनों के निकले वे लघुकथा को
प्राप्त क्यों न हो सके
? …..
लघुकथा की
प्रतिष्ठा एवं विधा के रूप में स्वीकृत होने में एक बड़ी बाधा यह रही
है कि दो पंक्तियों के संवाद, चुटकुलों, परिहास, विनोद-उक्तियों
आदि को
भी लघुकथा की संज्ञा के साथ प्रस्तुत किया जाता रहा है । मेरे विचार
में लघुकथा को ऐसी अराजकता, ऐसी मनमानी, ऐसी घोषणाओं से स्वयं को बचाना
होगा और अपने विधागत स्वरूप की रक्षा करने के लिए सभी प्रकार की बचकानी
हरकतों पर कठोरता से अंकुश लगाना होगा । अब स्थिति यह है कि जिसे कलम
पकड़ने की तमीज़ नहीं है, वह भी सुने-सुनाए. चुटकुले को लघुकथा का
तावीज पहनाकर बजरबट्टू की तरह पेश कर देता है और आफ़त की मारी लघु
पत्रिकाएँ उन्हें छाप भी देती हैं और वह कलम-बहादुर स्वयं को एक
प्रतिष्ठित लघुकथाकार घोषित कर देता है । आज ऐसे लघुकथाकारों की ऐसी
फसल उग आई है, जिसे काटकर साफ करना कठिन हो रहा है । यह फसल न केवल
भूमि की उर्वरा शक्ति को कम कर रही है, बल्कि अपने झाड़-झंखाड़ में
लघुकथा के वास्तविक पौधों की प्राणशक्ति को सोखते हुए उसे छिपा-दबाकर
मार देना चाहती है। जो लघुकथाकार, पत्रिकाओं के संपादक, समीक्षक तथा
पाठक लघुकथा को फलते-फूलते देखना चाहते हैं, उन्हें लघकथाओं के ढेर में
से वास्तविक लघुकथाओं को चुनकर शेष को भूसे के समान फटककर फेंक देना
होगा। जब तक यह नहीं होगा, लघुकथा की वास्तविक रूपाकृति, उसकी ऊर्जा और
शक्ति तथा उसका स्वतंत्र तेजस्वी अस्तित्व स्थापित नहीं हो पाएगा ।
मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि
लघुकथा में जैसी आपाधापी, अराजकता तथा भीड़भाड़ है, वैसी हिंदी में
किसी विधा के साथ नहीं रही । काव्य में महाकाव्य, खंडकाव्य, लंबी
कविता, कविता गीत, दोहा आदि का अंतर बिलकुल स्पष्ट रहा है और वहाँ दोहा
को लंबी कविता में सम्मिलित करने की कोई संभावना नहीं है। इसी प्रकार
गद्य में भी उपन्यास, लंबी कहानी, कहानी आदि की स्वतंत्र सत्ता है और
एक विधा के दूसरी विधा में प्रवेश की संभावना अत्यल्प है, लेकिन लघुकथा
में विधा की पवित्रता एवं उसकी स्वतंत्र सत्ता को बनाए रखने का कोई
प्रयत्न दृष्टिगत नहीं होता । इसमें गद्य में लिखी कोई भी लघु रचना
सम्मिलित होने का गौरव प्राप्त कर सकती है । मेरे विचार में लघुकथा का
गद्य की अन्य लघु विधाओं एवं दुराग्रह से मुक्त होना चाहिए । मेरे
विचार में इस पर अंकुश रखने का एक आधार हो सकता है, यदि हम लघुकथा में
कथा की अनिवार्य सत्ता को स्वीकार कर लें । जब लघुकथा कथा होगी, चाहे
वह लघु ही हो, तो उसकी चुटकुलों, विनोद-कथनों, हास-परिहासों आदि से
स्वतः मुक्ति मिल जाएगी और यह एक कथात्मक विधा, अर्थात् अपने कथा-कुल
की वास्तविक संतान बनकर पाठकों के बीच अपनी स्वतंत्र सत्ता बना सकेगी ।
लघुकथा की विचार-गोष्टियों, लेखों आदि में
बार-बार यह चर्चा की जाती है कि वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित लेखकों को भी
लघुकथा-लेखन की ओर प्रवृत होना चाहिए । इस माँग के पीछे कई कारण हैं ।
एक तो यही कि वरिष्ठ लेखकों की लघुकथाओं से लघुकथा समृद्ध होगी तथा
उसकी प्रतिष्ठा में मदद मिलेगी :
दूसरे, वरिष्ठ लेखकों द्वारा इसे उपेक्षणीय विधा समझने का दुराग्रह
टूटेगा :
लेकिन मेरे विचार में इसमें एक और बात छिपी हुई है, जिस पर प्रत्येक
लघुकथा-लेखक को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए । असल में यह माँग उन
वरिष्ठ लेखकों से ही है जो महाकाव्य, नाटक,उपन्यास, कहानी अदि लिखते
रहे हैं अर्थात् अन्य विधाओं में जिन्होंने श्रेष्ठ रचनाएँ दी हैं,
उन्हें लघुकथा तक ही सीरित न रहकर अन्य विधाओं में भी कलम उठानी चाहिए,
क्योंकि काव्य, नाटक, उपन्यास आदि विधाओं में भी कलम उठानी चाहिए,
क्योंकि काव्य, नाटक, उपन्यास आदि विधाओं में रचना करके वे जीवन को
भिन्न-भिन्न शैलियों से अवगत होकर लघुकथा में उनका सफल प्रयोग कर
सकेंगे । इसके साथ वह रचनाकार श्रेष्ठ माना जाता है जो जीवन की
व्यापकता के साथ जीवन की सूक्ष्मता का भी चित्रण करता है।
लघुकथा में
प्रायः जीवन की सूक्ष्मता एवं लघुत्व का उद्घाटन होता है । यदि
लघुकथाकार जीवन को व्यापक धरातल पर भी ग्रहण करने का अभ्यासी है तो वह
जीवन के लघु रूप को अधिक कलात्मक रूप में अभिव्यक्त करने की क्षमता
विकसित कर सकता है और उसके लिए लघुकथा एक चैलेंज बन सकती है, क्योंकि
जीवन को लघु रूप देना या लघु रूप को कलातमक रूप देना दोनों ही कलात्मक
श्रेष्ठता के बिना संभव नहीं है । जो लघुकथाकार केवल लघुकथा तक सीमित
रहते हैं, वे स्वयं को एक दायरे में बंद कर लेते हैं और इससे उनकी
रचनाधर्मिता भी सीमित होकर रह जाती है, जो लघुकथा के हित में नहीं है ।
यदि हम साहित्य का इतिहास देखें तो कबीर, सूरदास, बिहारी, गालिब जैसे
कम ही रचनाकार मिलेंगे जिन्होंने काव्य के सबसे छोटे छंद में लिखकर
बड़ा यश प्राप्त किया । ये साहित्यकार अपवाद ही माने जा सकते हैं, जबकि
इसके विपरीत ऐसे अनेक यशस्वी लेखक मिलेंगे, जिन्होंने अनेक विधाओं को
अपनी सर्जनात्मकता का आधार बनाया हो । अतः लघुकथाकारों को अन्य विधाओं
में भी पूरजोर आज़माना चाहिए और अपनी रचनाधर्मिता को विस्तार देना
चाहिए । लघुकथा तो उनकी अपनी ही है । दूसरी विधाओं में कलम चलाने का
लाभ, वे देखेंगे, लघुकथा को अवश्य ही मिलेगा ।
लघुकथा की परिभाषा को लेकर कई लघुकथाकारों तथा
लघुकथा-समीक्षकों ने बड़ा परिश्रम किया है, लेकिन इसकी अभी तक कोई
सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकी है। असल में अभी यह संभव भी नहीं है
। साहित्य में जो विधा अभी युवा भी न हो पाई है, उसे परिभाषा में
बाँधना उचित नहीं है और वैसे भी विधाओं की क्या कहें, साहित्य की भी
कोई सर्वमान्य-सर्वस्वीकृत परिभाषा नहीं दी जा सकी है। भारतीय
काव्यशास्त्र इसका प्रमाण है कि प्रत्येक आचार्य ने काव्य की परिभाषा
को बदलकर अपनी नई परिभाषा दी है, और यह क्रम शताब्दियों से चलता रहा
है। आधुनिक काल में जिस प्रकार मानवीय
परिस्थितियाँ बदली हैं, वैसे ही
साहित्य की परिभाषा भी बदली है। प्रेमचंद ने अपने एक लेख में साहित्य
को परिभाषित करते हुए लिखा है कि
‘साहित्य
जीवन की आलोचना या व्याख्या है।’
मुझे आज भी यह परिभाषा सबसे उपयुक्त लगती है। अतः यदि मुझे लघुकथा की
परिभाषा देनी ही हो तो मैं कहूँगा कि
लघुकथा जीवन की आलोचना है। मेरे
विचार में इसकी यही सबसे उपयुक्त परिभाषा हो सकती है। लघुकथा की जो
परिभाषाएँ दी गई हैं, उनमें प्रायःलघुकथा की विशेषताओं तथा उपकरणों को
गिनाने की चेष्टा अधिक है, उसकी मूल आत्मा को पकड़ने की कम । असल में
लघुकथा भी साहित्य की एक विधा है और उस पर भी साहित्य के सभी सामान्य
नियम लागू होते हैं । यह ठीक है वह एक स्वतंत्र विधा है, परंतु है वह
साहित्य की ही न, तब वह साहित्य की मूल प्रवृत्तियों से स्वयं को मुक्त
नहीं कर सकती। कुछ लघुकथाकारों तथा उसके समीक्षकों ने लघुकथा की
संवेदना एवं शिल्प के संबंध में ऐसे नियमों की कल्पना कर ली है कि उनका
प्रयास हास्यास्पद बनकर रह गया है । प्रत्येक लघुकथाकार अपनी ओर से
नई-नई अनिवार्यता जोड़ देता है और अन्यों से आशा करता है कि वे उसका
पालन करें । लघुकथाकारों के ऐसे प्रयासों ने भी लघुकथा को अपयश ही
दिलाया है और
‘अपनी-अपनी
ढपली अपना-अपना राग’-जैसे
स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह स्थिति तब है, जब लघुकथाकारों ने अनेक बार
साथ-साथ बैठकर विचार-विमर्श किया है और एकजुट होकर लघुकथा-आंदोलन को
अधिक-से-अधिक शक्तिशाली बनाने का व्रत लिया है, लेकिन लघुकथाकारों को
दस-बीस लघुकथा लिखकर प्रतिष्ठित होने की इतनी जल्दी है कि वे अपने
बचकाने प्रयासों से न केवल
स्वयं हास्यास्पद बनते हैं,
बल्कि लघुकथा-आंदोलन को भी बदनाम करते हैं । मेरे विचार में इसके लिए
लघु पत्रिकाओं के संपादक सबसे अधिक उत्तरदायी है जो किसी भी चुटकुले,
रिपोटिंग, घटना, पहेली आदि को लघुकथा का शीर्षक देकर छाप रहे हैं । कुछ
ज़िम्मेदारी प्रतिष्ठत लघुकथाकारों की भी है जो ऐसी लघकथाओं की
भर्त्सना करने से कतराते रहे हैं ।
लघुकथा, जैसा मैंने अभी कहा है, जीवन की
व्याख्या है । मानवीय जीवन इसका
उत्स-बिंदु ही नहीं है, बल्कि इसके
बीज से जो वृक्ष बनता है, उस पर जो फूल-पत्तियाँ जन्म लेती हैं, वे सब
मानव-जीनव को ही रूपायित करती हैं । लघुकथा मानव-जीवन से ओत-प्रोत है,
उसे आत्मसात् किए है, उसका वास्तविक प्रतिबिंब है । मानव-जीवन की
परिस्थितियाँ, उसके संकल्प-विकल्प, तनाव-संघर्ष, सत्य-असत्य,
नीति-अनीति, दमन-शोषण एवं विद्रोह सभी लघुकथा के विषय हो सकते है ।
लघुकथा महाकाव्य तथा नाटक के समान जीवन के किन्हीं विशिष्ट पक्षों तथा
क्रियाकलापों से बँधी नहीं है, वह तो हर उस क्षण, पल,अनुभव तथा मानवीय
चरण की कथा कह सकती है जो इस धरती पर क्या ब्रह्मांड के किसी ग्रह पर
मनुष्य द्वारा रखे गए हों । मनुष्य जहाँ-जहाँ है, चाहे वह धरती पर है
या समुद्र की अतल गहराइयों में अथवा महाशून्य आकाश में, वहाँ-वहाँ की
कथात्मक संवेदना लघुकथा का विषय हो सकती है । इसलिए यदि आप लघुकथाकार
से केवल भोगा हुआ सत्य ही देने की माँग करते हैं तो आप उसके रचनात्मक
धरातल को बहुत सीमित कर देते हैं । इसीलिए जब लघुकथा–लेखक
लोककथाओं, मिथकों, पशु-पक्षियों, वृक्षों आदि माध्यमों से लघुकथा की
रचना करता है, तब चाहे उसका भोगा सत्य केंद्र में न हो, जीवन-सत्य
अवश्य ही उसका प्रतिपाद्य होता है और मेरे विचार में लघुकथा की सबसे
बड़ी कसौटी यह है कि- “क्या
वह जीवन-सत्य का उद्धाटन कर सकी है ?
जो लघुकथा जीवन-सत्य को अभिव्यक्त करती है, चाहे वह लेखक के भोगे जीवन
से न भी निकली हो, वह अवश्य ही साहित्य की स्थायी वस्तु है।”
कुछ युवा रचनाकारों ने लघुकथा का शास्त्र बनाने
का प्रयत्न किया है । इसके लिए परिचर्चाएँ आयोजित की गईं, बैठकें हुई,
वक्तव्य प्रसारित हुए और प्रस्ताव पारित हुए और फिर लघुकथा का शास्त्र
निर्मित हुआ । यह आधुनिक हिंदी साहित्य में पहली बार नहीं हुआ था।
छायावादी, प्रगतिवादी, नई कविता तथा अकवितावादियों और नई कहानी,
अकहानीवादियों ने भी इसी प्रकार के वक्तव्य
था को भी किसी शास्त्र में जकड़ने की कोई
आवश्यकता नहीं है। शास्त्र प्रतिभाहीन लेखकों के लिए होता है, जो एक
भीड़ की तरह प्रत्येक विधा के चरम–विकास
के दौर में एकत्र हो जाते हैं, अन्यथा प्रतिभावान लेखक परंपरागत
शास्त्र का भंजन करके अपनी रचनाओं के द्वारा एक
नए शास्त्र का निर्माण
करके अपनी रचना-विधा को विकास के नए मोड़ तक पहुँचा देता है। लघुकथा को
आज ऐसे ही रचनाकारों की प्रतीक्षा है ।

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