|
दिनकर
जी ने कहा था,
‘जब
से स्वराज्य हुआ है भारत की भाषाओं में जान आ गई है । जिसमें
जहाँ तक बढ़ने का दम है वह वहां तक बढ़ने की कोशिश कर रहा है ।
डोगरी के लोकगीत कितने विलक्षण होते हैं ये देखकर आजकल में दंग
हूं । डोगरी धन्य है न जाने इस भाषा के भीतर कैसे-कैसे
रत्न
छिपे हुए हैं । डोगरी लोकगीतों के अनुवाद हिन्दी में अवश्य आने
चाहिए और हिन्दी को उन सभी कवियों और लेखकों से परिचित कराना
चाहिए जो पहाड़ की तरह इस खूबसूरत भाषा में लिख रहे हैं ।’
हमारे भारत में सैकड़ों भाषाएँ, उपभाषाएँ बोलियाँ-ठोलियाँ है ।
इन भाषाओं में अनगिनत लोकगीत हैं जो अपने-अपने प्रदेश के
रस्मों-रिवाज बांकपन, उत्सवों और प्रेम की पेगों में डूबते
उतराते नज़र आता हैं। ये लोकगीत समाज का साफ सुथरा दर्पण हैं
है हर प्रदेश के लोकगीत अपनी भाषा का अति उत्तम चेहरा लिये
गाँव-गाँव डोलते रहते हैं ।
लोक-गीतों की गलियों में घूमना मैंने बचपन में ही शुरु नहीं
किया । बचपन में वाणी फूटते ही पिताजी ने संस्कृत के श्लोक
सिखाए थे। ये श्लोक पढ़ते गाते समय एक विद्वता भरा अहंकार और
दूसरों से श्रेष्ठ
होने का भाव उपजता । मैं और मुझसे छोटा भाई
आशु हम तीन बरस की उम्र में ही खड़े होकर श्लोक पढ़ते तो भीड़
इकट्ठी हो जाती थी । 1947 में बंटवारे के समय जब पिताजी नहीं
रहे तब जम्मू से चालीस किलोमीटर दूर हमारे पैतृक गाँप पुरमंडल
में हमें ताऊ जी ले गये । इसी गांव में मैंने डोगरी के
लोकगीतों को सुना । ये लोकगीत शिवालिक की पहाड़ियों में
पास-पास बैठे वृक्षों से झर कर आती हवाओं को अपने सुरों से
सुवासित करके मेरे तन-मन को हरा कर गये । सात-आठ बरस की उम्र
में पिता का अभाव भरने में उन्होंने कोई कमी न की ।
गाँव में हमारे घर एक दूसरे गाँव की औरत आया करती थी । उसका नाम
बचनू था काफी मैली-कुचैली दरिद्दरी सी
थी बचनू । वो आते ही निरीहता से हंसना शुरु कर देती और गोबर लिपे
चौके के बाहर बैठ जाती । मेरी ताई बड़े से बरतन में छाछ भरकर
उसे पिलाती उसके बाद रात के बासी खमीरों पर गलगल का आचार रखकर
बचनू को देती और लस्सी वाला बरतन फिर भर देती बचनू खाते-खाते
किसी समय बीच में बोल उठती ।
‘पांडिताईन
तुम्हें मालूम था न मुझे भूख लगी है । छःकोस चल कर आई हूं घर
में तो मुंह भी न जुठराया था ।’
मेरी ताई उसे बड़ी तीसमारखानी नजर से देखकर एक और खमीरा उसकी
थाली में डाल देती । उसके खा चुकने के बाद मेरी बड़ी भाभी और
ताई जब उससे डोगरी गीत गाने का
अनुरोध करती तब मैं सोचती क्या
ये सचमुच गा सकती है या इसका मज़ाक उड़ाया जा रहा है । फिर बचनू
जैसे उनके आग्रह के आगे
झूक जाती । आँखें बंद करके कानों पर
हाथ रखे बड़ी उदास मुद्रा में आ जाती और गाने लगती-
‘चन्न
म्हाड़ा चढ़ेया ते बैरिया दे ओहले
बैर पटाओ म्हाड़ा चन्न मुहां बोले
मिलना जरुर मेरी जान हो ...’
(मेरा चांद बेर के दरख्त की ओट में चढ़ा है । दरख्त कटवा दो
ताकि मेरा चांद मुंह से बोल सके । मेरी जान मिलना तो जरुर है।
) मेरी ताई दत्तचित्त होकर हैरानी से उसे देखती और भाभी हंसने
लगती । इसे कौन मिलने आएगा पर
मैने देखा गाते-गाते बचनू, वो
दरिद्दरी सी औरत एक अप्सरा हो गई, और उसके बदन से जैसे चांदनी
की रश्मियाँ फूटने लगीं । इसके बाद उसने और भी डोगरी गीत गाए ।
पर मेरे कानों में वो पहला गीत ही गूंजता रहा । मिलना जरुर
मेरी जान हो ।
मेरे नन्हे मस्तिष्क में यह सवाल पौधों की टहनियों की तरह
झूलने लगा । ये लोकगीत कौन
लिखता है कौन धुनों में बांधता है कौन इनको सुनते
ही देह में मदहोशी सी भर देता है । उस बचनू ने मुझे दीवाना कर
दिया । श्लोक गाते समय विदुषी होने का वह एहसास और लोकगीत
सुनते ही मानो
शाहरग को किसी ने सितार की तरह छेड़ कर खून की
बूंद-बूंद में नृत्य की लय भर दी हो ।
तो ये लोकगीत थे जिन्होंने मेरी रुह में उथल-पुथल मचा दी ।
सोते-जागते उठते-बैठते घूमते ये लोकगीत संग-संग रहने लगे ।
इन्हीं लोकगीतों की रेशमी डोर पकड़ कर मैं आसमान में उगे चांद
से बातें करने लगी वे क्षण अद्भूत थे ।
आज मैं आपको डोगरी के लोकगीतों की दुनिया में ले चलूंगी
जिन्होंने मुझे कवयित्री बना दिया । मुझे याद आता है गांव के
एक घर की गोबर लिपी छत पर बैठकर कुछ औरतें गा रही थीं आसमान
में चांद एक अच्छे श्रोता की तरह बोल पकड़ने के यत्न में हिल
रहा था । औरतें दत्तचित्त होकर गा रही थी डुग्गर की इन सुंदर
औरतों के गले में मिठास के साथ एक खुलापन था जो चीड़ों की
सायं-सायं के साथ होड़ ले रहा था ।
‘होरने
सपाइऐं दे चिट्टे चिट्टे कपड़े
तूँ कैन्जो कीता मैला बेस
सपाइया
नामां कटाई घर आ...
तूं’
कच्चिएं ते बैरकें सपाई स्हाड़े
रौहन्दे पक्किएं ते रौहन्दे
ओहदेदार सपाइया
नामा कटाई घर आ...
(और सिपाहियों के कपड़े सफेद हैं तुमने मैला भेष क्यूं बनाया
है मेरे सिपाही नाम कटवा कर घर आ जाओ । कच्ची बैरकों में हमारे
सिपाही रहते हैं पक्कियों में ओहदेदार रहते हैं सिपाही जी ये
असमानता देखकर ही घर आ जाओ )
सिपाही की पत्नी को याद आता होगा फौज पर जाते सिपाही का तेवर
और अपनी आंसू भरी मैली आंखे । ये गीत इस दृश्य को कैसे साकार
करता है ।
‘नई
कर गोरिऐ मैलियाँ अक्खियां
कल परदेसिऐं
टुरी वो जाना
शाहूकार
कर दें शाहूकारियां
आशकें मानुऐं मंगी वो खाना
जिन्दे टुरी वो
जाना ।’
(गोरी आंखें मैली मत करो कल परदेसी चले जाएंगे साहूकार तो
साहूकारी करता है पर आशिक मांग कर
खाता है।)
कश्मीर का प्रश्न पता नहीं कब से खड़ा है । एक लोकगीत है।
असें नेंई देनी कश्मीर
माऐं लक्ख जत्न करो
छाती पर खाग्गे ती
भाएं लक्ख जत्न करो
(‘हम
कश्मीर नहीं देंगे चाहे जितने भी यत्न कर लो। हम तीर अपनी छाती
पर खांएंगे आप कितने ही यत्न कर लो ।’)
लोकगीतों में सिपाहियों पर लिखे सैकड़ों लोकगीत हैं । इन
लोकगीतों में सिपाहियों की पत्नियों पर होने वाले जुलमों की
कथाएँ भी हैं और वीरगति प्राप्त सिपाहियों की पत्नियों की
असहायता दुर्दशा और बदकिस्मती की तस्वीरें भी हैं ।
आम डुग्गर जन जीवन में सिपाहियों के बाद प्रेम और विरह का भी
लोकगीतों में खूब उपयोग हुआ है। मैं समझती हूं पुरुष तो हर बात
नगाड़े की चोट पर खुले आम कहता रहा पर स्त्री ने ये बात
लोक0गीतों के ज़रिये कही । इसलिए मुझे लगता है कि ज्यादा लोकगीत
स्त्रियों ने ही रचे होंगे । पुरुष द्वारा रचे लोकगीत भी बहुत
हैं । एक बानगी देखिए
सञां दा बेला प्यागा दी त्रेला
गंगा दी छाली कुम्भें दा
मेला
मेरा तेरा खडिएं संजोगे दा मेला ।
(शाम की बेला या सुबह की ओस का समय, गंगा की लहरें या कुंभ का
मेला, मेरा
तेरा गोरी संयोग से ही मिलना होगा।)
एक लोकगीत जो किसी स्त्री के हौसले का जीता जागता प्रमाण है।
इसका मैं अनुवाद ही प्रस्तुत करती हूं ।
खसम मरे जी लूंगी यार मरे कैसे जियूंगी
कपड़ा फटे तो सी लूंगी
आसमान फटे तो कैसे सियूंगी
पता नहीं किन परिस्थितियों में
किसने ये गीत लिखा। इसके साथ मेरी एक स्मृति भी जुड़ी हुई है।
मैं उन दिनों मुम्बई में रहती थी। दिनकर जी आए हुए थे। हमारे घर
में भोजन करने के बाद उन्होंने मेरे पति देव को कहा मुझे
मरीन
लाइन्ज में छोड़ दीजिए वहां फलां अस्पताल में पृथ्वीराज कपूर
भरती हैं उन्हें देखने जुऊंगा । मैं भी साथ थी। पृथ्वीराज
कपूर जी का भव्य व्यक्तित्व और दिनकर जी की सौम्य उपस्थिति ।
दोनों बातें कर रहे थे । पृथ्वी राज जी ने पूछा यह लड़की कौन
है। दिनकर जी कहने लगे कि डोगरी की कवयित्री है तब उन्होंने
उपरोक्त लोकगीत डोगरी में सुना दिया । मुझे थोड़ी लज्जा महसूस
हुई । मैंने कहा कुछ नहीं फिर दिनकर जी ने कहा वो चांद वाली
लोकगीत सुना दो । मैंने सुना दिया तो दोनों बहुत प्रसन्न हो
गये ।
एक और लोकगीत जो निश्चय ही किसी पुरुष ने लिखा होगा । लीजिए
सुनिये
चिट्टे चौल बटोती दे ते मिट्ठा दाड़वां पीड़ै दा ।
केह हाल तेरे दुखै सुखै दा केह हाल तेरिऐ पीड़ेदा ।
(बटोत के चावल मीठे होते हैं । पीड़े गांव के अनारदाना में भी
बड़ा स्वाद होता है । तुम्हारे दुख सुख का क्या हाल है ।
तुम्हारे उस दर्द का क्या हुआ
?
)
ये गीत गाकर मैं बटोत में ही पहुंच जाती हूं । जहां चीड़े मिल
कर सांस लेती हैं,
औरतें सुबह अमृत चश्मे से पानी लाकर चौका शुरू करती हैं । जहां रात को चांद प्रेमियों से बातें करता
है।
मास सै सैइयों, सैन्सै सुकाए
रिन्जरा रेई गइयां हड्डियाँ
मेरे
राम बिना मेरे हरि बिना
दिन निक्के ते रात्ती बड्डियां
(मांस तो सखियों संशय से सूख गया, हड्डियाँ पिन्जर हो गईं ।
मेरे रांम, बिना मेरे हरि बिना दिन छोटे हैं और रातें बड़ी हैं
) भला हो भगवान का जो प्रेमियों के लाखों पर्दे ढंक
देता है।)
कृष्णा जैसा प्रमी कौन है। राधाकृष्ण ।
देवर को लेकर बड़े स्नेही गीत हैं। बेग़म अख्तर एक दादरा गाती
थीं ।
निहुरे निहुरे बहारैं अंगनवा निहुरे निहुरे
छोटे देवर तोरी
मुशकें बधँहों
जब घर अइहैं संवरिया रे
निहुरे निहरे
भारत की हर भाषा में सास-ननद-देवर पर लोकगीत हैं । डोगरी का
लोकगीत देखिए ।
औं बागें लोआन्नियां पत्ते
मेरा देर गेया
कलकत्ते
साड़ी नोआई देयां देरा
ओ मेरेया लोभिया देरा
(मेरा देवर कलकत्ते गया है । मैं बागो मैं पत्ते लगवा रही हूं
। ओ मेरे लोभी देवर, साड़ी लेकर आना ।)
ठिठोली ननद के साथ भी चलती है
सस्स ननान मिगी जीन नी दिन्दियां
घुट्ट ठंडा पानी पीन नीं दिन्नियां
आखदियां चरखा कत्त वो
माड़े, बान्कू देंया चाच्चुआ
अऊं गलानियां सच्च वो
मिगी बी लैई
चल कच्छ वो
म्हाड़े बान्कू देया चाचुआ
(सास ननद मुझे जीने नहीं देती ।
घूंट भर ठंडा पानी पीने नहीं देतीं । चरखा कातने को कहती हैं ।
मेरे बान्के के बापू मैं सच
कह रही हूं मुझे अपने साथ ले चलो )
बेटी को ससुराल भेजने का चाव, बिछोह और उसके सुख की आशा हर मां
बाप को रहती है । ये ऐसा बिछोह है जिसके लिए मां बाप दुआएँ
मांगते हैं । इस लोकगीत में मां बेटी के बाबुल से कहती है-
लाडली नीं रक्ख बाबला
तेरी लाड़ली दे, दिन थोड़े
लाडली में
ईयां रक्खी ए
जिएँ कागजै बिच्च ऐ सुन्ना
(बाबूल बेटी को, लाडली को मत
रखों तेरी, लाड़ली के दिन थोड़े
है । बाबूल कहते हैं । मैने अपनी बेटी को लाडली को, ऐसे रखा है
जैसे कागज में लपेट कर सोना रखते हैं । )
सच बात तो यह हैं कि बेटियाँ सब को बहुत प्यारी होती हैं उनके
दुख-सुख के गीत सुहाग-मेहंदी के गीत कई हैं परंन्तु पैदा होने
पर कोई मंगलगीत नहीं मिलता । पुत्र पैदा हो तो मंगल ही मंगल
गीत हैं । वैसे आजकल बेटी मांगने वाले भी कई जोड़े सुनने में
आते हैं। पिछले दिनों मैंने किसी पत्रिका में झारखंड में पुत्री
पैदा होने पर गाया जाने वाला बधाई गीत पढ़ा, पढ कर मन खिल उठा ।
बेटी जन्म सोना धरती सिंगार ऐ
नारी जन्म बेटी सुख का सार ऐ
सच बात तो ये है कि बेटी के बिना न घर गुलजार होता है न उसमें
अनुशासन आता है और सच तो ये है कि भगवान सृष्टि की रचना करके
सृष्टा कहलाता है और जब स्त्री बच्चा पैदा करती है तो वो भी
सृष्टा हो जाती है । भगवान हो जाती है। ये कुछ औरतें पता नहीं
क्यूं बराबरी चाहती हैं । पुरुष से तो उनका कद माँ बनते ही
ऊँचा हो जाता है। तभी तो अस्सी बरस का बूढ़ा भी दर्द होने पर
हाय माँ ही कहता है हाय बाप नहीं कहता । हाय री मेरी कादा
बहनों । मूर्ख शब्द बचा गई हूं। बेटे के पैदा होने पर डोगरी का
सोहर है-
बाला जरमेया नजो जे किश मंगना सै मंग
बाला जरमेया
बाला
जरमेया कैन्ता नोआयां चिड़िऐ दाददु
बाबा जरमेया
(पुरुष कहता है, ऐ नाज़ो वाली बालक पैदा हुआ है मांगो क्या
मांगती हो । ताजा ताज़ा मां बनी स्त्री कहती हैं मुझे चिड़िया
का दूध ला दो )
नामी तबला वादक
उस्ताद अल्लाह रक्खा खाँ डोगरा थे। मुझे बड़ा
सम्मान देते थे। घर पर आते तो मौज में आकर ये डोगरी गीत गाते
थें ।
राजी रौहना मेरी बाहमनी अड़ियै
जुग जीन्देया दे नीं मेले
उप्पर
धारा सिम्बल सुक्केया
ऐठ सुक्के ठंडे पानी
गोरिऐ नारे दे मुख
जे सुक्के
ऐ के तां बरती होई
राजा रौहना
(मेरी ब्राम्हणी ठीक रहो सुखी रहो ये मेले तो जिन्दा रहते हुए
ही हैं। ऊपर पहाड़ पर सिम्बल का दरख्त सूख गया है। धरती पर
ठंडे पानी की धारा सूख गई है। गोरी स्त्रियों के मुख भी सूख
गये हैं। ये क्या अनहोनी हो रही है।)
इत्तिफ़ाक से भाभी जी ब्राह्मणों के घर में पली थी । वो दिन
बड़े सुंदर थे।
और भाषाओं की तरह डोगरी में भी हजारों लोकगीत
हैं। हर मौके,हर त्यौहार, हर संस्कार, हर मौसम, हर बात पर
लोकगीत हैं पर सिपाहियों की पत्नियों के मन की वेदना लिए गीतों
की गिनती बेशुमार है। इसी एक गीत से अपनी ये समन्दर से ली गई
बून्दें माथे से लगा रही हूं ।
नूं पुच्छादी ऐ सस्सू कोला
बाहर सपाई कीया रौहन्दे न
भंगा
पुट्टे सथुरा पान्दे
सूंक सुट्टी सैई रौहन्दे न
(बहू सास से पूछती है मां, बाहर सिपाही कैसे रहते हैं । सास
कहती है, भांग के पौधे उखाड़ कर बिस्तर बिछाते हैं और निश्वास
लेकर सो जाते हैं।)
यह वेदना अपरंपार है इसका न आदि है न अंत इसे मैं प्रणाम करती
हूं । डोगरी लोकगीत मेरे संगी साथी और गुरु हैं इन्हें रचने
वालों को मेरा नमन ।

|