संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

लघुकथा

सिद्धेश्वर की दो लघुकथाएँ

लकीरें-अशोक मनवानी

माह के लघुकथाकार-डॉ. मनीषा वत्स

 
 

सिद्धेश्वर की दो लघुकथाएँ

सिद्धेश्वर

       त्यव्रत ने बहुत दुःखी मन से अपना मूंडन करा लिया । पिछले आठ महीने से वह हाईकोर्ट से इंसाफ पाने के लिए केस लड़ रहा था ।

 

       हजारों रुपये पानी की तरह बहा दिया उसने । हजारों रुपयों के कर्ज बोझ से दब गया वह । सिर्फ इस आशा में कि न्यायालय से उसे न्याय अवश्य मिलेगा ।

 

       वह बेगुनाह है । उसने न तो किसी यात्री को जान से मारने का प्रयास किया है, न तो उसकी जेब से पैसे छीने हैं । वह तो हमेशा आदर्श का पुजारी बनकर अपने मित्रों से उपहास झेलता रहा है। एक साहित्यकार होकर भला ऐसा घिनौना कार्य करेगा वह ?

 

       मगर, पुलिस वालों का क्या है ? उन्होंने ड्यूटी में कार्यरत सत्यब्रत का नाम भी एफ.आई.आर, में घसीट लिया था, क्योंकि वह यहाँ भी रिश्वत देने में पीछे रह गया था ।

 

       जिस कर्मचारी ने ऐसा अपराध किया, उसने रिश्वत देकर कानून को खरीद लिया । उसे अग्रिम जमानत मिल गई । मगर तमाम सबूत और सच्चाई प्रस्तुत करने के बावजूद, न्यायाधीश ने उसके वकील की दलील को ठुकरा दिया और उसकी अग्रिम जमानत नामंजूर कर दी ।

 

       सिविल कोर्ट से हाई कोर्ट । अब हाई कोर्ट से वह कहाँ जाए, न्याय मांगने ? सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने का रास्ता तो उसे मालूम था, लेकिन अब इतने पैसे नहीं रह गए थे कि वह सुप्रीम कोर्ट तक अपनी परियाद लेकर जाता ।

 

       नियमित जमानत पाने के लिए उसने आत्म समर्पण करना ही उचित समझा । उसने कोई गुनाह नहीं किया । पर क्यों और कब तक अंधे कानून से भागता फिरे ? कहीं तो पकड़ में आ ही जाएगा वह ।

आज उसे एक ही बात का बार-बार अफसोस लग रहा था । जब कानून को खरीदने की औकात, नहीं थी उसके पास, तो क्यों हाईकोर्ट तक पहुँचने में इतना पैसा गंवाया उसने ? जेल जाने से बचने के लिए न ? अब तो जेल जाना ही पड़ रहा है आदर्श के पुजारी को ! हताश एवं निराश होकर उसने अपना मूंडन करा लिया । सत्यव्रत के सिर का मूंडन देख. उसके मित्र माधव ने दुःख भरे लहजे में पूछा -

 

       सत्यव्रत, तुमने मूंडन करा लिया सब कुछ कुशल तो है ?”

नहीं यार ।

क्या हुआ ? रिश्तेदारी में कोई मर गया है क्या ?

            अपने चेहरे पर दुःख प्रकट करते हुए निराशा भरे स्वर में सत्यव्रत ने कहा-

हाँ न्याय मर गया है ।

 

 

दृष्टि

       रसाले हमारे पैसों पर ऐश करते हैं । मांस को सूंघ रहे कुत्तों की तरह, प्लेटफार्म पर रूपये-पैसे को सूंघते फिरते हैं । पाँच, दस रूपये तक भी नहीं छोड़ते ।......

 

       माफ करना यार ! तुम्हारे पिताजी मुझसे ऐसे लड़के का ही पता पूछ रहे थे, जो रेल विभाग में टी0सी0 हो या टी0टी0ई0 की नौकरी कर रहा हो ।.....

 

       मैने तुम्हारे पिताजी को साफ-साफ कह सुनाया था कि-रेल का टी.सी. हो टी.टी. ई., उनका दिल बहुत कठोर होता है । गरीबों को भी नहीं छोड़ता । मुर्दे तक की जेब से भी रूपये पैसे निकाल लेने में नहीं चूकता।....

मेरी बात को सुनकर उन्होंने क्या कहा, मालूम है ?”

झेंपते हुए जिनेष ने कहा- क्या कहा था मेरे पिताजी ने ?’

 

       “उन्होंने कहा कि ऐसे लड़के ही घर-परिवार को धन-दौलत से भर देते हैं। अपने बाल-बच्चों, पत्नी की अच्छी देखभाल करते हैं । उनका रहन-सहन, पढ़ाई-लिखाई ऊँचे क्वालिटी की होती है । एक बैंक क्लर्क तो मेरी नजर में है, जिसे चार लाख रूपये दहेज में देने की बात कर आया हूँ ।.... मगर यदि कोई टी. सी. या टी.टी.ई. की नौकरी करने वाला होनहार लड़का मिल जाए, तो उसके लिए मैं सात-आठ लाख रूपये तक दहेज में देने को तैयार हूँ । जरा अपने विभाग में ऐसे कुंआरे लड़के का पता बतलाना । किस्मत वालों को ऐसा दामाद नसीब होता है।...

 

 

लकीरें


अशोक मनवानी

       अश्विनी को अपने प्रिय गुरु का इंतजार था । उसे चित्रकला में प्रवीण बनाने वाले वाकणकर जी कई वर्ष बाद उसके शहर आ रहे थे । वो भी चित्रकला कार्यशाला में मार्गदर्शक बनकर । अश्विनी अपनी बेटी पृथ्वी को इस कार्यशाला में भेजना चाहता था । वह खुद बचपन से कागज़ों पर आड़ी लकीरें खींचते हुए आज एक अच्छा चित्रकार बन गया था ।

 

       वो दिन भी आ गया, जब गुरुजी सुबह की फ्लाइट से पहुँच रहे थे । एरोड्रम जाने की तैयारी चल रही थी कि अश्विनी पत्नी की चीख सुनकर किचिन की ओर दौड़ा । वहाँ मानसी फिसलकर गिर चुकी थी और घुटना पकड़े रो रही थी । अश्विनी ने तुरत-फुरत कार की पिछली सीट पर पत्नी को लिटाया और अस्पताल की राह पकड़ी । एक-दो नहीं चार-चार जगहों से फ्रेक्चर के कारण मानसी तड़प रही थी और अश्विनी के चेहरे पर थीं चिंता की लकींरे ।

 

       चित्रकला की लकींरे अब उसकी कल्पना में भी न थी ।

 

 

 

 

लघुकथा

धर्म रहित विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान रहित धर्म अंधा है - आइन्स्टाइन

आपकी प्रतिक्रिया   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com