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पैरोडी
हास्य-व्यंग्य
घपले-घोटाले
जी भर घपले घोटाले कर
मौक़ा न गवाँ इनकार न कर
जब तक इल्ज़ाम न साबित हो
काहे का भय काहे का डर
जी भर घपले घोटाने कर
यह देश है गूँगे वहरों का
सहमें और बेबस चेहरों का
सहना तो इनकी आदत है
मस्ती से किये जा फ़िक्र न कर
जी भर घपले घोटाने कर
हर बात यहाँ बेमानी है
अब किसकी आँख में पानी है
सबकी फ़ितरनत मनमानी है
चुपचाप किये जा ज़िक्र न कर
जी भर घपले घोटाले कर
आधार गीत-दिल जलता है तो जलने दे (मुकेश)

साज़िश
साज़िश में जमके...
चले रात भर दौर अनेकों, व्हिस्की और रम के
शांति कपोत का तन-मन घायल, साये में बम के
साज़िस में जमके.....
झूठी आशा और दिलासा
खग ही जाने खग की भाष
वोट लिये खिसके
साज़िस में जमके.....
दिन में गांधी जी के चेले
रात में मुर्गा-दारू पेले
पैजनियाँ छमके
साज़िस में जमके.....
कैसे जन्मे पूत कसाई,
सिसक रही है भारत माई
नित आँसू छलके
साज़िस में जमके.....
आधार गीत-ज्योति कलश छलके (लता)

तुम तो कर लो इकट्ठा रक़म
हार का न करो कोई ग़म साथियो
तुम तो कर लो इकट्ठा रक़म
साथियो
दौर जब तक चले कोई फुरसत न लो
घर में, जितनी बने लक्ष्मी दाब लो
वक़्त होता है मेहमान, कुछ देर का
उसके जाने से पहले, उसे नाप लो
फिर करो बैठ कर ऐश तुम साथियो
तुम तो कर लो इकट्ठा रक़म साथियो
हींग भी न लगे न लगे फ़िटकरी
हो मगर जिंदगी में, मज़ा ही मज़ा
ये सियासत भी क्या चीज़ है दोस्तो
ख़ूब डालो डकैती न होगी सज़ा
उल्टे सब लोग, चूमें क़दम साथियो
तुम तो कर लो इकट्ठा रक़म साथियो
सूट और टाई में दाग़ लगते नहीं
व्यर्थ इनपे ना पैसा बहाया करो
सर पे टोपी धरो खादी पहना करो
नाम गाँधी का ले ले के घपला करो
फिर मिलेगा न दूजा जनम साथियो
तुम तो कर लो इकट्ठा रक़म साथियो
आधार
गीत-कर चले हम फिदा
जानो-तन साथियो

कुर्सी के ऊपर-नीचे
कुर्सी के ऊपर क्या है, कुर्सी के नीचे क्या है
कुर्सी के ऊपर पैठे, अफ़सर-नेता-व्यापारी
कुर्सी के नीचे दबकर, पिसती जनता बेचारी
ये कुर्सी जड़ है सब फसाद की
कुर्सी के ऊपर....
कर्सी के बाँयें हत्था, कर्सी के दाँये हत्था
कुर्सी के सभी दिवाने, चाहे नत्था या फत्ता
कुर्सी के आगे जोड़ें, सब जन आकर के मत्था
कुर्सी करवाती आयी, आपस में गुत्थम-गुत्था
ये कुर्सी नहीं किसी के बाप की
कुर्सी के ऊपर वाली, दुनिया है न्यारी न्यारी
दिन से भी ज़्यादा होती, इसकी रातें उजियारी
सजते हैं यहाँ अँधेरे, सजती कालाबाज़ारी
इसके चप्पे चप्पे पर, रिश्वतख़ोरी-मक्कारी
कुर्सी से करें कमाई पाप की
कुर्सी के नीचे वाली, दुनिया है बड़ी सवाली
इनके किस्मत के खाते,
लिक्खा है ख़ाली ख़ाली
दुख के धुएँ से इनकी, दुनिया है काली काली
दिन भर मेहनत करते हैं, पर हिस्से में बदहाली
किसको चिंता इनके संताप की
कुर्सी की छवि को तोड़ें, ऊपर–नीचे
को जोड़े
नफ़रत के विष की गाँठें, आओ मिलजुल कर फोड़ें
सबको लड़वाने वाली, कुर्सी के कान मरोड़ें
कुर्सी की सारी ताक़त, जनता के हित में मोड़ें
कुर्सी बन जाए शै मिलाप की
आधार गीत-चोली के पीछे
क्या है, चोली के नीचे क्या है

काले मेघा
काले मेघा काले मेघा पानी तो बरसा
व्यर्थ न कर गर्जन, बिजली चमका के मत तरसा
बिन पानी क्या फसलें होंगी, क्या मुनिया का गौना
तैरी बौछारों से ही फसलें उगलेंगी सोना
कि सोना बरसा जा
कि रिम-झिम करता जा .....
देख जहा फसलों के चेहरे कैसे पड़ गये पीले
थक गये तक तक राह तेरी गोरी के नैन रसीले
उढ़ा चुनरिया धानी, धरती का कर दे सिंगार
प्यास बुझे प्यासी धरती की गूँजे राग मल्हार
उमंगें भरता जा
कि रिमझिम करता जा .....
सूखे नाले, सूखी नदियाँ, सूखे ताल-तलैयाँ
आस भरी नज़रों से देखें, तुझे पसारे बहियाँ
पथिक खड़ा पगडंडी पर माँगे दो अँजुरी छैयाँ
अमराई में रंभा रही गर्मी से व्याकुल गैयाँ
कि सब सुख सरसा जा
कि रिमझिम करता जा ....
आधार गीत- उड़ जा काले
कावां तेरे मुख विच खंड पावां

फ़िसक़ापरस्ती
लाशों के उपर जो भी बनेगा
हो चाहे मस्जिद या मंदिर
ना तो रहेगा खुदा इसमें आकर
ना राम ही इसके अंदर
कैसी अक़ीदत है क्या आस्था है
नफ़रत के शोले उगलती
गंगों-जमन के चमन को मिटा देगी
एक दिन ये फ़िरक़ापरस्ती
ऐ मेरे बेटो हिन्दू या मुस्लिम
या सिक्ख हो या ईसाई
हैं सबसे पहले हम हिंदुस्तानी
और हमवतन भाई भाई
जिसने बनाई ये दुनिया सारी
ये चाँद और ये सितारे
वो एक ही है भले चाहे हम तुम
उसे राम उल्लाह पुकारें
मोहब्बत पे बस एक हक़ है हमारा
बाक़ी के हक़ उसके सारे
मोहब्बत नहीं गर तो पत्थर के हैं घर
ये मंदिर मस्जिद ये गुरुद्वारे
इबादत में अब ना कोई हो सियासत
ना आपस में हो अब लड़ाई
हैं सबसे पहले हम हिंदुस्तानी
और हमवतन भाई भाई
आधार गीत-फूलों के रंग से दिल की कलम से
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