एक लड़की और बाकी सब
बाप हाथ पीले करवा
छुट्टी चाहता है ।
माँ बिटिया के नखरों का पिटारा
आसमान पर रखती है ।
वेटी के अरमानों पर
चाँद, सितारे और बादल के टुकड़े
झालर लगाते हैं ।
पुरों में उसके गुलाबी बदन की महक
धूल बन उड़ जाती है ।
चंदन-सा रंग गाँव-सिवानों पर
लिप जाता है ।
कहारों के काँधे चढ़ा सेठ आता है ।
बेटी के आसमान पर टँगे नखरे
माँ एक-एक कर दिखाती है ।
हताश पुरुष हार कर फिरता है
तब चण्डी का मुखोश पहने,
उस कुरूप लालसा को डरा कर
भगा देती है ।
फिर आता है एक लठैत –
झूठी अकड़ और मर्दानगी का रौब
उसके ठेंगे को टुकड़ा नहीं डालती वह
!

चक्करदार पगडंडी से बँधी औरत की नियति
ज़माने की शरम को
रात भर के लिए उतार कर
मांस के लोथड़ों पर
युद्धरत पलटनियों को ललचाती हुई
लड़कती को फुसलाती है ।
सपनों के इन्द्रधनुष तोड़ कर
बाँस की कमचियों की तरह ।
फेंक देती है वह ।
माँ-बाप बहुत ज्यादा झुक चुके हैं
–
विवश,
उनकी यौवन-गंधों को सूँघते पुरुष
हाथी घोड़ा बैल और गधा
बनने को विवश
सब की विवशता पर सवार
सपनों की हवा पर तैरती
उन सब पर राज करती वह लड़की भी
विवश ।
(‘उत्सवप्रिया’
से)
अनिल कुमार

सब का अपना आकाश
शरद का यह नीला आकाश
हुआ सब का अपना आकाश
ढ़ली दुपहर, हो गया अनूप
धूप का सोने का सा रूप
पेड़ की डालों पर कुछ देर
हवा करती है दोल विलास
भरी है पारिजात की डाल
नई कलियों से मालामाल
कर रही बेला को संकेत
जगत में जीवन हास हुलास
चोंच से चोंच ग्रीव से ग्रीव
मिला कर, हो कर सुखी अतीव
छोड़कर छाया युगल कपोत
उड़ चले लिये हुए विश्वास
(‘सबका
अपना आकाश’
से)
त्रिलोचन

लिखोगे तो बच जाओगे
मैं कुछ भी नहीं
लिखना कहना चाहता था
तब भी लिखता कहता रहा
अपनी विफलता के संबंध में
कोई संशय तब भी
तब भी लिखता रहा

अपनी विवशता
अपना समय, अपनी दुनिया को
इस तरह जानता
स्वीकार करता
लिखता रहा
यह आशा अजीब है
कि लिखोगे तो
मरने से बच जाओगे
(‘वे
सोये तो नहीं होगें’
से )
नंद चतुर्वेदी

ये तस्वीरें
जिनने तस्वीरें खींचीं
घायल हुए
तस्वीरों में देखो कैसे मुस्करा रहे हैं प्रमुदित
कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं
भरोसा करना मुश्किल है इन तस्वीरों पर
द्रौपदी के चीर-हरण की तस्वीर
फिर भी बरदाश्त कर सका था मैं
क्योंकि दूसरी दिशा से लगातार बरस रही थी हया
पर ये तस्वीरें
सब कुछ ही तो नंगा हो रहा है इनमें
छिपाओ इस बहशीपन को
बच्चों और गर्भवती स्त्रियों की नज़रों से
रोको इनका निर्यात
ढक दो इन तस्वीरों को बची खुची हया से ।
(‘यह
ऐसा समय है’
से )
चन्द्रकांत देवताले

सलाह
शेर ने सलाह दी
खरगोश ने
शेर हिरन को खा गया
भेडियों को भगा दिया
खा गया नील गाय को

शेर को सलाह दी खरगोश ने
वह हाथी को मार आया
सुनसान हो गया सारा जंगल
कुछ नहीं बचा खाने को
भाँय-भाँय कर रहा था
शेर के पेट का कुआँ
उसने पुकारा खरगोश को
वह अपने सदाबहार बिल से
बाहर आया
शेर उसे चट कर गया ।
(‘लोगबाग’
से )
इब्बार रब्बी

बहुत कुछ बीच-बाज़ार
कुछ पेड़ हैं वहाँ कि इतने कम
एक कुत्ता है कोठी में भागता-भौंकता
बकरियाँ व्यस्त हैं इतनी कि मुश्किल से
ढूँढ पातीं घास के हरे तिनके कि उगे कहीं-कहीं
सड़क जो पेड़ों के पीछे बिछी उस पर
कारों के दौड़ने के दृश्य ख़ूब
और एक साइकिलवाला है चेन उतारने-चढ़ाने में मशगूल
इधर कमरे में जो बैठा हूँ देखता
निचाट अकेलेपन की स्थिर हवा का शिकार
पुरानी पड़ चुकी ट्यूबलाइट से रोशनी इतनी कम
कि उदास होने के अहसास में डूबी चीजें
कहीं कोई हड़बडी नहीं कि बदलती है सदी
एक मेरी अनुपस्थिति की हाज़िरी के बग़ैर
बाज़ार में बढ़ती ललक है हस्बमामूल
दुकानों का उजाला चौंधता बंद आँखों में इस हद
कि बची-ख़ुची रेजगारी उछलती हाथों से
रोकता मैं कि आख़िरी दिन है तिस पर
देखता कि लुट रहा है बहुत कुछ बीच-बाज़ार
(‘मगर
एक आवाज़’
से)
लीलाधर मंडलोई

उसकी आवाज़ की परछाई
जितने दिन वह नहीं था
वह उसे देखती रही
वह था उसके वाक्य का विराम
उसकी देहरी का सन्नाटा
पत्तियों से लौटती रोशनी
और समय का लंबा अंतराल ।
और जब वह आया
उसका चेहरा छुपा था
किसी और की आवाज़ से
दौड़ रहे थे उसके शब्द
उसके ऊपर छीलते, बटोरते

कुछ रहने नहीं देते ,
कुछ ले नहीं पाते
कुछ लौटाना नहीं जानते
उसकी देह की जगह
उसके शब्द लेटे रहते ।
बोर रहा था वह अपने आप से
या अपने बनाए किसी विचार से
जो आकार उसने देखा वह नहीं थी,
उसकी आवाज़ की परछाई थी
अपनी ही कतरन की ढेर को वह
उसके शब्दों से चुग रही थी ।
ठहरी थी वह
उसके लौटने की जगह
एक बार फिर
उसे देखने के लिए
(‘आँखों
में उलझी धूप’
से )
अमिता शर्मा

भारत
भारत –
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं
इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में हैं
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उसेक पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं
और वह भीख लगने पर
अपने अंग भी चबा सकते हैं
उनके लिए जिंदगी एक परंपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति
जब भी कोई समूचे भारत की
‘राष्ट्रीय
एकता’
की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है –
उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ
उसे बताऊँ
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं
वरन खेतों में दायर हैं
जहाँ अन्न उगता है
जहाँ सेंध लगती है......
(‘बीच
का रास्ता नहीं होता’
से )
पाश

दोस्त
हर साल की तरह
इस बार भी आया दोस्त
लेकिन नहीं लगाये
आत्मा तक को खिलखिला देनेवाले घूंसे
नहीं लगाया अट्टाहास
नहीं सुनाई कविता
न
घूरकर देखा
रम के पैग के छोटे-बड़े हो जाने पर
बल्कि धीरे-धीरे दिखाते रहा
तकलीफ़ों के कोलतार में झुलस गए पैरों के तलुवे
विस्फोटक पदार्थ सा छाती पर बैठा
जवान बहनों की शादी का बोझ

यह वह समय था,
सामने थी हाल ही में आई मेरी नई किताब
और गनगना रहा था कमरा पूरा
पिछवाडे लगे कनेर के फूलों की खुशबू से
लेकिन नहीं दिखाई उसने
किसी में भी रुचि
बताते रहा
पैतृक मकान हड़प लेने की चाचा की करतूतें
ठीक होली के दिन
एक सांड के उन्मत हो जाने के किस्से
और अंत में एक लंबी साँस ले सो गया
इस बार दोस्त कब आया, कब गया
पता ही नहीं चला
(‘कहाँ
होगी हमारी जगह’
से)
मोहन कुमार डहेरिया
