संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

कथोपकथन

शर्मण्य देश नाम होना चाहिए जर्मनी का - डॉ. महेशचन्द्र शर्मा

हिन्दी कविताओं का कोश क्यों नहीं बनाया जा सकता? - ललित कुमार

 
 

शर्मण्य देश नाम होना चाहिए जर्मनी का

सृजनगाथा

 

      भारतीय संस्कृति और साहित्य के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान् आचार्य डॉ. महेशचन्द्र शर्मा ने हमारे प्रतिनिधि से साहित्य, समाज धर्म तथा संस्कृति और विशेष रूप से बाहर इन तत्वों के प्रति विदेशियों के दृष्टिकोण पर विस्तृत वार्तालाप किया । डॉ. शर्मा संस्कृत, हिन्दी, भाषा-विज्ञान आदि अनेक विषयों के उच्च अध्ययन व अध्यापन करने के साथ बौद्ध काव्य पर डॉक्ट्रेट प्राप्त करने के उपरान्त धर्म और राजनीति जैसे ज्वलंत विषय पर डी. लिट् हेतु कार्य कर रहे हैं । युवा साहित्य प्राध्यापक तथा समीक्षक आचार्य श्री शर्मा अभी तक बांग्लादेश, सिंगापोर, ऑस्ट्रेलिया, ग्रेटब्रिटेन, इटली, जर्मनी, फ्रांस तथा बेलज़ीयम आदि अनेक देशों का सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक भ्रमण कर चुके हैं। भारत शासन के मानव संसाधन विकास मन्त्रालय तथा अनेक विदेशी संस्थाओं ने उनके विदेश प्रवास आदि कार्यक्रमों की व्यवस्था की है। यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उन्होने मेलबोर्न (आस्ट्रेलिया) में विश्व के 360 विश्व संस्कृत विद्वानों के समक्ष न केवल पूर्णतःअंग्रजी वातावरण में संस्कृतभाषा में अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया अपितु सस्वर वैदिक शान्ति पाठ करके पूर्णतः अंगरेज़ी वातावरण में संस्कृत भाषा में अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया अपितु सस्वर वैदिक शान्ति पाठ करके विशेष ख्याति पाप्त की,  विश्वस्तर पर अपनी छाप भी छोड़ दी है ।

 

जर्मनी में राम नवमी-

        अंगरेज़ों और अंगरेज़ी की राजधानी लन्दन में विश्व जगन्नाथ संस्कृति संगोष्ठी के दौरान भी उन्होने हिन्दी भाषा में अपना शोध व्याख्यान प्रस्तुत  कर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रभाषा को सम्मानित करने का सफल प्रयास किया । इंग्लैण्ड के हिन्दी प्रेमियों के अतिरिक्त भारते वापसी के पश्चात् छत्तीसगढ़ की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति दुर्ग आदि अनेक संस्थाओं ने डॉ. शर्मा का आत्मीय अभिन्दन किया । बैंग्लोर में सम्पन्न दशम विश्व संस्कृत सम्मेलन के सत्र की अध्यक्षता करने वाले सबसे युवा विद्वान् सत्राध्यक्ष का कीर्तिमान् भी बना चुके हैं। उन्होंने घर्मशास्त्र सत्र की अध्क्षता की थी । इटली के शहर ट्यूरिन में विश्व संस्कृत सम्मेलन के दौरान कालिदास साहित्य में पर्यावरण विषय पर अत्यन्त लोकप्रिय शोध व्याख्यान दिया। इसी प्रसंग में शेक्सपियर के ग्रन्थ मर्चेन्ट ऑव् बोनिस के केन्द्रबिन्दु रहे समुद्र में बसे बेनिस महानगर का भी प्रवास किया । जर्मनी के शहर ड्यूजलड्रॉफ में वहाँ की संस्था मानव भारती के अध्यक्ष श्री सतीश कुमार जी लुगानी की मेजबानी में रामनवमी पर रामकथा पर हिन्दी में ही प्रवचन दिया । और इसी क्रम में वेदों के व्याख्याता श्री ममैक्समूलर के देश जर्मनी के प्रमुख शिक्षा केन्द्र बॉन शहर के बॉन विश्वविद्यालय के संस्कृत- हिन्दी विभाग के प्रो.डॉ. हेल्मुट हायमर तथा प्रो. डॉ.टी आर.चोपड़ा से भेट थी और मुख्य बाणिज्यिक नगर फ्रैंकफर्ट का दौरा किया तथा प्रवासी भारतीयों के एक स्नेहिल कार्यक्रम में हिस्सा लिया ।

 

मानस प्रेमी दादा बुल्के हिन्दी-

       संस्कृत के युवा विद्वान् व साहित्यकार डॉ. शर्मा बेलजीयम की राजधानी ब्रूसेल्स का भ्रमण करना भी इसलिये नहीं भूल सके क्योंकि यह दादा कामिल बुल्के का शहर है। दादा श्री कामिल बुल्के जो कि फादर कामिल बुल्के कहलबाना पसन्द नहीं करते थे, गोस्वामी तुलसीदास तथा हिन्दी साहित्य के जगत् प्रसिद्ध भक्त के रूप में जाने जाते हैं । इसके पश्चात् विश्व इतिहास तथा कला-शिल्पों की यूरोपीय राजधानी पेरिस का भ्रमण  और प्रवास न करते तो शायद आचार्य श्री शर्मा की यह यात्रा अपूर्ण ही रहती । एक अन्य अन्तरंग कारण असंख्य भारतीय मित्रों के अतिरिक्त पेरिस में संस्कृत के बिजिटिंग प्रोफेसर डॉ. ओम प्रकाश जी पाण्डेय तथा भारत और महाभारत प्रेमी (डॉ. शर्मा के) बौद्ध मित्र साँन सरीन आदि की प्रतीक्षा भी था। सो वहाँ भी भारतीय पृष्ठभूमि की मित्र मण्डली के सानिध्य, वहाँ की सांस्कृतिक झाँकि व इतिहास की वर्तमान मनोरम छवि का उन्होंने अवलोकन किया ।

 

कारी कामरि पै चढ़े न ढूजो रंग-

       इतना व्यापक विदेश प्रवास भी संस्कृत हिन्दी के इस अनन्य भक्त युवा प्रध्यापक के स्वदेशी भाव को पश्चिमी जगत् से प्रभावित नहीं करवाया । हाँ उन्होंने सर्वत्र भारतीयता के दर्शन किये । मनु के वाक्य को मैथिलीशरण जी की उस कविता के रूप में साकार किया कि - पूरी दुनिया ने ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता-संस्कृति और उच्चतम आध्यात्मिक सोच हमीं से सीखा है।

 

मेलबोर्न में वेद पाठ-

       ऑस्ट्रेलिया में उनके संस्कृत भाषण तथा वैदिक शान्तिपाठ पर पश्चिमी जगत् की क्या प्रतिक्रिया रही? हम प्रश्न के उत्तर में डॉ. शर्मा ने बताया कि वहीं के निवासी तथा यूरोप और अमेरिका से उस अवसर पर वहॉ आये सैकड़ों प्रतिनिधियों के मुख से सहसा निकलते हुये शब्द थे - मैलोडिस ग्लोरियस !! नाइस!!! (अर्थात् मधुर, पवित्र औऱ बहुत श्रेष्ठ ) । वेक कहते हैं कि कुमारी मार्गरेट और लॉ-ट्रॉव विश्वविद्यालय मेलबोर्न के धर्मशास्त्र विभागाध्यक्ष एवं विश्व सम्मेलन के आयोजक महासचिव प्रो.डॉ. ग्रेक बेली के साथ अनेक पश्चिमी मित्रों मित्रों न भी उनकी मुक्तकंठ से सराहना की । दक्षिण अफ्रीकावासी, बिहार मूल के भारतीय डॉ. बी. राम बिलास, बनारस मूल मूल के मेलबोर्न वासी पं. रमाशंकर मित्र आदि अनेक मित्र उनसे अभिभूत थे । वे अपने घर ले जाने का आग्रह भी करते थे। श्री रमाशंकर मिक्ष जी डॉ. शर्मा को अपना अतिथि बनाने तथा आतिथ्य के दौरान अपनी पुत्री कु. अणु को भी भारतीय संस्कृति की मुख्य बातें उनसे सीखने तथा ऐसा ही और मार्गदर्शन उनसे दिलाने में सफल हो सके । उनके परिवार के आग्रह पर उनके साथ बिताये कुछ दिन आचार्य शर्मा आज तक नही भुला पाते । वहाँ भारतीयों के एक मुख्य मिलन स्थल श्री राधाकृष्ण मन्दिर तथा हिन्दी साहित्य समिति आदि कुछ जगह जाने का अवसर भी वे न चूके । कुछ भारतीय परिवारों के पुत्र जन्मोत्सव के सामूहिक कार्यक्रम में भी वे अनेक भारतीय भाई बहनों से मिलने के पश्चात् उनके सांस्कृतिक अन्तर्द्वन्द्व का अनुभव भी बड़ी शिद्धत के साथ ही करते हैं । वे बताते हैं कि पैसा कमाने की चाह उन्हें विदेश खींच तो लायी पर उनके बच्चे भारतीय संस्कृति से कटते जा रहे हैं । देश की याद उनको हमेशा सालती रहती है। उल्लेखनीय घटना सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर में वे बताते हैं-ऑस्ट्रेलिया रेडियो की अधिकारी सुश्री ज़ेनीफ़र तथा श्रीमती जया शर्मा द्वारा हिन्दी में उनका साक्षात्कार लेना तथा उसी दिन उसका प्रसारण । सप्ताह में एक दिन वहाँ के रेडियो पर आधा घण्टे का एक कार्यक्रम भारतीय हस्तियों  के लिये निर्धारित रहता है, जो उन दिनों वहाँ प्रवास पर रहती हैं। वे डिप्लोमेट्स, क्रिकेटर्स, फिल्मस्टार्स या साहित्य के कोई नामी ग्रामी व्यक्ति हो सकते हैं । डॉ. शर्मा का रहना है कि उनका रोमांचित होना स्वाभाविक ही था।

 

हिन्दी और तुलसी, ऑस्ट्रेलिया और इंगलैण्ड

       संस्कृत-हिन्दी और भारतीयता को लेकर वे खूब अच्छे से उत्तर देते रहे। प्रसारण सुनने के पश्चात उनके देशी-विदेशी मित्रों ने सम्मेलन स्थल पर खूब बधाईयाँ दी । इंगलैण्ड प्रवास सम्बन्धी ऐसे ही अनेक प्रश्नों के उत्तर में वे बताते हैं कि उनके पूर्व परिचित डॉ. डॉमनिक यूजुक के सेण्ट्रल लन्दन स्थित उनके ऑफिस तथा निवास पर आकर वे प्रसन्न थे। मध्याह्न भोज पर अपने आप ही डॉ. शर्मा के स्वभाव तथा रुचि, ख्याल रखकर उनके लिये शुद्ध शाकाहारी व्यजंनों की खास व्यवस्ता की गयी थी। यह ज्ञातव्य है कि प्रो. डॉमनिक प्रो. शर्मा के ही समान बौद्ध दर्शन के ज्ञाता तथा शोधकर्ता हैं भारतीय साहित्य, संगीत, विशेषतः आयुर्वेद तथा दर्शन पर दर्ज़नो पुस्तकों के वे लेखक हैं तथा संस्कृत-कम्प्यूटर के विशेषज्ञ हैं । वहाँ (लन्दन) के विधेवेत्ता मथा भगवान् जगन्ना के अनन्त भक्त श्री डेरिक मूर ने डॉ. शर्मा का (और हिन्दी काभी) बालबाँका न कर सके । लन्दन में हिन्दी भाषण देने के इस प्रसंग को सुनाते हुये आज भी वे बहुत भावुक हो जाते हैं । विजयादशमी(दशहरा) उन्होने अनेक अमेरिकी, केनिया, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलियाई ट्रिनीटॉट टोबेको आदि देशों के मित्रों के साथ लन्दन के स्वामी प्रणवानन्द आश्रम स्वामी निर्लितानन्द जी के साथ बिताने के दुर्लभ तथा अविस्मरणीय क्षणों का अनुभव किया है।

 

लन्नद में पवन पुत्र-

       आचार्य शर्मा अपने साथ कुछ छोटे किन्तु सुन्दर हनुमान चालीसा व सुन्दरकाण्ड भी ले गये थे। जो वहॉ मित्रों में बॉटे । एक किशोरी ने, जब उसे वह पुस्कत नहीं दी गयी,  तो ऐसा सवाल दागा कि सुख मिश्रित आश्चर्य का अनुभव हुआ । उसने पूछा कि मुझे क्यों नहीं दी हनुमान् जी वाली किताब ? सब को तो देना उतना ज़रूरी भी नहीं था। मुझे तो सबसे पहले देना था। पूछने पर बाहर बसी उस भारतीय किशोरी ने स्वाभिमानी अधिकार के साथ गर्व से उत्तर दिया क्योंकि मेरा नाम अंजनादेवी है। अंजना को नहीं दोगे अंजनापुत्र (हनुमान) की कितीब ?बहुत भावुक क्षण थे, ये क्षण । पुस्तक तो सुपात्र को दी ही गयी । किन्तु घटना अविस्मरणीय है। आचार्य शर्मा  प्रतिप्रश्न करतें इस प्रतिनिधि से कि क्या भारत से सात समुद्र पार बैठी हुई इस लड़की के समाज भारत माता की साक्षात् गोद में बैठे हुये युवक-युवतियाँ भारतीय संस्कृति भारतीय संस्कृति के इतने करीब हैं ? भारतीय विद्याभवन लन्दन तथा स्वामी नारायण मंदिर (दोनों इंगलैण्ड) में बिताये क्षण भी अद्भुत और यादगार हैं।

 

ऑक्सफोर्द्व में देवनागरी का झण्डा-

       एकादशी का दिन और स्वामी अक्षरबिहारी का साथ उस  पर भी मन्दिर में प्रसादी के रुप में किया गया फलाहार- अलौकिक अनुभव है । सम्भवतः भारत से बाहर बना विश्व का श्रेष्ठ हिन्दू मन्दिर । लन्दन के मेट्रो ट्रेन के स्टेशन नीस्डन से श्वेत संगमरमरी गुम्बदों के ऊपर फहराते गगनचुम्बी भगवे ध्वज हमें वहाँ के लिये मानो आमन्त्रित कर रहे थे । तो हम रुक कैसे सकते थे ? पहुँचे तो आनन्द ही आनन्द । नहीं लग रहा था कि हम बाहर से आये हैं । मन्दिर वास्तु, भव्यमूर्तियाँ, पण्डित, पुजारियों तथा व्यवस्थापकों से भेंट, वहाँ के इतिहास की आस्थापूर्ण जानकारी, सब अद्भुत अलौकिक । वहाँ हिन्दी, संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों के रुझान के विषय में ढेरों संस्मरण प्रो. शर्मा के दिलोदिमाग में हैं। कुछ विशेष बातों के बारे में बताते हुये उन्होंने कहा कि ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज पश्चिमी जगत् के नालन्दा और तक्षशिला हैं । इन्हें हम यूरोपीय संस्कृति और शिक्षा के वाराणसी ओर प्रयाग भी कह सकते हैं। ये उपमा इसलिये भी क्योंकि भारतीय संस्कृति कार्यालय (इण्डियन कल्चरल हाउस) की ऑक्सफोर्ड (विश्वविद्यालय) नगर स्थित इमारत में हमने पीतल की एक बड़ी प्लेट पर (शिला लेख में ) देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण चार श्लोकों को अपने कैमरे में कैद किया । इनमें उस भवन के भूमि पूजन तथा शिलान्यास आदि की तिथि के साथ इंग्लैण्ड की महारानी, महाराजकुमार तथा भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति आदि के नाम खुदे हुए हैं । हालांकि यह अस्तित्व में आ चुका है। तत्कालीन भारत सरकार की उदासीनता के चलते विश्व के अनेक भारतीय संस्कृति केन्द्र विलुप्त हो चुके है, या बन्द होने के कगार पर हैं ।

 

संस्कृत ऑन फोन-

       डॉ. शर्मा बताते हैं कि जब-हम गये लन्दन स्थित भारतीय विद्याभवन,( मुम्बई मुख्यालय की शाखा ) गये तब उस का, रजत जयन्ती वर्ष का आयोजन हो रहा था। कार्यकारी संचालक डॉ. एम.एस. नन्द कुमार तथा श्री रामकृष्ण जी आदि से भेंट स्मरणीय रही । सुखद रही। वहाँ शास्त्रीय नृत्य,संगीत के साथ-साथ संस्कृत में वार्तालाप का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। डॉ. नन्दकुमार ने लन्दन में ही भगवान् श्री कृष्ण पर डॉक्ट्रेट की है। वे हमारे प्रवास से अभिभूत थे। बात-चीत के बाढ़ जो बिदाई सम्मान व राशि उन्होने दी और जिस रुप में दी, उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता । उल्लेख योग्य बात ये है कि मेरे मेज़बान तथा हॉटल किंग्स के मालिक श्री लक्खू भाई पारीख इस बात को लेकर आश्चर्यजनक रुप से प्रसन्न थे कि मेरे साथ डॉ.कुमार फोन पर हमेशा ही संस्कृत में बात करते थे। टेलीफोन पर अंगरेज़ी जमीन पर संस्कृत वार्तालाप उनके लिये स्वप्नलोक जैसा अनुभव था। वे हमलोगों से अतिशय प्रभावित रहे।

 

यूरोपीय युवा हमारी संस्कृति की ओर

       सभी विदेश यात्राओं में सबसे अच्छी कौन सी रही ? इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य महेश शर्मा अन्तर नहीं कर पाते । वे अलग-अलग कारणों तथा उपलब्धियों की वज़ह से सबको अच्छी ही मानते हैं, किन्तु जर्मनी प्रवास को वे कुछ अधिक महत्व देते प्रतीत होते है। वे बताते हैं कि-वस्तुतःशर्मण्य देश नाम होना चाहिये जर्मनी का । वेदों के अद्भुत व्याख्याकार श्री प्रो. मैक्समूलर यहीं के थे। काव्य तथा नाटकों के एक से-एक समीक्षक भारत भक्त यहाँ पैदा हुए । वे आगे बताते हैं कि इटली की यात्रा तो एक निमित्त था। चूँकि वहाँ अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन था। वहाँ भी कई मायनों में भरतीय संस्कृति का प्रभाव - नम्बरों (गिनती) पर बहुत दिखा। साहित्य व सौन्दर्य बोध भी लगभग हमारे जैसा । किन्तु उसली उद्देश्य मेरी पश्चिमी यूरोप की यात्र का था –“लम्बा जर्मनी प्रवास । ड्यूज़ड्रॉफ, बॉन तथा फ्रैंकफ़र्ट तीन मुख्य नगरों का व्यापक भ्रमण भी किया मैने । अपने वरिष्ठ शुभचिन्तक अग्रज श्री सतीश लुगानी (ज़र्मनीवासी) के सौजन्य को मैं नहीं भुला सकता । राईन नदी के तट पर स्थित बॉन विश्व विद्यालय के इणअडॉलॉज़ी विभाग में डॉ. हेल्मुट हाइमर तथा प्रो. चोपड़ा के साथ जब तुलसी, बिहारी, निराला,दिनकर तथा महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की कृतियों को देखता हूँ तो मैं मुदित और चमत्कृत हो जाता हूँ । विपुल संस्कृत साहित्य का भी इस पुस्तकालय में भण्डार है। यहाँ हिन्दी या संस्कृत विभागों जैसी कोई बात नहीं । ये ओरियण्टल, एशियन या इणडॉलॉजी विभाग के रुप में जाने जाते हैं । उधर पेरिस में फ्रांस की राज्यक्रान्ति की यादें ताजा़ करने के साथ जो फ्रेंच कला वैभव मैने देखा उसने तो प्रभावित किया ही किन्तु सर्वाधिक प्रभावित क्या हिन्दी संस्कृत साहित्य के अध्ययन के माध्यम से भारतीय जीवन पद्धति की ओर मुखातिब यूरोपीय छात्र-छात्राओं और इन विषयों के शिक्षकों ने ।

 

 

कथोपकथन

करुणा वह सुनहरी सूत्र है, जिससे समाज बँधा रहता है - गेटे

आपकी प्रतिक्रिया   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com