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रोज
रात को कहीं दूर से कानों में आती सीटी की आवाजें नींद में खलल
डालने की कामयाब कोशिशें करती थीं । मन तो होता कि बाहर जाकर
सीटr
बजाने वाले को दो चांटे कसकर जड़ दें । पर मजबूरी कि वह हमारी
कालोनr
का चौकीदार था जो ‘जागते
रहो’
की जगह सीटी बजाकर चौकस रहने की ताकीद करता रहा था।
यह चौकीदार रामलाल की रोज की दिनचर्या थी। हमारी कालोनी
में सारे टैक्स पटाने के बावजूद नगर निगम का निगाहें करम नहीं
हुआ था । पानी के लिये सोसायटी के सारे मेम्बर ट्यूबवेल के
जरिये पानी लेते थे । बिजली-बत्ती का इंतजाम भी ऐसे ही था ।
चलने के लिये पगडंडी, सड़क का नामो निशान नहीं, कचरा फेंकने के
लिये पड़ोस का खाली प्लाट । चोरों की नजर से घर को बचाने के
लिये चौकीदार का इंतजाम भी कालोनी वालों ने चंदे से ही किया
था। यही चौकीदार रामलाल दो-ढाई सौ घरों की कालोनी का इकलौता
चहेता था। रात भर सीटी बजाकर चोरों से चौकसी और सुबह 6 बजे से
ट्यूबवेल शुरु करके बारी-बारी कालोनी के घरों में पानी देना ।
कहीं मिनट-दस मिनट की देरी हुई तो कालोनी के खुर्राट
मर्द-महिलाओं की डाँट भी सुनो । महिलाओं का दुलार भी रामलाल को
खूब मिलता था । घर में सब्जी नहीं, रामलाल सेवा के लिये हाजिर।
किसी के घर तीज-त्यौहार हो, रामलाल सबके कामकाज के लिये
हाज़िर, भोजन का न्यौते साथ में । स्कूल रिक्शा नहीं आया तो
बच्चे पहुँचाने की अघोषित जिम्मेदारी रामलाल की । पानी खत्म हो
गया तो चुपके से पाँच रु. लेकर आधे घंटे और नल चलाने का काम भी
। ऐसे चल जाती थी रामलाल की दिनचर्या ।
श्रीमतीजी हर दूसरे चौथे दिन रामलाल को रोककर कहीं से
नई नौकरानी खोज लाने की गुहार करतीं .... भैया चौकीदार नौकरानी
ने बहुत परेशान कर रखा है सिर्फ महीने में पैसे लेने सही दिन
खड़ी हो जाती है। बाकी दिन आप उसके पीछे । छुड़ा भी नहीं सकती,
काम कौन करेगा । अब सात दिन से देखो शकल नहीं दिखी, पूरी
हाड़तोड़ मेहनत मैं कर रही हूँ । भैया, नई नौकरानी कल जरूर
खोजकर ला देना ।
......मुझे बड़ी कोफ्त होती है इन चीजों से । सुबह से
नींद खुली तो यही चाँव-चाँव । अरे भई क्या हुआ फिर वही नौकरानी
पुराण । श्रीमती की डाँट तुरंत, तुम्हें तो हाथ पैर चलाना नहीं
अब रामलाल से न कहूँ तो किससे कहूँ । कम से कम नौकरानी खोजकर
तो लायेगा । अभी काम करने वाली गायत्री को वहीं तो खोजकर लाया
था। इसीलिये तो हप्ते में चार दिन छुट्टी मारती है, मैंने
व्यंग्य से मुँह बिचकाया । तो आप ही जाकर खोज क्यों नहीं लाते,
हप्ते में आठ दिन काम करने वाली नौकरानी। तुरंत थ्रीनाट-थ्री
के अंदाज में श्रीमती जी ने कुढ़कर जवाब दिया । मन ही मन हँसते
हुए मरहम लगाने की कोशिश की, भई हप्ते में सात दिन होते हैं आठ
नहीं । जानती हूँ आठ दिन वाला जुमला तुम्हारे जैसे नवाबी तबियत
के लोगों के लिये है। श्रीमतीजी के जवाब के आगे मैं निरूत्तर ।
अब रामलाल की दस्तक फिर दरवाजे पर । माँ ये कपड़े रखो
धोबी की दुकान बंद थी तो पास के मुहल्ले से इस्तरी करा लाया
हूँ, देरी के लिये माफ करना माई । कोइ बात नहीं भैया, बैठो, एक
कप चाय पी लेना, अभी बनाती हूँ । होली पर बनी कुछ नमकीन और
मिठाई प्लेट में रखकर श्रीमती जी दे दीं । माँ, एक कागज का
दुकड़ा दे दो, लपेटकर ले जाता हूँ, घर में खा लूँगा अभी भूख
नहीं है । रात भर का जागा हूँ, नींद आ रही है। अपने पोपले मुंह
से हँसते हुये रामलाल ने कहा । ठीक है भैया चाय तो पीकर जाओ ।
पत्नी ने रामलाल को चाय दी, अच्छा माई चलता हूँ । ठीक
है भैया, नौकरानी का याद है ना । हाँ मैया
!
नई मिलेगा तो मैं खुद कर दूँगा ठीक, अच्छा मैं चलता हूँ ।
रामलाल के जाने के बाद मैंने श्रीमती जी से पूछा भई चौकीदार को
इतना मुँह लगाना ठीक नहीं । छोड़ा सावधान रहो । वह चार साल से
मोहल्ले में काम कर रहा है बेचारा, किसी को शिकवा
नहीं...शिकायत नहीं जात का हिन्दू है । कभी गाहे-बगाहे लोगों
के घर खाना भी बना लेता है।
तुम्हे कैसे मालूम हिन्दू है
?
तुम्हारे मायके का है जो तुम जात-पांत-बिरादरी सब जानती हो ।
मैंने मुंह बिचकाकर कहा ।
आपको करना तो कुछ है नहीं बातों के लच्छे में आपका
मुकाबला नहीं । जब इतना काम लेते हैं तो जात बिरादरी की
पूछ-परख बिना भला कौन काम लेगा । वर्माजी बेटी की शादी के लिये
अभी देश गये थे तो उनके घर एक माह रखवाली रामलाल ने ही तो की
थी। पूरा घर रामलाल के हवाले कर निश्चिंत गये थे और लौटकर सौ
रू. इनाम भी दिया था । ईमानदारी से घर की रखवाली के लिये ।
उनके घर तो बागवानी भी है। घर में रोज झाड़ू-पोंछा और पेड़
पौधों की साज-सम्हाल, कोई छोटा-मोटा काम नहीं है। वर्माइन बता
रही थी, रामलाल बहुत अच्छा है । पूरे घर को अपने घर जैसा
साफ-सुथरा रखा है।
अब रामलाल की इतनी अच्छी रिपोर्ट सुनकर मेरे मन में भी
उससे काम कराने के लिए इच्छा कुलबुलाने लगी थी ।
एक दिन बुलाया, रामलाल इधर आना । जी बाबू जी .....सायकल
से उतर कर विनम्रभाव से पूछा । जा देख आना नाई की दुकाल खुली
है कि नहीं, कमबख्त फोन भी नहीं रखते नहीं तो नंबर लगा लेते
कटिंग के लिये । ऐसा करना नाई की दुकान बंद हो तो रेजर का एक
पैकेट लेते आना और रामलाल को मैंने दस रूपये थमा दिये.....जी
बाबू जी । पंद्रह मिनट बाद रामलाल हाजिर बाबूजी नाई की दुकान
बंद है, ये ब्लेड लेता आया हूँ । खुलेगी तो बताउँगा क्या
?
अरे नहीं भाई अब तुम जाओ अब थोड़ी देर में खुल भी जाये तो क्या
मेरे आफिस का तो समय हो ही जायेगा । ठीक है बाबू जी मैं चलता
हूँ और कोई सेवा मेरे लायक हो तो भूलियेगा नहीं ।
अरे सुनना.........कुछ झिझकते हुयए मैंने पूछा तुम पास
के बाजार रोज सब्जी ला दोगे क्या?
मेरे सुबह का काफी समय इसी काम में निकल जाता है, यार ।
इत्ती-सी बात, बाबूजी, आप हमें पैसा-झोला दे दो और
टाइम बता दो कब लाना है
?
आप क्यों तकलीफ करोगे,
हम हैं ना ।
मुझे नहीं पता था -
पीछे श्रीमती जी वार्तालाप कान लगाकर सुन रही थी।
नहीं भैया रामलाल सब्जी यही लायेंगे
। अरे इसी बहाने तो थोड़ा बहुत हाथ पैर चला लेते हैं नहीं तो
दिन भर दफ्तर में मौज और घर में नवाबी ।
नहीं माँ बाबूजी को बहुत काम हो जाता है । हम ही ला
देंगे तो कउन खिया जायेंगे । आप निश्चिंत रहिये बाबू जी, हम
हैं ना । यह थी रामलाल की दिनचर्या रोज अगर दिन में सुबह-शाम
रामलाल न दिखे तो दिन अधूरा ।
दो तीन दिनों से रामलाल का आना लगभग बंद सा हो गया था।
अब रामलाल की सीटी भी नियम से सुनाई नहीं देती थी । श्रीमती जी
को एक दिन टोका, भई रामलाल घर आता नहीं तो सीटी भी बजाना भूल
गया क्या ?
मोह्ल्ले की परवाह उसे है या नहीं । चोरी हो गया तो । तुम तो
बड़ी तारीफ करती थीं रामलाल ऐसा-रामलाल वैसा ।
दिन धीरे-धीरे सरकने लगे थे। मन ही मन सोच रहा था पहली
तारीख को तो आयेगा पट्ठा पैसा लेने, तब उसकी निकालूँगा ।
श्रीमती जी समझा रही थीं
–
नहीं, ऐसा कुछ मत बोलना आप किसी को, कुछ भी बोल देते हैं, बाद
में बात मुझे सम्हालनी पड़ती है ।
ठीक है तुम्हारे लाड़ प्यार ने ही नौकरों को बिगाड़ रखा
है। अब तो वो आने की जरूरत भी नहीं समझते और सरकते-सरकते आ गयी
पहली तारीख और रामलाल नहीं आया । एक, दो, तीन, चार, आखिर महीने
की पाँचवी तारीख को रविवार के दिन दरवाजे की घंटी बजी । बीस
पच्चीस साल का नौजवान लड़का हाथ में रजिस्टर लिये खड़ा था।
क्या है ?
मैंने तल्खी से दरवाजा खोलते हुयए पूछा।
बाबू जी कालोनी का नया चौकीदार हूँ, मुझे सैल्यूट करते
उसने जवाब दिया । अरे तुम कबसे आ गये ...पुराना रामलाल कहाँ
गया ?
पुराना जौकीदार तो मर गया बाबूजी आज दसवाँ दिन है।
अरे किसी ने बताया नहीं कहाँ रहता था
?
मुझे अपने आप पर कोफ्त हुई, बताओ चार साल से घर के सदस्य जैसा
था पर उसके ही घर का अता-पता नहीं मालूम ।
पास बस्ती में में रहता था बाबू जी । कुछ दिन से बीमार
था । एक दिन दरवाजा नहीं खुला तो कोई काम के लिये बुलाने आया
तब पता लगा कि वह मर चुका था।
...............
घर मैं कौन-कौन थे
?
कोई नहीं था बाबूजी वह अकेले रहता था, जो कुछ मोहल्ले
वालों से मिल जाता था उसे खाकर गुजारा हो जाता था और रहने के
लिये वह झोपड़ी । आखरी वक्त एक दोने में कुछ नमकीन मिली और
बिस्तर के नीचे दो चार रुपये की चिल्लर ।
फिर क्रियाकर्म का क्या हुआ, मैंने उत्सुकता से पूछा
?
मोहल्ले के लोगों को
नाते रिश्तेदारों का पता तो था नहीं । नाम भर मालूम था रामलाल
का ....घर में लोगों ने चीजें टटोलीं तो पूरा नाम पता एक डायरी
में मिला जिसमें नाम लिखा था रहमत उल्लाखान । उत्तर प्रदेश के
किसी गाँव का पता लिखा था। घर के पते पर तार भेज दिया था अब
रिश्तेदारों के आने तक लाश तो नहीं रोक सकते थे, पर आखरी काम-काज मोहल्ले के लोगों ने चंदा
करके निबटा दिया । अब शायद रिश्तेदार भी आ गये हैं, पर अब क्या
मतलब । एक बात अच्छी हुई बाबूजी .....इसकी तकदीर अच्छी थी।
मैं चौंका.....कैसे
?
आखरी समय डायरी से पता तो लग गया कि वह जात का मुसलमान
था, वरना हिन्दू समझकर लोग लाश न जला देते ।
मैं निरूत्तर श्रीमती जी के चेहरे की प्रतिक्रिया पढ़ने
की कोशिश कर रहा था।

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