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विदेशों में
हिन्दी का बढता प्रभाव |
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राकेश शर्मा निशीथ*
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आज
दुनिया का कौन-सा कोना है,
जहाँ भारतीय न हों । अनिवासी भारतीय सपूर्ण
विश्व में फैले हुए हैं । दुनिया के डेढ सौ
से अधिक देशों में दो करोड़ से अधिक भारतीयों का बोलबाला है।
अधिकांश प्रवासी भारतीय आर्थिक रूप से समृध्द हैं ।
1999 में मशीन ट्रांसलेशन शिखर बैठक में में
टोकियो विश्वद्यालय के प्रो. होजुमि तनाका ने जो भाषाई आंकड़े
प्रस्तुत किए थे, उनके अनुसार विश्व
में चीनी भाषा बोलने वालों का स्थान प्रथम और हिन्दी का
द्वितीय तथा अंग्रेजी का तृतीय है ।
हिन्दी विश्व के सर्वाधिक आबादी वाले
दूसरे देश भारत की प्रमुख भाषा है तथा फारसी लिपि में लिखी
जाने वाली भाषा उर्दू हिन्दी की ही एक अन्य शैली है । लिखने की
बात छोड़ दें तो हिन्दी और उर्दू में कोई विशेष अंतर नहीं रह
जाता सिवाय इसके कि उर्दू में अरबी,
फारसी, तुर्की आदि शब्दों का बहुलता से
इस्तेमाल होता है । एक ही भाषा के दो रूपों को हिन्दी और
उर्दू, अलग-अलग नाम देना अंग्रेजों की
कूटनीति का एक हिस्सा था ।
विदेशों में चालीस से अधिक देशों के
600 से अधिक विश्वविद्यालयों और
स्कूलों में हिन्दी पढार्ऌ जा रही हैं । भारत से बाहर जिन
देशों में हिन्दी का बोलने, लिखने-पढने
तथा अध्ययन और अध्यापक की दृष्टि से प्रयोग होता है,
उन्हें हम इन वर्गों में बांट सकते हैं -
1. जहां भारतीय मूल के लोग अधिक संख्या
में रहते हैं, जैसे - पाकिस्तान,
नेपाल, भूटान,
बंगलादेश, म्यांमार,
श्रीलंका और मालदीव आदि । 2.
भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी
एशियाई देश, जैसे- इंडोनेशिया,
मलेशया, थाईलैंड,
चीन, मंगोलिया,
कोरिया तथा जापान आदि । 3.
जहां हिन्दी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप
में पढाया जाता है अमेरिका,
आस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप क देश।
4. अरब और अन्य इस्लामी देश,
जैसे- संयुक्त अरब अमरीरात (दुबई) अफगानिस्तान,
कतर, मिस्र,
उजबेकिस्तान,
कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि ।
मॉरिशस:
यहां भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या
कुल आबादी की आधे से अधिक है । मॉरिशस की राजभाषा अंग्रेजी है
और फ्रेंच की लोकाप्रेम है । फ्रेंच के बाद हिन्दी ही एक ऐसी
महत्वपूर्ण एवं सशक्त भाषा है जिसमें पत्र-पत्रिकाओं तथा
साहित्य का प्रकाशन होता है । मॉरिशस में भारतीय प्रवासियों का
विधिवत आगमन चीनी उद्योग के बचाव तथा उसके विकास हेतु
1834 में शुरू हुआ था । यूरोप में चीनी की
बढती मांग को ध्यान में रखकर तत्कालीन प्रशासकों ने भारतीयों
को सशर्त यहां लाकर स्थायी रूप से बसने का प्रावधान किया ।
मॉरिशस में भारतीय प्रवासी वर्ष 1834
से बंधुआ मजूदरों के रूप में आने लगे थे । ये लोग अधिकांशत:
भारत के बिहार प्रदेश के छपरा, आरा और
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया,
गोंडा आदि जिलों के थे । भारतीय श्रमिकों ने
विकट परिस्थितियों से गुजरते हुए भी अपनी संस्कृति एवं भाषा का
परित्याग नहीं किया । अपने प्रवासकाल में महात्मा गांधी जब
1901 में मॉरिशस आए तो उन्होंने
भारतीयों को शिक्षा तथा राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय भाग
लेने के लिए प्रेरित किया । हिन्दी प्रचार कार्य में
हिंदुस्तानी पत्र का योगदान महत्वपूर्ण है ।
धार्मिक तथा सामाजिक संस्थाओं के उदय
होने से यहां हिन्दी को व्यापक बल मिला । वर्ष 1935
में भारतीय आगमन शताब्दी समारोह मनाया गया । उस समय यहां से
हिन्दी के कई समाचारपत्र प्रकाशित होते थे,
जिनमें आर्यवीर,
जागृति आदि उल्लेखनीय है । वर्ष 1941
में हिन्दी प्रचारिणी सभा ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा
हिन्दी पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया । 1943
में हिन्दू महायज्ञ का सफल आयोजन किया गया।
1948 में जनता के प्रकाशन के माध्यम से
दर्जनों नवोदित हिन्दी लेखक साहित्य सृजन क्षेत्र में आए ।
वर्ष 1950 में
यहां हिन्दी अध्यापकों का प्रशिक्षण प्रारंभ हुआ और
1954 से भारतीय भाषाओं की विधिवत पढार्ऌ शुरू
हुई। मॉरिशस सरकार ने स्कूलों में छठी कक्षा तक हिन्दी पढाने
की व्यवस्था की । वर्ष 1961 में मॉरिशस
हिन्दी लेखक संघ की स्थापना हुई । यह संघ प्रतिवर्ष साहित्यिक
प्रतियोगिताओं, कवि सम्मेलनों,
साहित्यकारों की जयंतियां आदि का आयोजन करता
है । मॉरिशस में हिन्दी भाषा का स्तर ऊंचा उठाने में हिन्दी
प्रचारिणी सभा का योगदान अतुलनीय है । यह संस्था हिन्दी
साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) की परीक्षाओं का प्रमुख केन्द्र है ।
औपनिवेशिक शोषण और संकट के समय 1914
में हिन्दुस्तानी, 1920 में टाइम्स
और 1924 में मॉरिशस मित्र
दैनिक पत्र थे । आज मॉरिशस में वसंत,
रिमझिम, पंकज,
आक्रोश, इन्द्रधनुष,
जनवाणी एवं
आर्योदय हिन्दी में प्रकाशित होते हैं । वर्ष 2001
में विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना भी मॉरिशस में हो चुकी है
।
फिजी:
फिजी दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित
322 द्वीपों का समूह है । यहा के मूल
निवासी काईबीती है । देश की आबादी लगभग 8
लाख है । इसमें 50 प्रतिशत काईबीती,
44 प्रतिशत भारतीय तथा 6
प्रतिशत अन्य समुदाय के हैं। 5 मई
1871 में प्रथम जहाज लिओनीदास ने
471 भारतीयों को लेकर फिजी में प्रवेश
किया था। गिरमिट प्रथा के अंतर्गत आए प्रवासी भारतीयों ने फिजी
देश को जहां अपना खून-पसीना बहाकर आबाद किया वहीं हिन्दी भाषा
की ज्योति भी प्रज्जवलित की जो आज भी फिजी में अपना प्रकाश
फैला रही है।
फिजी की संस्कृति एक सामासिक संस्कृति
है, जिसमें काईबीती,
भारतीय, आस्ट्रेलिया
तथा न्यूजीलैंड के निवासी है । इनकी भाषा काईबीती (फीजियन)
हिन्दी तथा अंग्रेजी है । फिजी का भारतीय समुदाय हिन्दी में
कहानी, कविताएं लिखता है । हिन्दी
प्रेमी लेखकों ने हिन्दी समिति तथा हिन्दी केन्द्र बनाए हैं जो
वहां के प्रतिष्ठित लेखकों के निर्देशन में गोष्ठियां,
सभा तथा प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं ।
इनमें हिन्दी कार्यक्रम होते हैं कवि और लेखक अपनी रचनाएं
सुनाते हैं ।
फिजी में औपचारिक एवं मानक हिन्दी का
प्रयोग पाठशाला के अलावा शादी, पूजन,
सभा आदि के अवसरों पर होता है । शिक्षा विभाग
द्वारा संचालित सभी बाह्य परीक्षाओं में हिन्दी एक विषय के रूप
में पढार्ऌ जाती है । फिजी के संविधान में हिन्दी भाषा को
मान्यता प्राप्त है । कोई भी व्यक्ति सरकारी कामकाज,अदालत
तथा संसद में भी हिन्दी भाषा का प्रयोग कर सकता है। हिन्दी के
प्रचार-प्रसार में पत्र-पत्रिकाओं तथा रेडियो कारगर माध्यम हैं
। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में फिजी हिन्दी साहित्य समिति वर्ष
1957 से बहुमूल्य योगदान दे रही है ।
इस संस्था का मुख्य उद्देश्य है हिन्दी भाषा,
साहित्य एवं संस्कृति को बढावा देना । फिजी
में हिन्दी प्रगति के पथ पर है तथा इसका भविष्य उज्ज्वल है ।
नेपाल:
भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टि से भारत और
नेपाल संप्रभु राष्ट्र है, दोनों देशों
के बीच पौराणिक काल से संबंध चला आ रहा है,
खुली सीमाएं,
तीज-ज्यौहार, धार्मिक पर्व-समारोह तथा
इन्हें मानाने की शैली और पध्दति की समानता के अतिरिक्त नेपाल
में हिन्दी-प्रेम हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए काफी है ।
नेपाली भाषा हिन्दी भाषी पाठकों लिए सुबोध है । यदि इसमें कोई
अंतर है तो लिप्यांतरण का है ।
प्रचीन काल में नेपाली में संस्कृत की
प्रधानता थी । हिन्दी और नेपाली दोनों भाषाओं में संस्कृत के
तत्सम और तद्भव शब्दों की प्रचुरता और इनके उदार प्रयोग के
अतिरिक्त नेपाली भाषा में अरबी, फारसी,
उर्दू, अंग्रेजी एवं
कई अन्य विदेशी शब्दों का हिन्दी के समान ही प्रयोग हिन्दी और
नेपाली भाषी जनता को एक दूसरे की भाषा समझने में सहायक रहा है
। प्रारंभिक दिनों में नेपाल के तराई क्षेत्रों में स्कूलों
में तो शिक्षा का माध्यम हिन्दी बना । काठमांडू से हिन्दी में
पत्र-पत्रिका का प्रकाशन हाता है । प्रख्यात नेपाली लेखक,
कहानीकार एवं उपन्यासकार डा. भवानी भिक्षु ने
तो अपने लेखन कार्य का श्रीगणेश हिन्दी से ही किया । गिरीश
वल्लभ जोशी, रूद्रराज पांडे,
मोहन बहादुर मल्ल,
हृदयचंद्र सिंह प्रधान आदि की एक न एक कृति हिन्दी में ही है ।
श्रीलंका:
श्रीलंका में भारतीय रस्म-रिवाज,
धार्मिक कहानियां जैसे जातक कथा का भंडार आज
भी सुरक्षित है । श्रीलंका की संस्कृति वही है जो भारत की है ।
वहां हिन्दी का प्रचार अत्यंत सुचारू एवं सुव्यवस्थित ढंग से
होता रहता है । फिल्म प्रदर्शन, भाषण
विचार गोष्ठी आदि का आयोजन होता रहता है । भारत से आई
पत्र-पत्रिकाओं जैसे बाल भारती,
चंदा मामा, सरिता
आदि श्रीलंका में बड़े चाव से पढी
ज़ाती हैं । श्रीलंका रेडियो पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के
कार्यक्रम प्रसारित होते हैं । वहां विश्वविद्यालय में हिन्दी
पढाई जा रही है ।
यू.ए.ई.
:
संयुक्त अरब अमीरात देश की पहचान सिटी
ऑफ गोल्ड दुबई से है । यूएई में एफ. एम. रेडियो के कम से कम
तीन ऐसे चैनल हैं, जहां आप चौबीसों
घंटे नए अथवा पुराने हिन्दी फिल्मों के गीत सुन सकते हैं ।
दुबई में पिछले अनेक वर्षों से इंडो-पाक मुशायरे का आयोजन होता
रहा है, जिसमें हिन्दुस्तान और
पाकिस्तान के चुनिंदा कवि और शायर भाग लेते रहे हैं । हिन्दी
के क्षेत्र में खाड़ी देशों की एक बड़ी उपलब्धि है,
दो हिन्दी (नेट) पत्रिकाएं जो विश्व में
प्रतिमाह 6,000 से अधिक लोगों द्वारा
120 देशों में पढी ज़ाती हैं ।
अभिव्यक्ति
व अनुभूति
(इंटरनेट) पर
भी उपलब्ध हैं । इन
पत्रिकाओं की संरचना सही अर्थों में अंतर्राष्ट्रीय है क्योंकि
इनका प्रकाशन और संपादन संयुक्त अरब अमीरात से,
टंकण कुवैत से,
साहित्य संयोजन इलाहाबाद से और योजना व प्रबंधन कनाडा से होता
है ।
ब्रिटेनवासियों
ने हिन्दी के प्रति बहुत पहले से रुचि लेनी आरंभ कर दी थी ।
गिलक्राइस्ट,
फोवर्स-प्लेट्स,
मोनियर विलियम्स, केलाग होर्ली,
शोलबर्ग ग्राहमवेली तथा ग्रियर्सन जैसे
विद्वानों ने हिन्दीकोष व्याकरण और भाषिक विवेचन के ग्रंथ लिखे
हैं । लंदन, कैंब्रिज तथा यार्क
विश्वविद्यालयों में हिन्दी पठन-पाठन की व्यवस्था है। यहां से
प्रवासिनी, अमरदीप
तथा भारत भवन जैसी पत्रिकाओं का
प्रकाशन होता है । बीबीसी से हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित होते
हैं ।
संयुक्त राज्य अमेरिका
में येन विश्वविद्यालय में
1815 से ही हिन्दी की व्यवस्था है । वहां आज
30 से अधिक विश्वविद्यालयों तथा अनेक
स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा हिन्दी में पाठ्यक्रम आयोजित किए
जाते हैं । 1875 में कैलाग ने हिन्दी
भाषा का व्याकरण तैयार किया था । अमरीका से हिन्दी जगत
प्रकाशित होती है ।
रूस
में हिन्दी पुस्तकों का जितना अनुवाद हुआ है,
उतना शायद ही विश्व में किसी भाषा का हुआ हो।
वारान्निकोव ने तुलसी के रामचरितमानस का अनुवाद किया था
। त्रिनीडाड एवं टोबेगो में भारतीय मूल की आबादी
45 प्रतिशत से अधिक है । युनिवर्सिटी ऑफ
वेस्टइंडीज में हिन्दी पीठ स्थापित की गई है । यहां से हिन्दी
निधि स्वर पत्रिका का प्रकाशन होता है । गुयाना में
51 प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय मूल के
हैं। यहां विश्वविद्यालयों में बी.ए. स्तर पर हिन्दी के
अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की गई है । पाकिस्तान की
राजभाषा उर्दू है, जो हिन्दी का ही एक
रूप है । मात्र लिपि में ही अंतर दिखाई देता है । मालदीव
की भाषा दीवेही भारोपीय परिवार की भाषा है । यह
हिन्दी से मिलती-जुलती भाषा है । फ्रांस,
इटली, स्वीडन,
आस्ट्रिया, नार्वे,
डेनमार्क तथा स्विटजरलैंड,
जर्मन, रोमानिया,
बल्गारिया और हंगरी के विश्वविद्यालयों में
हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था है ।
इस प्रकार हिन्दी आज भारत में ही नहीं
बल्कि विश्व के विराट फलक पर अपने अस्तित्व को आकार दे रही है
। आज हिन्दी विश्व भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त करने की ओर
अग्रसर है । अब तक भारत और भारत के बाहर सात विश्व हिन्दी
सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं । पिछले सात सम्मेलन क्रमश:
नागपुर(1975), मॉरीशस (1976),
नई दिल्ली (1983),
मॉरीशस (1993), त्रिनिडाड एंड टोबेगो (1996),
लंदन (1999), सूरीनाम
(2003) में हुए थे । अगला विश्व हिन्दी
सम्मेलन 2007 में न्यूयार्क में होगा ।
इसके अतिरिक्त विदेश मंत्रालय क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलन का भी
आयोजन करता रहा है। अभी तक ये सम्मेलन ऑस्ट्रेलिया और अबूधाबी
में फरवरी, 2006 तथा तोक्यो में जुलाई
2006 में किए गए थे । अभी हाल ही में
शुक्रवार, 18 अगस्त, 2006
को विदेश मंत्रालय ने हिन्दी वेबसाइट का
शुभारंभ किया है। यह वेबसाइट माइक्रोसॉपऊट विंडोज प्रोग्राम और
यूनीकोड पर आधारित है । इसे देखने के लिए कोई फॉन्ट डाउनलोड
करने की आवश्यकता नहीं है। वेबवाइट का पता है-
www.mea.gov.in
।
वर्तमान में आर्थिक उदारीकरण के युग में बहुराष्ट्रीय देशों की
कंपनियों ने अपने देशों (अमरीका,
ब्रिटेन, फ्रांस,
जर्मनी, चीन आदि) के
शासकों पर दबाव बढाना शुरू कर दिया है ताकि वहां हिन्दी भाषा
का प्रचार-प्रसार तेजी से बढे और हिन्दी जानने वाले एशियाई
देशों में वे अपना व्यापार उनकी भाषा में सुगमता से कर सकें ।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की प्रगति यदि इसी प्रकार होती
रही तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ में एक
अधिकारिक रूप हासिल कर लेगी ।

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