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गीत
अधर तुम्हारे जैसे मुकुलित, कचनारों की दो कलियाँ अधर तुम्हारे जैसे मिलती, गाँव द्वारे दो गलियाँ
अधर तुम्हारे जैसे मेरे, गीतों के अंतिम मुखड़े हों, अधर तुम्हारे जैसे जुड़वाँ, हीरों के मध्यम टुकड़े हों ।
अधर तुम्हारे जैसे होता, सीपी में मोती का वैभव, अधर तुम्हारे जैसे उतरे, सौर-जगत से मंगल वैभव ।
अधर तुम्हारे जैसे मिलता, बचपन यौवन के पनघट पर, अधर तुम्हारे जैसे कोई, कंचन-कलश रखे घूंघट पर ।
अधर तुम्हारे जैसे कोई, चकवा-चकवी का जोड़ा हो,
अधर तुम्हारे जैसे नभ में, कामदेव के शर छोड़ा हो ।
अधर तुम्हारे जैसे सावन, भादों से मिलने आया हो, अधर तुम्हारे जैसे फागुन, मधुवन के झोंके लाया हो ।
अधर तुम्हारे जैसे तृष्णा, सागर को आँचल भर लेती, अधर तुम्हारे जैसे बिंदिया, बिना बात बातें कर लेती ।
अधर तुम्हारे जैसे बंधक, शिव की लट में गंगाजल हो, अधर तुम्हारे जैसे चारू, चंदनवन की दावानल हो ।
अधर तुम्हारे जैसे कोई, नभ में फैलीं दिव्य रेख हों, अधर तुम्हारे जैसे पावन, रेवा तट के शिलालेख हों ।
अधर तुम्हारे बीच हमारे, लगते नहीं पराये हैं, बचपन में भीगे तन-मन के, गीत इन्होंने गाये हैं । मणि 'मुकुल'
ढल रही है शाम, सूरज ढल रहा है सोचता हूँ मैं भी अब विश्राम कर लूँ ।
छै दशक तक भोर देखा, साँझ देखा साँस कितने लिए इसका नहीं लेखा सुख-दुःखों के बीच बीती कितनी रातें खट्टी-मीठी हुई जाने कितनी बातें चाहता अब मौन में बीते प्रति क्षण और मन के वासना का चीर हर लूँ ।
एक वह दिन था कि जब यह प्राण आया आँख खोली थी प्रथम जब यही काया भर गया उत्साह से था घर का कोना
उस समय था माँ की गोदी ही बिछौना बचपना बीता, बुढ़ापा आ गया अब सार है प्रभु नाम से अब झोली भर लूँ ।
सैकड़ों धागे बुने इस जिंदगी में एक भी पर बुन न पाया बंदगी में जानकर अनजान बनता रहा अब तक सत्य को झूठलाऊँगा मैं कहो कब तक दे रहा आवाज़ अस्ताचल से कोई अब तो ओठों में हरी का नाम धर लूँ ।
देख ली मैंने जगत की बेवफाई आज अपना है वही कल है पराई कौन किसका है न अब तक जान पाया जीर्ण होती जा रही प्रतिपल ये काया छोड़ सारे मोह-माया बंधनों को अब तो केवल में उसी का ही डगर लूँ । डॉ. नथमल झँवर
मिले थे हम कभी तट पर कभी यादों के पनघट पर, खिली थी चाँदनी मन में लगी थी आँख चौखट पर, बजाकर लौट आये हैं तुम्हारे द्वार की सांकल ।
कभी परबत से घाटी में कभी जंगल ढलानों पर, लिपटकर पेड़ से गाते कभी ठहरे किवाड़ों पर, बजे संतूर यादों के कि झरनों की खुली पायल ।
बहुत चाहा तुम्हें मन से मगर हम कह नहीं पाये, अधर पर मौन के ताले
मगर हम सह नहीं पाये,
धुएँ सा उठ रहा दिल में कि बरसा है कहीं बादल ।
चमकती बिजलियों ने जब कहीं मन को छुआ होगा, समाये तट की बाहों में लहर सा मन हुआ होगा, कभी देखा है दर्पण तो उड़ा है याद का आँचल ।
नहाकर रोशनी जल में कहीं जूड़ा सुखाती है, जो बूँदों ने छुआ तन को तो धड़कन गीत गाती है, अधर से बात करता है तुम्हारी आँख का काजल तुम्हारे गाँव आये हैं हमारे गाँव के बादल । जगदीश श्रीवास्तव
सुबह-सुबह को भेंट गई शाम की चुभन, उस किरन के नाम कोई पत्र तो लिखो ।
खुली जो आँख तो लगा कि रूप सो गया, साथ जो रहा था आज वह भी खो गया । देह-गंध यो मिली कि फिर दे गई अगन,
उस अगन के नाम कोई पत्र तो लिखो ।
मन किराएदार था, रचबस गया कहीं, तन किसी का सर्प जैसे डँस गया कहीं । हम मिले तो साथ में थी सब कहीं थकन, उस थकन के नाम कोई पत्र तो लिखो ।
मोड़ पर ही आयु के साथ वक़्त रुक गया, दूर चल रहा था पाँव वह भी थक गया । बाँह में था याद की सिमटा हुआ सपन, उस सपन के नाम कोई पत्र तो लिखो । तारादत्त निर्विरोध
जो अधूरापन किसी दिन गीत में आकर बसा था आज वह इन पुस्तकों में फिर कहानी लिख गया है ।
राग-लय-स्वर से सिसकती बीन को बजना सिखाया । हाशियों पर साँस ने, जाने कहाँ पर क्या लिखाया । मैं दुखों की बस्तियों में हँस न पाई रो न पाई,
जबकि परिचित बिन बताये राजधानी
लिख गया है ।
ज़िंदगी कुछ भी नहीं जैसे कि रेखा रेत पर हो । या कि हम सब नाचते ही जा रहे संकेत पर हों । कई दिनों तक पाँव जिन पगडंडियों पर थम गये थे, लग रहा ऐसा कि फिर कोई रवानी लिख गया है ।
हलचलों में मन बहुत कुछ भूल जाता है व्यथाएँ । इसलिये लहरें सुनाती जा रही पिछली कथाएँ । कंठ में मेरे बसा गायक कि वह रहता न प्यासा, क्योंकि वह अनुपन सरोवर गीत पानी लिख गया है । निर्मला जोशी
गाएंगे-गाएंगे हम बंदेमातरम् ।। चाहे जिंदा रहें, चाहे मर जाएं हम, गाएंगे-गाएंगे हम बंदेमातरम् ।।
गीत नहीं ये हमारी आन-बान है, ये हमारी आत्मा का पुण्य-गान है। शब्द नहीं ये हमारा मंत्र है महान् छेड़ें हम तराना यही गाते रहें गान कौन हमें रोकेगा, ये किसमें है दम, गाएंगे-गाएंगे हम बंदेमातरम् ।।
गाते-गाते वीर बलिदान हो गए, कौमी एकता की सच्ची शान हो गए । मर जाएं हम, रहे प्यारा हिंदुस्तान,
देश के लिए करेंगे हम बलिदान ।
कभी देश प्रेम अरे होगा नहीं कम, गाएंगे-गाएंगे हम बंदेमातरम् ।।
देश प्रेम न रहे तो कैसा इंसान, आदमी होकर भी है पशु के समान। राष्ट्र देवता को चढ़े शीश हमारा, जन्म लेंगे हम यहाँ से फिर दुबारा । कभी न सहेंगे हम जु्ल्मो-सितम, गाएंगे-गाएंगे हम वंदेमातरम् ।।
देश से बड़ा नहीं है धर्म हमारा राष्ट्र की आराधना है कर्म हमारा । करें हम प्रणाम, धरती माँ है हमारी, इसी ने सभी की तकदीर संवारी । माँ की वंदना में है काहे की शरम् गाएंगे-गाएंगे हम बंदेमातरम् ।।
चाहे जिंदा रहें चाहे मर जाएं हम, गाएंगे-गाएंगे हम बंदेमातरम् ।। गिरीश पंकज
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