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छंद

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 नवगीत दोहे ग़ज़ल गीत

 
 

 दोहे                       ।। दफ़्तर का इतवार ।।

 

कंचन-मृगया के लिए, दौड़े जल रघुबीर ।

उसी समय लाँघी गई, जो थी खिंची लकीर ।।

 

महानगर भेजे तभी, अपने गाँव प्रणाम ।

पत लिखे जब ज़िंदगी, जन्म-मृत्यु के नाम ।।

 

गंगा मैली हो गई, धोते-धोते मैल ।

रेती पर प्यासा खड़ा, शंकर जी का बैल ।।

 

पगले मन तू ही बता, कहाँ चलें किस ठाँव ।

फिट-भर की चादर लिए, मीटर-भर के पाँव ।।

 

विकसित होने का अगर, अवसर मिले समान ।

बुद्धि कभी चाहे नहीं, आरक्षित सम्मान ।।

 

होली मैके में पड़ी, पहली-पहली बार ।

रंगों से ज्यादा खले, लाज-शरम की मार ।।

 

जीते-जी बच्चे हुए, पेंशन के हकदार ।

जीवन जैसे हो गया, दफ़्तर का इतवार ।।

 

कुर्सी-टोपी मिल करें, अंगरेज़ी की भक्ति ।

देश खड़ा मुँह बा रहा, जैसे गूँगा व्यक्ति ।।

 

संविधान से जब हुआ, जनता का संवाद ।

मौलिकता गूँगी हुई, मुखर हुआ अनुवाद ।।

 

मंचों पर तुकबंदियाँ, मना रही हैं जश्न ।

कविता के माथे जड़ा, मौलिकता का प्रश्न ।।

 

दोहा है लघुकाय पर, अतिशय क्षमतावान ।

लघु चरणों से मापता, वामन बलि का मान ।।

राजेन्द्र वर्मा

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।। नयनों की भाषा पढ़ो ।।

 

ज्ञान कभी मिटता नहीं, जग चाहे मिट जाय ।

बाँटे से घटता नहीं, बिन बाँटे घट जाय ।।

 

हर्षाती है चाँदनी, पुरवैया है मंद ।

भाव हिलोरें ले रहे, राही गढ़ता छंद ।।

 

प्रभु प्रसन्न होते नहीं, जीवों का दुख देख ।

बदल नहीं सकता मगर, कोई विधि का लेख ।।

 

हृदय मिल जब हृदय से, खुशियाँ मिले अपार ।

नयनों की भाषा पढ़ो, नयनों को कर चार ।।

 

नीले, पीले, लास सब, रंगों की बौछार ।

गोरी छत पर खड़ी हो, सबको रही निहार ।।

रमेश राही

 

 

छंद

आलस्य दरिद्रता का दूसरा नाम है - तिरूवल्लुवर

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