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दोहे
।। दफ़्तर का इतवार ।।
कंचन-मृगया के लिए, दौड़े जल रघुबीर ।
उसी समय लाँघी गई, जो थी खिंची लकीर ।।
महानगर भेजे तभी, अपने गाँव प्रणाम ।
पत लिखे जब ज़िंदगी, जन्म-मृत्यु के नाम ।।
गंगा मैली हो गई, धोते-धोते मैल ।
रेती पर प्यासा खड़ा, शंकर जी का बैल ।।
पगले मन तू ही बता, कहाँ चलें किस ठाँव ।
फिट-भर की चादर लिए, मीटर-भर के पाँव ।।
विकसित होने का अगर, अवसर मिले समान ।

बुद्धि कभी चाहे नहीं, आरक्षित सम्मान ।।
होली मैके में पड़ी, पहली-पहली बार ।
रंगों से ज्यादा खले, लाज-शरम की मार ।।
जीते-जी बच्चे हुए, पेंशन के हकदार ।
जीवन जैसे हो गया, दफ़्तर का इतवार ।।
कुर्सी-टोपी मिल करें, अंगरेज़ी की भक्ति ।
देश खड़ा मुँह बा रहा, जैसे गूँगा व्यक्ति ।।
संविधान से जब हुआ, जनता का संवाद ।
मौलिकता गूँगी हुई, मुखर हुआ अनुवाद ।।
मंचों पर तुकबंदियाँ, मना रही हैं जश्न ।
कविता के माथे जड़ा, मौलिकता का प्रश्न ।।
दोहा है लघुकाय पर, अतिशय क्षमतावान ।
लघु चरणों से मापता, वामन बलि का मान ।।
राजेन्द्र वर्मा
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।। नयनों की भाषा पढ़ो
।।
ज्ञान कभी मिटता नहीं, जग
चाहे मिट जाय ।
बाँटे से घटता नहीं, बिन
बाँटे घट जाय ।।
हर्षाती है चाँदनी, पुरवैया
है मंद ।
भाव हिलोरें ले रहे, राही
गढ़ता छंद ।।
प्रभु प्रसन्न होते नहीं,
जीवों का दुख देख ।
बदल नहीं सकता मगर, कोई
विधि का लेख ।।
हृदय मिल जब हृदय से,
खुशियाँ मिले अपार ।
नयनों की भाषा पढ़ो, नयनों
को कर चार ।।
नीले, पीले, लास सब, रंगों
की बौछार ।
गोरी छत पर खड़ी हो, सबको
रही निहार ।।
रमेश राही

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