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पेरेन्ट्स डे |
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अनुवाद
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एन. एस. रामकृष्ण |
कहते
हैं कल पैरेन्ट्स डे है। हमारे स्कूल में सभी बच्चों को अपने
माता-पिता को स्कूल लाने के लिए कहा गया है। उन्हें थैंक्स
दिया जाएगा। उन्हें हम ही नाश्ता भी परोसेंगे। यह सब कितना
अच्छा रहेगा ना ?
पर मैं अपने माता-पिता को कहाँ से लेकर आऊँगा
?
वे कहाँ पर होंगे ?
छोटा सा था तभी क्यों मुझे इस अनाथालय की दहलीज पर छोड़, घंटी
बजाकर चले गए ?
थेरेसा मैडम बहुत प्यार करती हैं। लेकिन वह माँ का प्यार तो
नहीं है ना ?
काश मेरे भी नीतू और संतोष जैसे पेरेन्ट्स होते तो... कल मैं
कलर ड्रेस पहनकर उनकी उंगली थामे स्कूल जाता और हमारी मिस ने
जो नया गाना सिखाया है
‘माई
गेट पेरेन्ट्स’
को गाता। कार्यक्रम समाप्त होने पर वे मुझे अपनी गोद में लेके
मुझे पप्पी देते और खुशी-खुशी उछलता कूदता उनके साथ वापस अपने
घर जाता। काश ऐसा होता।
है ना ?
नीतू कहती रहती है मम्मी डैडी बहुत अच्छे हैं। रोज रात को
कहानी सुनाते हैं। मुझे भी कहानी सुनना अच्छा लगता है। पर
सुनाएगा कौन ?
फिर इतनी बड़ी होने पर भी
मम्मी उसे अपने हाथ से खिलाती है, ऐसा
बताती है। सबेरे उठने में तंग करती है तो उसे छोटे बच्चे जैसा
गोद में उठाकर बाथरूम को ले जाती है। वो सन्नी कह रहा था कि
उनके पिताजी उसे बाइक पर बिठाकर स्पाइडरमैन देखने ले गए थे।
बाइक में पिताजी के साथ स्टाइल से बैठकर जाना कितना अच्छा लगता
होगा ना
?
इंटरवेल में वेफर्स और टॉफी दिलाया था।
ओ पोनी टेल उषा है न, कहती है, उसकी माँ हर त्यौहार में उसे नए
कपड़े दिलवाती है। सब अपने पेरेन्ट्स के बारे में बता रहे हैं
और मैं अकेला चुप रहता हूँ। मैं भी बताना चाहता हूँ पर मुझे यह
सब मालूम ही नहीं है।
मुझे तो सबेरे आया उठाती है। मास्टर प्रेयर कराते हैं। रसोइया
खाना देते हैं। अगर खाते वक्त कुछ नखरे किए तो मक्खन
लगाकर प्यार से खिलाने वाली माँ तो नहीं है न
!
अगर कुछ गड़बड़ किया या खाना गिराया तो सिर्फ थेरेसा मैडम की
डांट खानी पड़ती है, बस। डांट खाकर शर्म महसूस होती है। इसीलिए
मैं थोड़ा ही खाना खाता हूँ। बीच में अगर भूख लगी तो खाने को कुछ
नहीं होता। टाइम टेबल के मुताबिक रोज तैयार होना पड़ता है। मैं
रूठ भी जाऊँ तो मनानेवाला कोई नहीं है।
मेरी तबीयत खराब हो गई तो भी मेरे साथ कोई नहीं रहता। संतोष को
अगर बुखार आ जाए तो उसके मम्मी डैडी उसे अकेला छोड़कर कहीं
नहीं जाते। अगर वे कहीं जरूरी काम से जाना भी चाहें तो मैं रो-
धो कर आसमान सिरपर उठा लेता हूँ, तो उन्हें हारकर मेरे पास
बैठना ही पड़ता है। जोर से ताली बजाकर हँसते हुए उसने मुझसे
कहा। इस बात पर मुझे गुस्सा आया।
और नीतू तो इससे भी चार कदम
आगे है। अगर उसे कुछ चाहिए तो खाना पीना छोड़कर रो-धोकर हठ करके
अपनी पसंद की चीज़ ले ही लेती है। तुम लोगों को पेरेन्ट्स की
कीमत नहीं मालूम कहकर डांटा था। तुम क्या जानो पेरेन्ट्स क्या
होते हैं ?
हम कुछ भी करें उन्हें बुरा नहीं लगता। समझे
?
हाँ सही है मैं अनाथ क्या जानूँ मम्मी डैडी क्या होते हैं।
कितना प्यार करते हैं। यह सब सुनी-सुनाई बातें हैं। खुद अनुभव
नहीं किया हूँ। उस दिन हम सब ट्रिप पर गए थे। वापस आने में देर
रात हो गई। पानी भी बरस रहा था। ऐसे में सारे बच्चों के अभिभावक
राह देख रहे थे। जैसे ही बस पहुँची सब अपने बच्चों को प्यार
करने लगे। मैं गेटकीपर का हाथ थामे हॉस्टल पहुँचा। मेरा वहाँ
कोई इंतज़ार नहीं कर रहा था। मेरा खाना एक प्लेट में ढंककर
टेबल पर रखा हुआ था। मुझे बहुत रोना आया। वैसे ही जाकर सो गया।
आधी रात को भूख सताने लगी तो खाना खाने आया। वहाँ चूहों ने
सारा खाना बरबाद कर दिया था। फिर दुखी होकर जाकर सो गया।
सुषमा मुझ पर तरस खाती है।
तुम्हारी माँ नहीं है ना कहकर अपने घर से अच्छे-अच्छे पकवान
लाकर देती है। अच्छा लगता है, पर गिल्टी फील करता हूँ। सोच रहा
था कर क्या करूँ। पैरेन्ट्स डे में जाऊँगा तो बहुत दुखी हो
जाऊँगा। बुखार का बहाना बनाकर हॉस्टल में ही रहूँगा। यही ठीक
रहेगा।
सबेरे तबीयत खराब होने का नाटक करते हुए स्कूल न जाने की जिद
पकड़ी। सिस्टर ने आकर मेरा माथा छुआ और डाँटते हुए बोली छोटे
बच्चों को झूठ नहीं बोलना चाहिए। अच्छे बच्चे की तरह तैयार हो
जाओ और स्कूल जाओ कहकर तैयार कर मुझे स्कूल भेज दिया। मुझे
स्कूल जाना ही पड़ा। स्कूल में त्यौहार का माहौल था। सब बच्चे
रंगीन परिधानों में सजे अपने मम्मी डैडी के साथ आ रहे थे तो
मैं यहाँ यूनीफॉर्म में अकेला खड़ा सब को देख रहा था। मुझसे
रहा नहीं गया। मुझे बहुत रोना आ रहा था। वहीं बगीचे में एक
पेड़ की ओट में पत्थर पर बैठकर रो रहा था।
अचानक सहना मैडम की नज़र मुझ पर पड़ी। पास आकर कहने लगी
‘क्यों
बेटा क्या बात है ?
अकेले यहाँ क्या कर रहे हो
?’
वे बहुत अच्छी हैं। स्कूल में न किसी को डांटती हैं ना किसी को
मारती हैं। ‘आज
पेरेन्ट्स डे है और मेरा कोई नहीं है मैडम।’
कहकर मैं फूट-फूट कर रोने लगा। मैडम ने मुझे अपने सीने से
लगाया और सिर पर हाथ फेरते हुए पुचकारा। मुझे और भी रोना आया।
इस पर वे भी रो पड़ीं। मैंने पूछा
– ‘मैडम
आपके भी पेरेन्ट्स नहीं हैं क्या?’
तो मैडम बोली –
‘पेरेन्ट्स
तो हैं लेकिन बेटा नहीं है। इसीलिए रो रही हूँ।’
‘जाने
दो मैडम।’
मैंने कहा।
थोड़ी देर चुप रहकर बोली
–
‘क्या
तुम मेरे बेटे बन कर मेरे साथ घर चलोगे
?’ ‘ठीक
है मैडम, लेकिन अगर मैं सीधा स्कूल से हॉस्टल नहीं पहुँचा तो
थेरेसा मैडम नाराज हो जाएंगी।’
‘ऐसा
नहीं है बेटा, मैं उससे बात करके सबकी सहमति से तुम्हे घर ले
जाऊँगी। तुम मेरे अच्छे बेटे हो।’
यह कहकर फिर मेरा माथा चूमा। मैं हँसता-कूदता सहना मैडम...
नहीं सहना मम्मी का हाथ पकड़ पेरेन्ट्स डे प्रोग्राम के लिए
स्कूल की तरफ बढ़ा।
मूल कन्नड़
–
एम.ए. इंदिरा

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