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बचपन

बालकहानी कहानी चीं-चूँ की

बालकवीता प्रमोद सोनवानी पुष्प  शंभूलाल, शर्मा  ‘वसंत   राजा चौरसिया

 

प्रमोद सोनवानी पुष्प  की बाल कविताएँ

।। फहर रहा है परचम ।।

कोयल रानी-छेड़े सरगम,

पंछी नाचे छम-छम ।

ऋतु राज का बगिया-बगिया,

फहर रहा है परचम ।।

 

डाल-डाल पर आम लदें हैं,

हैं जो बड़े रसीले ।

गुदे वाले स्वाद निराले,

हैं जी पीले-पीले ।

देख रहें हैं बच्चे-बूढ़े,

जो, भूल-भाल कर गम ।।

 

मन कहता है-मैं भी होता,

काश कहीं इक चिड़िया ।

कोयल के संग मिलकर मैं तो,

गीत सुनाता बढ़िया।

बाग-बाग में जा-जाकर मैं,

खूब फुदकता हरदम ।।

 

।। हमारा गाँव ।।

हरी-भरी हरियाली से,

गाँव हमारा सजा हुआ है।

मखमल जैसी हरी घास का

यहाँ बिछौना-विछा हुआ हैं।।

बाड़ी-बाड़ी में देखो जी,

धनिया की खुशबू महक रही हैं ।

भिन्डी के संग हरी मिर्चियाँ ,

नील गगन को देख रही हैं।.

सूर्यमुखी के फूलों में,

भौरे भी मँडरा रहे हैं ।

झिंगुर अपनी शहनाई से,

गीत सुहाना सुना रहे हैं।।

प्रकृति की माया न्यारी,

चार-चाँद यहाँ लगा हुआ हैं ।

हरी-भरी हरियाली से

गाँव हमारा सजा हुआ हैं ।।

 

 

।। ऐसा जीवन गढ़ना ।।

चिन्नू-मुन्नू से अनबन क्यों ?

प्रेम-प्रीत से नित रहना ।

अच्छे जग में हम कहलाएँ ।

जीवन ऐसा है गढ़ना ।।

 

नफ़रत करके इस दुनिया में,

कौन, क्या ? बन पाया है।

बस पीछे पछताते है जी,

नफ़रत की यह माया हैं ।

प्रेम जगाकर हर मूरत में ,

कर्म अमिट करते जाना ।।

 

जीवन में नवरंग भरें हैं,

यही प्रीत की शक्ति हैं।

सपनों से हम बँधे हुए हैं,

जीवन की यही कश्ती हैं ।

आँधी-तूफाँ में डूब न पायें,

इस कस्ती में सम्हल कर चलना ।।

 

राजा चौरसिया की बाल कविता

। आज मेरा जन्मदिन है ।।

 

ताक धिन-धिन, धिनाधिन है

आज मेरा जन्मदिन है ।

 

बहुत प्यारा लग रहा घर

सजा भीतर और बाहर

देखकर कह रहे दादा

बहुत सुंदर, बहुत सुंदर।

 

खुश हैं मम्मी और पापा

नाचती, गाती बहिन है ।

 

मिली मुझको गिफ्ट बढ़िया

शिवम् ने जो चीज दी है

वह लगे जादू की पुडिया ।

 

किसी उत्सव की खुशी को

व्यक्त कर पाना कठिन है ।

 

सभी ने खाई मिठाई

दोस्तों की टीम आई

गले से मुझको लगाकर

मुझे दी हँसकर बधाई ।

 

हार्दिक शुभकामनाएँ

दे रहा मुझको सचिन है ।

 

शंभूलाल, शर्मा  ‘वसंत की बाल कविताएँ

।। गजब हो गया आज रात को ।।

गजब हो गया आज रात को

कोई हांक रहा था,

नजर पड़ी खिड़की पर वह तो

लुक-छिप झांक रहा था ।

 

बोला मुझसे –‘भटक गया हूँ

मेरा हाथ बंटाओ,

धरती पर मैं अभी कहाँ हूँ

जल्दी से बतलाओ।

 

कहा उसे मैं-है यह भारत

वह झट उछल पड़ा था,

धन्य हुआ इसका दर्शन कर

यह कह समझ पड़ा था।

 

उसका सच्चा प्रेम-भाव जो

सपना मुझे बनाया,

आतुर होकर उससे मिलने

घर से बाहर आया ।

 

मुझे देख हँसकर वह बोला

आओ हाथ मिलाओ,

मैं हूँ मंगलग्रह का राजा

अपना हाल सुनाओ ।

 

इसी बीच कह-समय हो गया

फिर आऊँगा भाई,

सच कहता हूँ तुमसे मिलकर

मैंने राहत पाई ।

 

साथ-साथ मैं गया यान तक

फिर अचरज में डूबा,

सपने के संग यान उड़ गया

था जो बड़ा अजूबा ।

 

।। किरणों की रानी ।।

अजब सुहानी रात सलोनी

थे दिन गरमी वाले,

चन्द्रलोक के खुले हुए थे

दरवाजों के ताले

 

चंदामामा के घर में जो

भरती है नित पानी,

द्वार खोलकर बाहर निकली

थी किरणों की रानी ।

 

हाथों में सतरंगी डोरी

थे सोने के लोटे,

सहलाकर वह मुझे जगाई

चल उठ भाई छोटे ।

 

हरा-भरा यह गांव तुम्हारा

है पर्वत के नीचे,

तुम्हें बताने आई हूं यह

ध्यान सभी का खींचे ।

 

हरियाली का दृश्य मनोहर

ऊपर से हैं झरने,

सुनों यहीं अब नित आऊँगी

मैं तो पानी भरने ।

 

लगा मुझे उससे है कोई

बहुत पास का नाता ,

काश कहीं यह सुखद,सुहाना

सपना सच हो जाता ।

 

 

।। दादा जी का बुखार ।।

दादा जी को चढ़ा बुखार

राम भज रहे बारंबार ।।

 

इतने में दादी माँ आई,

लेकर कंबल और रजाई।

झट ओढ़ाकर बड़े जतन से

शुरू हुआ उनका उपचार।।

 

माथे पर पानी की पट्टी,

और दवा कुछ कड़वी-खट्टी।

शहद मिलाकर उन्हें खिलाई

सुबह-शाम दिन में दो बार

 

सरदी, खांसी, ज्वर के मारे,

दो दिन तक आकुल बेचारे।

लेते थे बस, अल्प मात्र ही

पतली खिचड़ी का आहार ।।

 

चौथे दिन दादा जी चंगे,

खूब नहाए हर-हर गंगे

डटकर खाए दूध-मलाई

सेव-सन्तरे और अनार ।।.

 

बचपन

अमृत तुल्य सज्जनों का संगम प्राप्त होना दुर्लभ है - वाल्मीकि

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