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बालकहानी ॉ. अजय जनमेजय : कहानी चीं-चूँ की

बालकवीता प्रमोद सोनवानी पुष्प  शंभूलाल, शर्मा  ‘वसंत   राजा चौरसिया

 

बालकहानी

कहानी चीं-चूँ की

0  ॉ. अजय जनमेजय0

 

       बाग़ था। उसमें तरह-तरह के पेड़ थे। उन्हीं में से आम के एक पेड़ पर चुनचुन का छोटा, मगर सुंदर-सा घर था। यूँ तो उसका घर तिनकों, घास-फूस और पत्तियों से बना था, पर वह इतने सलीक़े से बनाया गया था कि उसकी कारीगरी देखते ही बनती थी। उसमें रहनेवालों के लिए वह हर तरह से आरामदायक था। उसी घर में चिड़िया चुनचुन के साथ उसके दो छोटे-छोटे बच्चे भी रहते थे। इनके नाम थे चीं-चीं और चीं-चूँ।

 

       चीं-चीं सामान्य चिड़ियों के बच्चों की तरह सुबह देर से उठता, अपने पंख खोलकर काफ़ी देर तक इधर-उधर फुदकता और लौटकर फिर अपनी माँ के पास आ जाता। पर चीं-चूँ की आदतें बिल्कुल अलग तरह की थीं, वह तो बहुत सवेरे उठ जाता। अपने पंखों को ताज़ा हवा में खोलकर मुँह से चीं-चीं बोलते हुए सबका मन लुभाता। वह पेड़ की एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकता रहता। आराम करना उसे बिल्कुल न सुहाता। वह हरदम कुछ-न-कुछ नया करने की सोचता रहता।

 

       जब ये दोनों बच्चे थोड़े बड़े हुए तो उड़कर अपने लिए चुग्गा चुगने जाने लगे। शाम के समय दोनों बच्चे अपने घोंसले में लौट आते। चिड़िया तथा चिड़ा अपने दोनों बच्चों से बेहद खुश थे।

 

       चीं-चूँ रोज़-रोज़ की एक-सी ज़िंदगी से खुश नहीं था। उसे लगता, रोज़ सुबह उठो और लग जाओं पेट भरने की जुगत में, पूरे दिन चुग्गे की तलाश में इधर-उधर भटकते रहो, थके-हारे शाम को वापिस आओ तो सो जाओ और फिर अगली सुबह से वही भूखे पेट के लिए भागदौड़।

 

       एक दिन ऐसा ही कुछ सोचता हुआ चीं-चूँ चुग्गे की खोज में उड़ा जा रहा था, तभी उसे सामने से विशालकाय हाथी ननकू आता दिखाई दिया। उसने सोचा कितना अच्छा होता यदि मैं भी हाथी जैसा होता। तब मुझे रोज़-रोज़ भोजन की खोज में भागना नहीं पड़ता। यह तो बहुत आसानी से किसी भी गन्ने के खेत में घुसकर अपनी भूख मिटा लेता है। फिर नदी में पानी पीकर आराम से ज़िंदगी गुज़ारता है। कोई छोटा-मोटा जानवर इसके साथ पंगा लेने की सोच भी ले तो समझो उसकी ख़ैर नहीं । यही तो आराम है, इतने बड़े शरीर का।

 

       यही सब सोचते-सोचते चीं-चूँ ननकू के पास पहुँचा और बोला, ननकू जी नमस्ते । मुझे आप बहुत अच्छे लगते हैं। काश, मैं भी तुम्हारे जैसा होता!’ ऐसा कहते हुए चीं-चूँ की आवाज़ में उदासी साफ़ झलक रही थी।

 

       ननकू समझ गया और बोला, प्यारे चीं-चूँ, हम सबकी यही तो परेशानी है। हम सबको दूसरे का जीवन, दूसरे का घर, दूसरे के खाने का सामान बहुत अच्छा लगता है। अपने जीवन और अपने शरीर के छोटे-छोटे दुख भी बहुत बड़े लगते हैं। जैसे तुम्हें मैं बहुत अच्छा लग रहा हूँ, पर तुम मेरी कठिनाइयों से परिचित नहीं हो। इतने बड़े शरीर को चलाने के लिए मुझे ढेर सारा भोजन करना पड़ता है। भोजन के लिए मैं जिस खेत में जाता हूँ उसका मालिक मुझे मारने के लिए दौड़ता है। मेरे क़ीमती दाँतों के चक्कर में आदमी मुझे मारने के लिए नए-नए उपाय खोजता रहता है। अक्सर जंगल में बड़े-बड़े गड्ढे बनाकर उनको घास-फूस से ढक दिया जाता है, ताकि भागते या चलते-फिरते मैं उस गड्ढे को न देख सकूँ और उसमें गिर जाऊँ। यह सब बड़ा कष्टकारक है। फिर मेरे इतने बड़े शरीर में कहीं भी खुजली हो तो मैं ठीक से खुजा भी नहीं सकता। मैं तुम्हारी तरह एक जगह से दूसरी जगह उड़कर नहीं जा सकता। न मैं इतने बड़े शरीर को सर्दी-गर्मी से बचाने के लिए कोई घर बना सकता हूँ, मुझे तो सारे मौसम ऐसे ही झेलने पड़ते हैं। तो प्यारे चीं-चूँ हर किसी को जहाँ अपने आपस कुछ परेशानी है, वहीं हम सबको बहुत सारी ख़ूबियाँ भी मिली हुई हैं। हम इन्हें और बढ़ाकर, एक दूसरे के साथ प्रेम से बोलकर, आपस में एक-दूसरे की मदद करके अपनी ज़िंदगी का पूरा आनंद ले सकते हैं।

 

       चीं-चूँ बोला, ननकू जी, आपने तो मेरे सोचने का ढंग ही बदल दिया। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

      

       चीं-चूँ शाम को वापिस अपने घोंसले की ओर उड़ा जा रहा ता लेकिन आज उसके मन में अपने चिड़िया होने का कोई पछतावा नहीं था । वह बहुत खुश था, बहुत ख़ुश, तभी तो वह गाता जा रहा था चूँ- चूँ, चूँ- चूँ, चूँ- चूँ, चूँ- चूँ

                       

 

 

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