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अपनीबात

 

लिखने से पहले - लिखने का बाद

मेरे एक प्रवासी मित्र हैं । कनाड़ा में रहते हैं । बड़े उत्साही और उत्सुक रहते हैं साहित्य को लेकर। उनके हर ई-मेल में किसी न किसी जिज्ञासा का जादुई रंग मुझे अपनी ओर खेंच ही लेता है। मुझे नहीं पता कि उनकी जिज्ञासाओं के बारे में कितना कुछ जानता हूँ । पर अब तक जितना जान पाया हूँ उसे बाँटने और फिर उनके प्रत्युत्तर में मेरी अपनी समझ की संपुष्टि को लेकर मन में संतोष का जो भाव जागता है वह अंधे और लंगडे की दोस्ती का भाव सा है जो सहकार-भाव से मेले में पहुँच ही जाते हैं। खैर..... । इस बार का प्रश्न है

       लेखन क्या है ? लेखन कैसै होता है ? लेखन से क्या होता है ?

       यानी कि लिखने से पहले और लिखने के बाद का मर्म ?

 

      लेखन घूमने-फिरने, खाने-पीने, उठने-बैठने जैसी क्रिया मात्र नहीं है । वह भावात्मक कर्म भी है । संवेदनशीलता से अभिप्रेरित रचनात्मक कर्म । रचनात्मक है सो सुसंस्कृतीकरण भी । रचनात्मक इसलिए कि वह शब्दों का जोड़-तोड़ नहीं । लेखन वाक्यों का संयोग नहीं अनुभव और उससे भी एक कदम आगे अनुभूति का योग है । लेखन किसी छात्र का मास्साब को संबोधित अवकाश का रटा-रटाया आवेदन-पत्र नहीं, किसी घाघ बाबू का नोटशीट पर पेंचमय टिप्पणी भी नहीं और तो और किसी अख़बारनवीस का बाढ़ से फिरकर आँखोंदेखी रिपोर्ट भी नहीं । यदि वह भी लेखन होता तो हमारे अध्यापक, वकील, मुंशी, न्यायाधीश भी लेखक होते और सारा साक्षर-शिक्षित समाज पढ़ा-लिखा समाज होता, लिखा-पढ़ा समाज नहीं । लेखक होने के अतिरिक्त बोध से समाज की अक्षरहीन कालीन प्रवत्तियाँ स्वयंमेव ध्वस्त हो जातीं । शेष-समाज अंधियार की गिरफ़्त से कब का विमुक्त हो चुकी होता । कम-से-कम तब भीतर के इंसान की संपूर्णता की रिद्धि-सिद्धि का उद्यम अवश्य चहुँओर हुआ करता ।

 

        वे शुरू में हाँ हूँ करते हैं । फिर प्रश्नों की झड़ी लगा देते हैं । गणित और विज्ञान ने मिलकर उनके मन को रचा जो है । क्या करें बेचारे तर्कों में कसे बिना कुछ भी स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते । लेखन में वेशक तर्क भी ढूँढा जा सकता है । पर वह तर्क से नहीं उपजता । वह भावों का उछाल है ।

      

        लेखन यानी अंतःबाह्य के सत्य का एकीकरण और साध्य का गुरुत्वाकर्षण । लेखन यानी अप्राकृतिक, अमर्यादित, अपरूप, अपचेष्टा के पर्यावरण के बावजूद उनके समानांतर ही शिव-सत्ता का अवगाहन । लेखन यानी समग्र सौदर्य का प्रकाशन । लेखन का मतलब रचना है । स्वयं को रचना । युग को रचना । समय को रचना । काल को रचना । भूत, भविष्य, वर्तमान को रचना । दृष्ट को रचना, अदृश्ट की भी रचना । लेखन समांतर संसार की सर्जना है । लेखन ईश्वर के बाद सर्वोच्च सत्ता को साधने वाली कला है । लेखन वही जिसके प्रत्येक शब्द में सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् की ज्योत्सना झरती हो । वहाँ डूब-डूब जाने के लिए मन बरबस खींचा चला आता रहे । लेखन सच्चा होगा तो वह क्षीणकाय न होगा, दीर्घायु होगा । वहाँ वाद न होगा, विवाद न होगा, अजस्त्र संवाद होगा । फलतः उसमें मनुष्य जाति के लिए अकूत रोशनी होगी । एक ऐसी पनघट होगी जहाँ हर कोई अपनी प्यास बुझा सके । एक सघन-सुगंधित तरूबर होगा जहाँ हर कोई श्रांत श्लथ श्रमजल जूड़ा सकेगा । एक ऐसा निर्मल दरपन होगा जहाँ वह अपने चेहरे के हर रंग को भाँप सकेगा । एक ईमानदार लेखन सामयिकता के जाल में उलझना नहीं चाहता । सामयिकता तत्क्षण का अल्प सत्य है । वह शाश्वत नहीं हुआ करती । ईमानदार लेखन सदैव शाश्वत की ओर उन्मुख होना चाहता है । इसलिए वह व्यक्ति, जाति, धर्म, देश, काल, परिवेश को लांघने के सामर्थ्य से परिपूर्ण होता है । वह अपनी वास्तविकता में व्यक्ति नहीं अपितु व्यक्तित्व की लघुता से प्रभुता की ओर संकेत है । लेखन तटस्थ-वृत्ति है । ऐसी तटस्थता जहाँ मंगलकामना का अनवरत् राग गूँजता रहता है- सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे भवन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राण पश्यंतु, मां कश्चित् दुख भाग्भवेत् । 

 

       लेखक के प्राण का कोटर शब्द है और अर्थ शब्द के प्राण का । अपने एकाकीपन में शब्द निराकार, निस्तेज पड़ा रहता है । लेखक का कलात्मक संस्पर्श पाकर वह जीवंत बन जाता है । उसके चतुर्दिक् अर्थ झंकृत होने लगता है । शब्द-साधना लेखक का जीवन है । वही शब्द को एक नयी छवि प्रदान करता है । शब्द गोया कृष्ण हो और लेखक मीरा । शब्द वन की ओर प्रस्थित राम हो और लेखक दुखी भरत । राम भरत को मिलते तो हैं पर उसे उनकी खडाऊ से ही संतोष होना पड़ता है । कई बार लेखक के साथ भी यही होता है । वह वांछित शब्द को रिझा नहीं पाता । छायाशब्द से ही तोष हो लेता है । दरअसल शब्द होते ही हैं ऐसे, कि अस-तस पकड़ में नहीं आते । लेखक आजीवन शब्दों के पीछे दीवानगी की हद तक भागता-फिरता है । राग-रंग, दीन-दुनिया, धन-दोगानी के वैभव से अनावृत होकर । एकाएक जब नया शब्द कौंधता है तो प्रसव-पीड़ा का सारा अनुभव उल्लास में रूपायित हो उठता है । धरा से गगन तक शिशू-जन्म पर मंगलगान के छंद भर-भर उठता है । मानो मरुभूमि में किसी शाख पर कोई विहंग गा उठा हो । दीर्घ अनावृष्टि के बाद शीतल बूँदे झमाझम थिरक उठी हों । शब्दों की बिरादरी में एक नये शब्द का आगमन राम का वनवास से अयोध्या वापसी सा उमंग जगाता है । शब्द को उसकी अर्थमयता के रूप में ढ़ूढ़ने की यही कला, यही साधना लेखक को सृष्टिकर्ता सिद्ध करार देती है और शब्द एक नये संदर्भ में जगमगाने लगता है । ईश्वर के बाद लेखक को इसलिए ही रचयिता कहा गया है ।

 

            लिखने की साध अंतहीन है । यह अमर रस है । सर्वदा निखरता रहता है । लिखनेवाले ने धरती पर लिखा, नदियों पर लिखा, पर्वत-पहाड़ों पर लिखा। गगन पर लिखा, पक्षियों पर लिखा, चाँद-सितारों पर लिखा । तन पर भी लिखा, मन पर भी लिखा, और धन पर भी लिखा । राम पर भी लिखा, नाम पर भी लिखा और काम पर भी लिखा । नीति के लिए लिखा, नीयत के लिए लिखा, और तो और नियत के लिए भी लिखा । आगत के लिए लिखा, अतीत के लिए लिखा और तो और अनंत के लिए भी लिखा । कहाँ-कहाँ नहीं पहुँची उसकी लेखनी । आकार से निराकार तक । राजा से रंक तक । लोक से परलोक तक । समय थक गया, काल थक गया, पर लेखक कभी न थका । वह करे तो भी क्या करे । लेखन की इति ही उसके लिए लेखन का अथ बनकर उसे रिझाने लगती है । मन में बार-बार दुनिया से उठ जाने की इच्छा होते हुए भी वह फिर-फिर जीना चाहता है । इसलिए नहीं कि उसके नातिन के हाथों हल्दी कुंकुंम देखना है । इसलिए भी नहीं कि किसी तीरथ-धाम के देव पर चंदन-तिलक लेपना है । उसे लगता है कि अभी भी बहुत कुछ लिखा जाना है सिर्फ इसलिए । वह चाहता है कि ईश्वर उससे सब कुछ छीन ले हर नेमत लूट ले पर थोड़ी सी और उम्र की मोहलत दे दे लिखने के लिए । काश, कितना अच्छा होता यदि ईश्वर रचनाकारों की सून लेते, दुनिया भर के आतंककारी, कलुषित आत्माओं की आयु से कुछ कटौती कर लेखक को अनुदान में दे देते ।

 

       शब्द की नयी चमक में जीवन का नया कोण दिखाई देता है । मनुष्य में विद्यमान उर्जस्विता का बंद कपाट खुलने लगता है । शब्द को इसलिए प्रकाशपुंज कहा गया । प्रकाशक माना गया है उसे। जनक की जिज्ञासा पर याज्ञवल्क्य बताते हैं - ‘जब सूर्य अस्त हो जाता है, चंद्रमा की चाँदनी भी नहीं रहती, जब आग भी बुझी रहती है, उस समय मनुष्य के लिए वाक् ही प्रकाश है । अजस्त्र उजियाला है वह । मनुष्य का अनुपम हितैषी । मनुष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ सौगात इससे बढ़कर और कौन है ।

 

       तब अक्षर अदृश्य था । शब्दों से परिचय न था । यहाँ से वहाँ तक मौन ही मौन पसरा हुआ था । हर चीज निःशब्द । हर क्षण एक नीरस युग । मनुष्य वन्यजीव से ज्यादा कुछ भी न था । सोचें तो सोच नहीं पायेगें । बोलें तो बोल नहीं पायेगें । मेरी तो रूह काँप-काँप उठती है । कैसे रह लेता था वह । ईश्वर को बारंबार साधुवाद जो उसे हमारे लिए सबसे पवित्रतम् घड़ी-बेला का मुहुर्त रचा । पूर्वजों को वाक् का वरदान मिला । प्रकृति की स्वरलहरी में मनुष्य कंठ का स्वर भी सम्मिलित हो गया । पृथ्वी की श्मशानी-तंद्रा टूट गई । पत्थरों से सरगम गूँजने लगा । देखते-देखते सभी को अपना-अपना परिचय मिल गया । सारे के सारे बेनाम संज्ञावान् बनते चले गये । संज्ञावानों  को विशेषणों की भेंटें मिलने लगीं । मनुष्य शब्दों का सानिध्य पाकर पहली बार स्वयं को पा लिया । वह शब्दों के जल में रेखांकित मनुष्यता के सौदर्य को बाँच पाने में सफल हो गया । क्या यह पृथ्वी के लिए शब्दों का जीवनदान न था । वाक् या वाणी की ज़मीन में ही सभ्यता और संस्कति पुष्पित-पल्लवित हुईं । सच्चे संदर्भों में वाक् से ही वास्तविक सृष्टि हुई स तया वाचा तेनातमना इदं सर्वमसृजत । यदि प्रजापति ने ही सृष्टि की है तो यह सच है कि उसने भी सबसे पहले शब्दों का आभास किया होगा, पीछे उन शब्दों के अनुरूप वस्तुओं की रचना की होगी ।

 

       तो जिसे हम लेखन कहते हैं, वह प्राचीन भाषा में - वाक् का रस है । वह वाक् का सौंदर्य है । और लेखन का रस लय-नाद-सौंदर्य या समरसता में होता है । यही तीन तत्व लेखन का सौंदर्य भी हैं । वाक् अपने मूल में नित्य होकर भी अनगढ़ होता है उसे जब किसी मधुर-सा छंद का परिधान उपलब्ध हो जाता है वह चमक उठता है । उससे आह्लाद, माधुर्य और सत्वाद्रेक की जादुई किरणें निकलने लगती हैं । ऐसे क्षणों में वाक् केवल वाक् नहीं रह जाता ऋक, श्लोक अथवा कविता हो जाता है ।

 

       लिखना एक तरह से स्वयं के लिए दुनिया भर का दुख-दर्द बटोरना है । लेखन स्वार्थ नहीं परमार्थ है । लेखक होना स्वयं के विरूद्ध भी तनकर अडिग खडे रहना है । जो कीचड़ में भी कमल का सुंगध बटोरले और उसे अपने इर्द-गिर्द फैला दे वही लेखक है । उसे कहाँ चाहिए होता कि उसकी लेखनी स्वर्ण-हीरे जड़ित हो । कागज़ जूही-चंपा-चमेली की महक से गमगमाती हो । सेज-सूपेती सजी हुईं हों । नौकर-चाकर-ताबेदार एक इशारे की ओर टूकूर-टूकूर निहारते फिरते हों । वह योगी होकर भी वियोगी भाव से अपने लिए कुछ भी नहीं जोडता । जोड़ता चलता है तो बस्स केवल-केवल मन । मन से मन जुड़ जाये तो वह स्वयं को अहोभाग्य मान लेता है । उसे न धन की धून रहती है न तन की ।  उस पर एक ही धुन सवार होता है लिखना-लिखना-लिखना ।

 

        प्रवासी मित्र के प्रश्न की नोक के सम्मुख जब मैं स्वयं को पाता हूँ तो पलभर के लिए अकबका उठता हूँ । सही-सटीक वस्तनिष्ठ जवाब का कोई छोर नहीं पकड़ पाता । ज़रा थमकर सोचता हूँ तो लेखन के आगे-पीछे का घटाटोप धीरे-धीरे छँटने लगता है । जो भी समझ में आता है वह कुछ ऐसा ही है-

 

        लेखन अनेकानेक निमित्तों का समुच्चय है । स्वांतः सुखाय जैसा कोई अनुभव होते हुए लेखन मेरी पहचान है । अंतः बाह्य-दृष्टि में गहरे तक धँसे समय की भी पहचान है । वह पहचान जो नितांत मेरी मान्याओं का होकर भी मेरे अलावा बहुसंख्यक समाज में मेरे जैसों की दृष्टि में होती है । वह समय समग्र की पहचान नहीं । समय के एक छोटे से अंश की पहचान है । लेखक इसी अंश के सहारे उस समय-समग्र को देखने-परखते हुए लिखता चला जाता है । वह नहीं जानता कि  समय को कितनी समग्रता में देख-समझ पायेगा फिर भी वह लगातार लिखता-रचता चला जाता है । लेखन एक प्रकार से उसके लिए आत्मतोष उद्यम बन जाता है । सिर्फ इतना ही नहीं । वह आत्मप्रेरण एवं आत्मध्वनि है । आत्मप्रेरण इसलिए कि लेखन की उर्वरता सच्चे मायने आत्मउर्वरता है । आत्मध्वनि इसलिए क्योंकि वह आत्मा की निर्मल पुकार है । यूँ तो मनुष्य जीवन का बहुत सारा क्रियाकलाप अनात्म होकर भी कर सकता है । लेखन कदापि नहीं कर सकता है । अनात्म के लेखन में आत्ममुग्धता के अवसर भले ही मिल जाये आत्मशुद्धता का अवसर कभी नहीं । एक लेखक के रूप मेरी बहुधा यह प्रतीति रही है कि मेरी आत्मा मेरी कम औरों की ज्यादा हुआ करती है । जैसे वह अनेक ठाटों में निवसती है । वह नाम-वाम, रंग-रूप, जाति-प्रजाति, धरम-भरम की वर्जना और वर्जना से सर्वथा विमुक्त होती है । तभी वह किसी का न होते हुए भी चाहे किसी की पीड़ा को स्वयं महसूस लेती है । रोता कोई और है । आँसू आत्मा के आँखों में छलछला उठती हैं । लूटता कोई और है पर माथा वह पीटता है ।

हर कोई जानता-समझता है कि लिखना कबीर होना है । लिखना घर-घाट सब कुछ फूँक-फाँक कर भीतर के कबीर के साथ मचलते हुए चल निकलना है। माँ नीमा भी कबीर के मित्रों से कहती है तुम लोग जाओ, मेरा बेटा तो आंय-बांय-सांय कहता रहता है । वो तो बिगड़ गया है तुम मत बिगड़ो । कबीर होना दुनियादारों की नज़रों में बिगड़ना ही है । पर सच भी यही है कि दुनिया से बिगड़कर, रूठकर ही कोई कबीर बन पाता है । रच पाता है । पर इस रचने में दुनिया की जितनी भलाई हो सकती है शायद और किसी में नहीं । पर यह तभी संभव है जब कोई बेटा झट कह उठे

 

कबीरा बिगड़ गये राम दोहाई,

तुम झीन बिगड़ो मोरे भाई ।

पारस के जे लोहा छीयेला

बिगड़-बिगड़ के कुंदन होला ।

गंगा में जे नीर मिलेला

बिगड़-बिगड़ गंगोदक होला ।

कहत कबीर जे राम कहेला

बिगर-बिगर के राम ही होला ।

 

        बड़े-बड़े रचनाकारों की आत्मकथाओं से पता चलता है । इधर अब भी गाहे-बगाहे सुनने को मिल ही जाता है कि लेखन दुनिया के लिए भले ही वाह-वाह है पर अपने घर के लिए आह-आह । माँ-बाप की सर्वप्रमुख अभिलाषा होती है कि अगली आकाश छू ले । सितारों-सा दमके । सूरज- चाँद-सा जगमगाये । पर इस टूटपुंजिए रास्ते की ओर कतई न निहारे । अपनी इस छोटी-सी आयु में अपने आसपास को जितना मैं समझ सका हूँ उस अनुभव के आलोक में इतना तो कहा ही जा सकता है । मुझे तरस आता है कि एकाएक हमारे पूर्वजों को यह क्या हो गया ? वे भारतीय होकर भी इतने स्वार्थी कैसे हो गये ? जबकि वे सभी के सभी चाहते हैं कि समाज में राम की उपस्थिति बनी रहे । कृष्ण-बंसरी बजती रहे । वाह भई वाह । तुलसी जनमें । नानक जनमें । गाँधी भी जनमें । पर उसके घर में नहीं । पड़ोस के घर में । जाने ये कैसे माँ-बाप हैं जिनकी सबकी चाहत एक है कि उसकी अपनी संताने कुल का नाम रौशन करे । उपलब्धियों का आकाश छूएँ । वह सब बने । सब करे । पर रचनाकार न बने ।

 

    मैं तो इतना ही कहता हूँ- हर बार लेखक बनूँ । लिखने के लिए जनमूँ । और हर जनम में न मरने के लिए लिखूँ ।

 

 

 

 

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सैकड़ों हाथों से इकट्ठा करो और हजारों हाथों से बाँटो - अथर्व वेद

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

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