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मुद्दों का मुरब्बा |
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रविशंकर श्रीवास्तव |
जिस
तरह नेताओं को नेतागिरी करने व चुनावों
में जीतने
के लिए मुद्दों की तलाश रहती है,
उसी प्रकार
लेखकों को छपने के लिए और
छपकर पठनीय
होने
के लिए मुद्दों की तलाश रहती है
। ‘मुद्दे’
भारतीय राजनीति व
समसामयिक
लेखन के आवश्यक अंग हो गए हैं और इसीलिए आजकल हर कोई मुद्दों
को तलाशता
फिर रहा है
। हर
तरफ मुद्दों की मारामारी चल रही है। जैसे ही कोई उपयोगी– यूजेबल
मुद्दा
दिखाई देता है,
लोग झपट पड़ते
हैं अपनाने को
। किसी के हाथ कोई मुद्दा पहले
लग जाता
है किसी के हाथ कोई. जिसके हाथ पहले मुद्दा आता है उसके तो मजे
हो जाते
हैं,
पर पहले वाला कोई
हाथ मलते नहीं बैठा रहता
। वह उस मुद्दे की अहमियत समझते
बूझते हुए
भी उसको सिरे से नकार देता है –
कहता है,
यह भी कोई मुद्दा
है? यह
कभी
कोई मुद्दा नहीं
रहा. या फिर वह कहता है –
यह मुद्दा तो कब
का मर खप चुका! फिर वो
अपने मुद्दे को
जो सप्रयास या अकस्मात् अनायास उसे प्राप्त हुआ होता है,
महिमा
मंडित
करता फिरता है
। कारण कि उस मुद्दे में उसे सफलता की वैतरणी पार
करने की असीम
संभावनाएँ दिखाई
देती हैं । अब यह अलग बात है कि संभावना और वास्तविकता में अंतर
कितना
क्या होता है. और
अकसर लोग इसे
नज़रंदाज़ कर ही देते हैं
।
जैसा कि जाहिर है,
मुद्दे हैं बहुत
ही कम
और उनको तलाशने
वाले,
उनका इस्तेमाल करने वाले हैं ज्यादा –
बहुत ज्यादा
।
इसीलिए
लोग ‘मुद्दाहीन’,
‘अनर्थक’,
‘अप्रासंगिक’
बातों में से भी
ढूढ ढांढ कर मुद्दों को
तलाश ही लेते
है । और,
अकसर भारी भरकम हिसाब-किताब और आम जनता के लिए वास्तविक
मुद्दा
बनने की क्षमता रखने वाला मुद्दा राजनेताओं के लिए ग़ैर जरूरी,
बिनामतलब का,
बेकार हो जा जाता
है । कारण यह कि उस मुद्दे से एक आम आदमी का सारोकार तो हो सकता
है,
स्थापित नेताओं
लेखकों का नहीं ।
क्योंकि उन
मुद्दों में वोट खींचने की
क्षमता,
लोगों का और
मीडिया का ध्यान खींचने की क्षमता नगण्य सी होती है
। ऐसे
मुद्दों
में ग्लैमर भी नहीं होता,
जिस पर कुछ लिखा
जा सके और लिख भी दिया तो पढ़ा
जा सके
। एक
ताजातरीन उदाहरण - पेट्रोल के भाव प्रतिलीटर दो रुपए क्या बढ़े,
सबको
मुद्दा
मिल गया. सबने चिल्ल-पों मचाई। हड़ताल से लेकर बंद-धरना तक हुए
और
अर्थव्यवस्था पर
लेख लिखे गए टीवी पर लाइव बहसें हुईँ. परंतु बाजार में गेहूं
का
भाव प्रतिकिलो
3 से
4 रुपए तक
बढ़ चुका है
। वह कोई मुद्दा ही नहीं हुआ. आम जनता तो
पिसती रहे,
पर इस मुद्दे में
कोई ग्लैमर नहीं है. सरकार पीडीसी में घुन लगे,
अखाद्य
किस्म के
गेंहू के भाव तो स्थिर रखे है !
मुद्दे अगर विवादास्पद हों तो उनमें लोगों
का ध्यान
खींचने की क्षमता जरा ज्यादा ही होती है
। इसीलिए आजकल सीधे-सरल
मुद्दों को
भी विवादास्पद
बना दिया जाता है
। विवादास्पद मुद्दों से जुड़े नेता-अभिनेता
और लेखक
स्वयं विवादास्पद
हो जाते हैं और इस तरह उनकी मार्केट वेल्यू बढ़ जाती है,
वे
ज्यादा
प्रसिद्ध हो जाते हैं
। प्रसिद्ध होकर प्रतिष्ठित और सफल हो
जाते हैं. आखिर
एक नेता और एक
लेखक को अंतिम रूप से और क्या चाहिए?
प्रसिद्धि और
सफलता. डॉन ब्राउन
का उदाहरण लीजिए
–
दा-विंची की काल्पनिक कथा में अगर वह ईसा के विवादास्पद जीवन
चरित्र का
प्रकरण नहीं डालते तो क्या उनका उपन्यास इतना प्रसिद्ध होता?
नहीं
। आमिर
इसीलिए
अपनी फ़िल्म की रिलीज के पहले विवादास्पद नर्मदा नदी में कूदते
दिखाई देतेहैं.
वैसे भी,
आजकल मुद्दों का
विवादास्पद होना
जरूरत की श्रेणी
में आ चुका है
। मुद्दे अगर विवादास्पद न हुए तो फिर वे मुद्दे
कैसे
हो गए?
और आजकल तो लोग
सत्य और वास्तविक मुद्दों से दूर भागने लगे हैं
। उनसे कोई
सरोकार
नहीं रखना चाहते. आखिर इनसे उनका कोई भला तो होने वाला नहीं
।
लोगों को तो
ऐसे असत्य एवं
काल्पनिक मुद्दों की तलाश रहती है जिसके सहारे वे अपनी मंजिल
को पा
सकें. कई बार
बनावटी,
क्रिएटेड या जबरदस्ती पैदा किए गए मुद्दे उछाले जाते हैं-
सफलता के
सपनों से पगे हुए
।
कुछ राजनीतिक मुद्दे सर्वकालिक होते हैं.
यानी ऐसे
मुद्दे जिन्हें बार-बार,
जब चाहे तब अपनी
सुविधानुसार उछाला जा सकता है
।
बार-बार ऐसे
मुद्दों को हथियार बनाया जाता है,
परंतु उन मुद्दों
को हल करने के बारे
में कोई भी कभी
भी गंभीर नहीं होता
। क्योंकि अगर ऐसे ज्वलंत मुद्दे हल हो जाएँ
तो
भविष्य के लिए
बचेगा क्या?
ऐसे कई उदाहरण
हैं –
भारत में गरीबी,
अशिक्षा,
सामाजिक
न्याय
जैसे मुद्दे सदियों पुराने हैं,
सदियों तक जारी
रहेंगे और समय समय पर इन
मुद्दों को हल
करने के नए-नए नायाब तरीके राजनेताओं द्वारा पेश किए जाते रहे
हैं.
परंतु सबको पता
है इन मुद्दों को हल करने के प्रयास संजीदगी से नहीं किए गए
।
जब भी
इन मुद्दों को
उछाला गया,
तात्कालिक लाभ
लेने और चुनावी रणनीति बनाने के लिए उछाला
गया. और,
यही कारण है कि
ये ज्वलंत मुद्दे आज भी न केवल बरकरार हैं,
बल्कि विकराल
रुप धारण
करते जा रहे हैं
। राजनेताओं को और क्या चाहिए?
मुद्दे,
ज्वलंत,
चिरकाल तक
हल न हो
सकने वाले,
सदा-हरित मुद्दे
।
वर्तमान समय में पर्यावरण,
प्रदूषण,
पेटा (जानवरों
पर अत्याचार रोको अभियान) इत्यादि ऐसे कई चिरकालिक मुद्दे
सामने आए हैं जो
सदियों तक लोगों
की मुद्दा संबंधी समस्याओं को हल करता चलेगा
।
इसी तरह कुछ साहित्यिक मुद्दे भी सर्वकालिक
होते हैं.
कुछ मुद्दे हैं जिन पर सदियों से लिखा जा रहा है और भविष्य में
भी लिखा
जाता रहेगा. एक
लेखक या स्तंभकार,
अगर वह रोमानी
हुआ, तो
प्रेम-प्यार और वफा-बेवफा
को अपना मुख्य
मुद्दा बनाकर लिखता है
। अपनी संघर्षशीलता के दिनों में थक हारकर
या तो
वह हास्य-व्यंग्य
लिखकर अपने ऊपर और अपनी असफलताओं पर हंसता है या फिर
क्रांतिकारी
होकर वीरता की
बातें,
समाज को बदलने की बातें लिखता है. हास्य-व्यंग्य लेखन के लिए
सर्वकालिक
मुद्दा बीवी –
और बेलन तो है
ही ।

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