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ग़ालिब की हाज़िरजवाबी व विनोदवृति |
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प्रदीप कुमार शर्मा |
गोरे की क़ैद-काले की क़ैद
ग़ालिब
के समय एक हज़रत मुहम्मद नसीरुद्दीन काले साहब हुआ करते थे । अपनी विद्वता एवं उच्चारण के लिए मशहूर । वे बहादुर शाह के शेख
और मौलाना फ़खरुद्दीन क़दससिरा के पोते थे । क़िले से मिर्जा
ग़ालिब का जो संबंध बना था वह इन्हीं के कारण बना था । वे
मिर्ज़ा से बहुत चाहते थे । जब मिर्ज़ा जेल से छूटे तो काले
साहब सीधे अपने घर ले गये और अरसे तक ऐशोआराम की सुविधाएँ
मुहैया करायीं ।
एक रोज़ मियां मिर्ज़ा काले साहब के पास बैठे गपशप मार
रहे थे । इतने में किसी ने आकर उन्हें क़ैद से छूटने की
मुबारकबाद देने लगा । मिर्ज़ा भला कब चूकनेवाले थे । झट बोल
उठे- “कौन
भ़ड़ुआ क़ैद से छूटा है
?
पहले गोरे की क़ैद में था, अब काले की क़ैद में हूँ ।”
  
पुल्लिंग या स्त्रीलिंग
शब्दों को लेकर मिर्ज़ा ग़ालिब के कई लतीफ़ा प्रसिद्ध हैं ।
उनमें से एक प्रस्तुत है । दिल्ली में
‘रथ’
को कुछ लोग स्त्रीलिंग और कुछ लोग पुल्लिंग मानते थे । किसी ने
मिर्ज़ा से एक बार पूछा कि
“हज़रत
रथ मोअन्नस (स्त्रीलिंग) है या मुज़क्कर (पुल्लिंग) है?”
मिर्ज़ा तपाक से बोले-
“भैया,
जब रथ में औरतें बैठी हो तो उसे मोअन्नस कहो और जब मर्द बैठे
हों तो मुज़क्कर समझो ।”
  
आधा मुसलमान हूँ
अपनी
हाज़िरजवाबी और विनोदवृत्ति के कारण मिर्ज़ा जहाँ कई बार
कठिनाईयों में फँस जाते थे वहीं कई बार बड़ी-बड़ी मुसीबतों से
बच निकलते थे ।
ग़दर के दिनों की बात है । उन दिनों का माहौल ऐसा था कि
अँगरेज़ सभी मुसलमानों को शक की नज़र से देखते थे । दिल्ली
लगभग मुसलमानों से खाली हो गयी थी । पर ग़ालिब थे कि वहीँ
चुपचाप अपने घर में पड़े रहे । आखिर एक दिन कुछ गोरे सिपाही
उन्हें भी पकड़कर कर्नल ब्राउन के पास ले गये । जब ग़ालिब को
कर्नल के सम्मुख उपस्थित किया गया मिर्ज़ा के सिर पर ऊँची टोपी
थी । वेशभूषा भी अजब थी । कर्नल ने मिर्ज़ा की यह सजधज देखी तो
पूछा- “वेल
टुम मुसलमान ?”
मिर्ज़ा ने कहा- “आधा
।”
कर्नल से पूछा- “इसका
क्या मटलब है ?”
मिर्ज़ा बोले- “मतलब
साफ है,
शराब पीता हूँ, सुअर नहीं खाता ।“
कर्नल सुनकर हँसने लगा और हँसते-हँसते मिर्ज़ा को घर लौटने की
इजाजत दे दी ।
  
तुम सौदाई हो
बात
एक गोष्ठी की है । मिर्ज़ा ग़ालिब मशहूर शायर मीर तक़ी मीर की
तारीफ़ में कसीदे गढ़ रहे थे । शेख इब्राहीम
‘जौक’
भी वहीं मौज़ूद थे । ज़ौक की मिर्ज़ा से कुछ ठस रहती थी ।
ग़ालिब जो भी कहते वे उसे काटने की फ़िराक में रहते थे । अक्सर
दोनों में छेड़छाड़ चलती रहती थी । ग़ालिब द्वारा मीर की
तारीफ़ सुनकर वे बैचेन हो उठे । उन्होंने सौदा नामक शायर को
श्रेष्ठ बताने लगे । मिर्ज़ा ने झट से चोट की-
“
मैं तो तुमको मीरी*
समझता था मगर अब जाकर मालूम हुआ कि आप तो सौदाई*
हैं ।”
*
मीरी और सौदाई दोनों में श्लेष है । मीरी का मायने मीर का
समर्थक होता है और नेता या आगे चलने वाला भी । इसी तरह सौदाई
का पहला अर्थ है सौदा या अनुयायी, दूसरा है- पागल ।
  
ख़ुदा या आप
बात उन दिनों की है जब रामपुर के नवाब यूसुफ़ अली खाँ का
इंतकाल हो चुका था और नये नवाब क़लब अली खाँ गद्दी पर बैठ चुके
थे । मियां मिर्ज़ा मातमपुर्सी और नये नवाब के प्रति आदर प्रकट
करने के लिए रामपुर जा पहुँचे । उस दिन कलब अली लेफ्टिनेंट
गवर्नर से मिलने बरेली जा रहे थे । रवानगी के वक़्त, परंपरा का
ख़याल करते हुए मिर्ज़ा से उन्होंने कहा-
“
ख़ुदा के सुपुर्द ।”
मिर्ज़ा झट बोल उठे- “
हजरत !
ख़ुदा ने तो मुझे आपके सुपुर्द किया है । आप फिर उलटा मुझको
ख़ुदा के सुपुर्द करते हैं ।
”
सारे लोग हँस पड़े ।

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