fसंपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संस्मरण

अमेरिका में हिंदी भाषाः संस्मरण-नीरजा द्विवेदी

गये तब से कितने युग बीत-डॉ. बल्देव

ग़ालिब की हाज़िरजवाबी व विनोदवृति-प्रदीप कुमार शर्मा

 
 

अमेरिका में हिंदी भाषाः संस्मरण

नीरजा द्विवेदी

 

              ''टलांटा में यूनिवर्सिटी मे क्या हिंदी भी पढ़ाते हैं?''- मैने प्रश्न किया, तो नीलम ने बताया कि वहाँ एमरी युनिवर्सिटी में हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। अमेरिका की कई अन्य यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग हैं। बोस्टन यूनिवर्सिटी का हिंदी विभाग काफी प्रसिद्व है। शिकागो यूनिवर्सिटी में भी हिंदी की अच्छी पढ़ाई होती है। सौभाग्यवश उन्हीं दिनों अदिति को देखने श्रीमती मंजू तिवारी आईं। ज्ञात हुआ कि वह एमरी यूनिवर्सिटी में हिंदी की प्रोफ़ेसर हैं। वहाँ हिंदी की पढ़ाई मे मेरी उत्सुकता देखकर मंजू तिवारी ने यूनिवर्सिटी में मुझे बुलाकर अपने छात्र-छात्राओं से मेरा साक्षात्कार कराने की बात कही। उन्होंने अपने विभाग के प्रोफ़ेसर राकेश जी से बात की और समय तय कर दिया।

 

             अगली प्रात: साढे आठ बजे मंजू जी अपनी कार से मुझे लेने आ गईं। वह नीली डेनिम की नीची स्कर्ट पहने थीं और उन दिनों नवदुर्गा का व्रत रख रहीं थीं। अपने छरहरे बदन के कारण वह प्रोफ़ेसर कम और छात्रा अधिक लग रहीं थीं। रास्ते में मंजू जी ने बताया कि यूनिवर्सिटी के आसपास का इलाका इतना सुंदर है कि वहाँ ज़मीन की कीमत बहुत अधिक है। यूनिवर्सिटी के मेडिसिन विभाग, ला विभाग, एवं बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग बहुत प्रसिद्व हैं।

 

              पैंतालीस मिनट में हम यूनिवर्सिटी पहुँच गयीं। यूनिवर्सिटी की इमारतें सचमुच बहुत आर्कषक लगीं और वहाँ का वातावरण भी। आर्ट म्यूज़ियम भवन के सामने पहुँचकर मंजू मुझे कार से उतारकर अपनी कार पाकिंग में खडी करने चली गईं। मेरे दाहिनी ओर एमरी यूनिवर्सिटी पुलिस का निशान लगा हुआ था। मेरे पूछने पर मंजू ने बताया कि अमेरिका में सुरक्षा के लिये प्रत्येक यूनिवर्सिटी की अपनी पुलिस होती है। मंजू जी ने यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी की बिल्डिंग दिखाई जो अत्यंत भव्य थी। फिर वह मुझे कालअवे सर मेमोरियल बिल्डिंग ले गईं, जहाँ प्रोफ़ेसर्स के कार्यालय थे।

 

               एमरी यूनिवर्सिटी में सर्वप्रथम वर्ष 1994 में हिंदी और संस्कृत की शिक्षा देने का प्राविधान किया गया था- तब ये दोनों विषय रिलीजन डिपार्टमेंट के अंतर्गत रखे गये थे। हिंदी की प्रथम शिक्षिका मंजू जी ही आईं और कालांतर में राकेश जी की नियुक्ति हुई। संस्कृत पढ़ाने के लियें सर्वप्रथम विष्णु टेनबर्ग की नियुक्ति हुई थी। वह धर्मपरिवर्तन कर हिंदू बने थे। अब नई शिक्षिका नदीम आईं हैं, जिन्हें संस्कृत का विशद् ज्ञान है।

 

               अब हिंदी और संस्कृत दोनों विषयों की शिक्षा 'डिपार्टमेंट आफ़ ईस्टर्न एण्ड साउथ एशियन स्टडीज़' के अंतर्गत दी जाती है। इस विभाग में परशियन, हिब्रू, अरेबिक भाषाओं की शिक्षा का भी प्रावधान है। हिंदी भाषा की शिक्षा तीन स्तरों पर दी जाती है-

1.100 लेविल पर अक्षर ज्ञान कराया जाता है एवं 101 तथा 102 स्तर पर व्याकरण का ज्ञान कराया जाता है।

2.201 एवं 202 लेविल पर शीला वर्मा द्वारा लिखी गई पुस्तक 'माध्यमिक हिंदी पाठय पुस्तक' पढाई जाती है एवं विख्यात कहानीकारों की कहानियाँ पढाईं जातीं हैं। शीला वर्मा की पुस्तक में हिंदी का अंग्रेजी अनुवाद भी दिया गया है जिससे यहाँ के छात्रों को समझने में आसानी रहती है। 203 लेविल पर शीला वर्मा की पुस्तक उच्च हिंदी पाठयक्रम द्वारा शिक्षा दी जाती है।

3. 01 और 302 लेविल में शोध करने वाले छात्र आते हैं।

 

               अपने आफ़िस में कुछ देर तक बैठने के बाद मंजू जी मुझे लाइब्रेरी ले गईं। वहां रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने के उपरांत वह मुझे लेकर उपर के तल पर राकेश जी के छात्रों से मिलाने गईं। राकेश जी की कक्षा में प्रथम सत्र वाले छात्रा-छात्रायें थीं, जो भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अमेरिका आदि के निवासी थे। वे हिंदी ठीक से नहीं जानते थे और मंजू जी ने उनसे मेरा परिचय धीरे-धीरे हिंदी बोलकर कराया। उनके कहने पर मैंने एक अपनी सरल हिंदी की कविता उन्हें सुनाई। मुझे लग रहा था कि उन्हें वह कविता समझ में नहीं आ रही होगी और मेरे मस्तिष्क में बार-बार यही मुहावरा आ रहा था-'भैंस के आगे बीन बजाओ और भैंस खडी पगुराय'। मुझे आशंका थी कि कविता के बीच ही कुछ छात्र उसे समझ न पाने के कारण हंसने लगेंगे, परंतु गीत समाप्त होने पर सबने जब जोर से तालियाँ बजाईं तो मुझे सचमुच आश्चर्य हुआ। मंजू जी ने बताया कि वहां एक विदेशी भाषा एक वर्ष तक पढ़ना अनिवार्य है, अत: 100, 101 एवं 102 लेविल के पर्याप्त छात्र हिंदी पढ़ने आते हैं।

 

                201 एवं 202 लेविल के क्लास मंजू जी लेतीं थीं, जहाँ वह मुझे ले गईं। उनकी कक्षा में कुल पांच छात्र हैं परंतु उस दिन केवल दो ही उपस्थित थे। एक अमेरिकन श्वेत लड़की एलिजाबेथ थी जो मिशनरी कार्य करती थी और पूना में रह भी चुकी थी। वह भविष्य में जर्नलिस्ट बनना चाहती थी। दूसरा लड़का विकास था जो वकील बनना चाहता था। वह प्राय: दो वर्ष बाद भारत आता-जाता था। इन दोनों छात्रों को हिंदी अच्छी तरह समझ में आ रही थी और वे पढ़ भी लेते थे, परंतु बोलने में धीरे धीरे सोच सोच कर बोलते थे। एलिज़ाबेथ ने मुझसे प्रश्न किया- ' आप किस उद्देश्य से लिखतीं हैं?' विकास ने भी मेरे लेखन के विषय में उत्सुकता प्रकट की, तो मैंने उन्हें बताया-' मैने समाज में और विशेष रूप से मघ्यम एवं निम्न वर्ग की स्त्रियों में जागरूकता लाने के अभिप्राय से लिखना प्रारम्भ किया था। भारतीय परिवारों में यह प्रथा थी कि पति या पिता जो कुछ भी कहे, उसे आँख मूंदकर स्वीकार करना है चाहे वह कितना भी अन्यायपूर्ण क्यों न हो। मेरी कहानियों के स्त्री पात्र ग़लत बात का विरोध कर उचित को स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं।'' मुझे इन दो छात्रों  से मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई और मुझे लगा कि उन्हें भी हुई।

 

                 डेढ़ बजे मैं मंजू जी के साथ उनके आफ़िस पहुँची। पी. एच ड़ी क़रने वाले दो छात्रों को उन्होंने अपने आफ़िस में ही बुला रखा था। पहले लूक नामक अमेरिकन युवक मिला। उसने अपने परिचय में बताया कि उसके पिता कारपेंटर हैं। वह संस्कृत में शोध कर रहा है और कई बार भारत जा चुका है- बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, हरिद्वार, काशी, रामेश्वरम, तिरुपति, मदुरई आदि तीर्थस्थानों का भ्रमण कर चुका है। उसके शोध का विषय है- भारतीय तीर्थस्थानों में यात्रीगण जो फोटो अथवा मूर्ति क्रय करते हैं, वे उस तीर्थस्थल की होती हैं या अन्य देवी देवताओं की होती हैं।' मुझे उसका शोध का विषय ज्ञात कर बड़ा आश्चर्य हुआ। दूसरा छात्र पीटर था जो संस्कृत में शोध कर रहा था- बाल्मीकि रामायण के अंग्रेजी-अनुवाद को अथवा डिक्शनरी के माध्यम से पढ़ता था। लूक ने मुझसे प्रश्न किया कि आजकल आप क्या लिख रहीं हैं? मैने बताया- 'अमेरिका में रहकर यहाँ के संस्मरण लिख रही हूं।' उसे संस्मरण शब्द का अर्थ समझाना पड़ा। फिर पीटर एवं लूक दोनो ने पूछा-'यहाँ किस-किस बात ने आप को विशेष प्रभावित किया है?' मैने कहा-' यहाँ पर किसी काम को छोटा-बडा या ऊँचा-नीचा नहीं समझा जाता है, पैसे वाले लोगों के बच्चे कोई भी काम करके पैसा कमाने मे शर्म नहीं महसूस करते हैं, और अपनी शिक्षा तक के लिये पूर्ण रूप से माता-पिता पर निर्भर रहने के बजाय स्वावलम्बी बनना पसंद करते हैं। ये बातें मुझे बहुत अच्छी लगीं।'

 

                 लूक और पीटर दोनों मेरी पुस्तकें देखकर बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने प्रश्न किया- 'आप के लिखने का उद्देश्य क्या है?' मैने बताया-' मैं घरेलू स्त्रियों में जागरूकता लाने और समाज की विसंगतियाँ को दूर करने के उद्देश्य से लिखती हूं।' तब लूक ने पूछा-' कहानी के विषय कहाँ से चुनतीं है?' मैने बताया कि मेरी कहानियों का आधार प्राय: सत्य घटनायें होतीं हैं, मैं उन्हें रोचक एवं उद्देश्यपरक ढंग से प्रस्तुत करनें का प्रयत्न करती हूं।' तब पीटर ने पूछा -' क्या आप को किसी से रेस्पौंस मिलता है?' मैने बताया-' हाँ, स्त्रियों ओर विशेषकर छात्राओं से बहुत सराहना मिली हैं- उनमें कइयों में जागरूकता भी आई है।' कुछ कहानियों के विषय में भी संक्षेप में चर्चा हुई। दोनों छात्र मुझसे बातकर बहुत प्रसन्न दिखे- विशेषकर लूक।

 

                 ढाई बजे मंजू जी मुझे लेकर राकेश जी के आफ़िस में पहुँची। मैंने उन्हें एवं मंजू जी को अपनी कविताओं का कैसेट 'गुनगुना उठे अधर' एवं कहानी संग्रह 'मानस की धुंध' की एक एक प्रति भेंट की। हिंदी विभाग के लिये मैंने अपनी पुस्तक 'दादी माँ का चौरा', 'कालचक्र से परे', ' मानस की धुंध' 'निष्ठा के शिखर बिंदु', 'अशरीरी संसार', 'एवं 'गुनगुना उठे अधर' भेंट की।

 

                मंजू जी पौने तीन बजे मुझे घर छोड़ने आईं। रास्ते में उन्होंने मुझे बताया कि शुक्रवार को उनके यहाँ अन्तवानेत नाम की अमेरिकन लड़की रामायण पढ़ने आती है। उसने अपना नाम अनीता रख लिया हैं। वह काशी के किसी आश्रम में साध्वी बनकर रहना और शोध करना चाहती है ।

 

                मंजू के आफ़िस से निकलते समय मेरी दृष्टि पार्क पर गई जहाँ कन्वोकेशन की तैयारी चल रही थी। वहाँ बनने वाले पंडाल से निकलकर एक काला जैकेट, काला पैंट पहिने और मुख पर कंकाल का काला मुखौटा लगाये हुए व्यक्ति दिखाई दिया। मुझे यह देखकर ज़रा अटपटा लगा । मैने उसकी ओर मंजू का घ्यान आकृष्ट किया तो पता चला कि यूनिवसिटी के डीन व वाइस प्रेसीडेंट अपने स्टाफ़ में से किसी व्यक्ति का चयन करते हैं जो मास्क पहने हुए हर कक्षा में जाता है और वहाँ की पढाई और शिक्षकों के पढ़ाने के ढंग का आकलन करता है। एक-एक शीट हम लोग छात्र छात्राओं को भी देते हैं, वे भी शिक्षकों का आकलन कर उन्हें अंक देते हैं। ' 6 अंक तक साधरण समझे जाते हैं, 7 8 अंक अच्छे समझे जाते हैं और 9 10 बहुत अच्छे समझे जाते हैं। यहाँ हिंदी की शिक्षा देने के लिये फ़िल्मों को भी माध्यम बनाया जाता है। भारतीय त्यौहार एवं संस्कृति से संबंधित फ़िल्म दिखाकर छात्रों से उन पर प्रश्न किये जाते हैं।

 

                 मंजू जी ने बताया कि पाल कौर्टराइट नामक प्रोफ़ेसर जो वहाँ हिंदुइज्म पढ़ाते हैं, ने गणेश जी पर 'गणेश' नामक एक विवादास्पद पुस्तक लिखी है। उस पुस्तक में गणेश, शिव पार्वती के सम्बंधों में निराधार एवं अश्लील बातें लिखीं गईं हैं। फ्रायड के मनोविज्ञान को आधार बनाकर अनर्गल बातें लिखकर हिंदू धर्म को कलंकित करने का प्रयत्न किया गया है। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता एवं अन्य हिंदू संस्थायें इस पुस्तक को प्रतिबंधित कराने का प्रयत्न कर रहीं हैं।

 

                    मुझे छोड़कर मंजू जी जाने लगीं तो मैने उन्हें धन्यवाद कहा। दूसरे देश में अपनी मातृभाषा पढ़ाये जाने की अनुभूति कितनी सुखद है और विदेशियों को अपनी भाषा बोलते देख कितनी प्रसन्नता होती है, यह मै व्यक्त नहीं कर सकती हूं ।

 

 

 

संस्मरण

घर में मेल होना पृथ्वी पर स्वर्ग के समान है - टॉलस्टाय

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com