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मीडिया में
देहराग |
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संजय द्विवेदी |
औरत
की देह इस समय मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है । सेक्स और
मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों
को शीर्षीसन करवा दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी
चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट
मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए
‘प्लेबाय’
या ‘डेबोनियर’
तक सीमित था अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में
अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही
नहीं खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का
कैटवाग खासी जगह घेरा रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घंटे के
चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर
जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के
माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक
जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति
दी है। एक आंकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अशअलीलता का कारोबार भी
पांच सालों में 5अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा ।
इस पूरे वातावरण को इलेक्ट्रानिक टीवी चेनलों ने आँधी
में बदल दिया है। प्रिंट मीडिया अब इससे होड़ ले रहा है।
इंटरनेट ने सही रूप में अपने व्यापक लाभों के बावजूद सबसे
ज्यादा फायदा सेक्स कारोबार को पहुँचाया । पूंजी की ताकतें
सेक्सुएलिटी को पारदर्शी बनाने में जुटी है। मीडिया इसमें उनका
सहयोगी बना है, अश्लीलता और सेक्स के कारोबार को मीडिया किस तरह
ग्लोबल बना रहा है इसका उदाहरण विश्व कप फुटबाल है। मीडिया
रिपोर्ट से ही हमें पता चला कि जर्मनी के तमाम वेश्यालय इसके
लिए तैयार हैं और दुनिया भर से वेश्याएं वहाँ पहुंच रही है। कुछ
विज्ञापन विश्व कप के इस पूरे उत्साह को इस तरह व्यक्त करते है
‘मैच
के लिए नहीं, मौज के लिए आइए’
। जाहिर है मीडिया ने हर मामले को ग्लोबल बना दिया है। हमारे
‘गोपन
विमर्शों’
को’ओपन’
करने में मीडिया का एक खास रोल है। शायद इसीलिए मीडिया के
कंधों पर सवार यह सेक्स कारोबार तेजी से ग्लोबल हो रहा है।
महानगरों में लोगों की सेक्स हैबिट्स को लेकर भी
मुद्रित माध्यमों में सर्वेक्षण छापने की होड़ है । वे छापते
हैं 80 प्रतिशत महिलाएं शादी के पूर्व सेक्स के लिए सहमत हैं ।
दरअसल यह छापा गया सबसे बड़ा झूठ हैं । ये पत्र-पत्रिकाओं के
व्यापार और पूंजी गांठने का एक नापाक गठजोड़ और तंत्र है ।
सेक्स को बार-बार कवर स्टोरी का विषय बनाकर ये उसे रोजमर्रा की
चीज बना देना चाहते हैं । इस षड़यंत्र में शामिल मीडिया बाजार
की बाधाएं हटा रहा है। फिल्मों की जो गंदगी कही जाती थी वह शायद
अचना नुकसान न कर पाए जैसा धमाल इन दिनों मुद्रित माध्यम मचा
रहे हैं । कामोत्तेजक वातावरण को बनाने और बेचने की यह होड़
कम होती नहीं दिखती । मीडिया का हर माध्यम एक-दूसरे से आगे
निकलने की होड़ में है। यह होड़ है नंगई की । उसका विमर्श
है-देह
‘जहर’
‘मर्डर’
‘कलियुग’
‘गैगस्टर’
‘ख्वाहिश’,
‘जिस्म’
जैसी तमाम फिल्मों ने बाज़ार में एक नई हिंदुस्तानी औरत
उतार दी है । जिसे देखकर समाज चमत्कृत है। कपड़े उतारने पर
आमादा इस स्त्री के दर्शन के दर्शन ने मीडिया प्रबंधकों के
आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया है। एड्स की बीमारी ने पूंजी के
ताकतों के लक्ष्य संधान को और आसान कर दिया है । अब सवाल
रिश्तों की शुचिता का नहीं, विश्वास का नहीं, साथी से वफादारी
का नहीं- कंडोम का डै । कंडोम ने असुरक्षित यौन के खतरे को एक
ऐसे खतरनाक विमर्श में बदल दिया है जहाँ व्यवसायिकता की हदें
शुरू हो जाती है।
अस्सी के दशक में दुपट्टे को परचम की तरह
लहराती पीढ़ी आयी, फिर नब्बे का दशक बिकनी का आया और अब सारी
हदें पार कर चुकी हमारी फिल्मों तथा मीडिया एक ऐसे देह राग में
डूबे हैं जहां सेक्स एकतरफा विमर्श और विनिमय पर आमादा है।
उसके केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का
उपहरण । सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद
इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता
है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं । यह बाजारवाद
अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है-निशाना भारतीय औरतें हैं
। भारतीय स्त्री के सौंदर्य पर विश्व का अचानक मुग्ध हो जाना,
देश में मिस युनीवर्स, मिस वर्ल्ड की कतार लग जाना-खतरे का
संकेतक ही था। हम उस षड़यंत्र को भांप नहीं पाए । अमरीकी बाजार
का यह अश्वमेघ, दिग्विजय करता हुआ हमारी अस्मिता का अपहरण कर
ले गया ।
इतिहास की इस घड़ी में हमारे पास साइबर कैफे हैं, जो
इलेक्ट्रानिक चकलाघरों में बदल रहे हैं । हमारे बेटे-बेटियों
के साइबर फ्रेंड से अश्लील चर्चाओं में मशगूल हैं । कंडोम के
रास्ते गुजर कर आता हुआ प्रेम है । अब सुंदरता परिधानों में
नहीं नहीं उन्हें उतारने में है। कुछ साल पहले स्त्री को सबके
सामने छूते हाथ कांपते थे अब उसे चूमें बिना बात नहीं बनती ।
कैटवाक करते कपड़े गिरे हों, या कैमरों में दर्ज चुंबन
क्रियाएं, ये कलंक पब्लिसिटी के काम आते हैं । लांछन अब इस दौर
में उपलब्धियों में बदल रहे हैं ।
‘भोगो
और मुक्त हो,’
यही इस युग का सत्य है। कैसे सुंदर दिखें और कैसे
‘मर्द’
की आंख का आकर्षण बनें यही पहिला पत्रकारिता का मूल विमर्श है
। जीवन शैली अब
‘लाइफ
स्टाइल’
में बदल गया है । बाजारवाद के मुख्य हथियार
‘विज्ञापन’
अब नए-नए रूप धरकर हमें लुभा रहे हैं । नग्नता ही स्त्री
स्वातंत्र्य का पर्याय बन गयी है। मेगा माल्स, ऊँची ऊँची
इमारतें, डियाइनर कपड़ों के विशाल शोरूम, रातभर चलने वाली मादक
पार्टियां और बल्लियों उछलता
नशीला उत्साह । इस पूरे परिदृश्य
को अपने नए सौंदर्यबोध से परोसता, उगलता मीडिया एक ऐसी दुनिया
रच रहा है जहाँ बज रहा है सिर्फ देहराग, देहराग और देहराग ।

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