प्रतिभा
|
हिन्दी
कविताओं
का
कोश
क्यों
नहीं
बनाया
जा
सकता? |
|
सृजन गाथा |
प्रिंट
की दुनिया में सैकड़ो वर्ष रहने के बाद भी हिंदीवाले अब तक
अपनी भाषा में अपनी कविताओं का विश्वकोष नही बना सके । पर
ई-प्रौद्योगिकी के कारण यह अब संभव व सरल प्रतीत होने लगा है ।
जी हाँ, इस ऐतिहासिक कार्य को अंजाम देने का विश्वसनीय पहल
प्रिंट मीडिया में नहीं तो कम से कम वेब
मीड़िया में शुरू हो चुकी है और इस खुली परियोजना के सूतत्रधार
हैं - युवा हिंदीसेवी और अंतरजाल विशेषज्ञ ललित कुमार। वह दिन
दूर नहीं जब समूचा विश्व पलक झपकते ही अपने प्रिय और किसी भी
हिंदी कवि की कविताएँ इस विश्वकोष में पढ़ सकेगा । इस
क्रांतिकारी कदम के वंदनीय पहलकर्ता
ललित
कुमार
का
जन्म
१६
अगस्त
१९७६
को
नई
दिल्ली,
भारत
में
हुआ
जहाँ
संयुक्त
परिवार
की
भारतीय
संस्कृति
में
उनका
पालन
पोषण
हुआ।
स्थानीय
नगर
निगम
के
स्कूलों
की
पढाई
पूरी
करने
के
बाद
उन्होंने
जीव-विज्ञान
में
स्नातक
की
उपाधि
अर्जित
की।
कम्प्यूटर
विज्ञान
में GNIIT
किया
और
सॉफ़्ट्वेयर
और
इंटरनैट
के
क्षेत्र
में
कुछ
निजी
कम्पनियों
में
भारत
में
काम
किया।
इस
समय
वे
संयुक्त
राष्ट्र
में
सूचना
प्रोद्योगिकी
विशेषज्ञ
के
तौर
पर
कार्य
कर
रहे
हैं।
प्रस्तुत है उनसे हुई चर्चा के अँश
:-
ललित,
आपके
मन
में
कविता
कोश
की
संस्थापना
का
विचार
कैसे
आया,
वह
भी
अंतरजाल
पर,
जो
प्रिंट
मीडिया
से
कहीं
ज्यादा
जटिल
और
तकनीकी
ज्ञान
आधारित
है ?
और
इसलिए
चुनौतीपूर्ण
भी ?
-हिन्दी
साहित्य,
और
विशेषकर
हिन्दी
काव्य
में
मेरी
गहरी
रूचि
है।
अक्सर
अंतरजाल
पर
गूगल
इत्यादि
की
सहायता
से
मैं
हिन्दी
कविताओं
को
खोजता
रहता
था।
बहुत
बार
ऐसा
होता
था
कि
काफ़ी
समय
तक
खोजने
के
बावजूद
मुझे
वो
कविता
नहीं
मिल
पाती
थी
जो
मुझे
चाहिये
होती
थी।
फिर
अक्सर
ऐसा
भी
होता
था
कि
किसी
दिन
अचानक
वही
कविता
मुझे
किसी
जालस्थल
पर
अनचाहे
ही
मिल
जाती
थी!
सो
मैंने
पाया
कि
अंतरजाल
पर
बहुत
सा
हिन्दी
काव्य
पहले
से
ही
उपलब्ध
है -परंतु
वह
सब
बिखरा
हुआ
है।
कुछ
रचनाएँ
आपको
यहाँ
मिलेंगी
तो
कुछ
वहाँ।
सैंकड़ों
की
संख्या
में
हिन्दी
काव्य
से
संबंधित
ब्लॉग्स
हैं,
जालस्थल
हैं,
ई-पत्रिकाएँ
हैं,
समूह
हैं।
इनमें
से
हर
एक
के
पास
रचनाओं
का
अपना-अपना
हिस्सा
है।
परंतु
कोई
भी
एक
ऐसी
जगह
अंतरजाल
पर
मुझे
नहीं
मिली
जहाँ
किसी
रचना
की
खोज
में
इस
विश्वास
के
साथ
जाया
जा
सके
कि
वह
रचना
वहाँ
मिल
जाएगी। मैनें
सोचा
कि
यदि
एक
ऐसा
जालस्थल
हो
तो
अंतरजाल
पर
हिन्दी
काव्य
की
खोज
करने
वाले
लोगो
को
बहुत
सुविधा
हो
जाएगी।
इसी
सोच
का
परिणाम
कविता
कोश
(
http://hi.literature.wikia.com )
के
रूप
में
आज
आपके
सामने
है।
यह
सही
है
कि
अंतरजाल
पर
कविता
कोश
जैसी
परियोजना
शुरु
करने
के
लिये
इससे
सम्बंधित
तकनीक
की
जानकारी
का
होना
आवश्यक
है।
इस
तरह
की
परियोजना
का
कार्यान्वयन
और
भी
चुनौतीपूर्ण
हो
जाता
है
क्योंकि
अंतरजाल
पर
हिन्दी
भाषा
में
लिख
सकने
में
सक्षम
लोग
अभी
भी
अपेक्षाकृत
बहुत
कम
संख्या
में
है।
इन
सब
कठिनाइयों
के
होते
हुए
भी
अंतरजाल
कविता
कोश
जैसी
विशाल
परियोजना
के
लिये
एक
बहुत
उपयुक्त
माध्यम
है।
अंतरजाल
से
करोड़ों
लोग
जुड़े
हैं
और
इस
माध्यम
पर
सूचना
का
आदान-प्रदान
बहुत
शीघ्रता
से
होता
है।
हम
सभी
अंतरजाल
पर
उपलब्ध
खुले
विश्वकोश,
विकीपीडिया
के
विकास
और
सफलता
के
बारे
में
जानते
हैं।
विकीपीडिया
इतना
विशाल
कोश
इसीलिये
बन
सका
क्योंकि
अंतरजाल
से
जुडे
विश्व
भर
के
लोग
इसके
विकास
में
अपना
योगदान
देते
हैं।
कविता
कोश
की
स्थापना
के
समय
मेरे
मन
में
विकीपीडिया
की
सफलता
भी
थी।
अंतरजाल
पर
यदि
एक
पूरा
विश्वकोश
लाखों
लोगों
के
योगदान
से
इतने
कम
समय
में
बनाया
जा
सकता
है
तो
हिन्दी
कविताओं
का
कोश
क्यों
नहीं
बनाया
जा
सकता?
हर
व्यक्ति
यदि
इसमें
यथायोग्य
योगदान
देता
रहेगा
तो
कविता
कोश
रोज़
नई
ऊँचाईया
छुएगा।
बूँद-बूँद
से
घट
भरता
है।
हिंदी
साहित्य
का
इतिहास
गवाह
है :
सबसे
ज्यादा
कविता
ही
लिखी
जाती
है
।
और
प्रकाशन
के
मामले
में
भी
वह
अन्य
विधाओं
के
बनिस्बत
अव्वल
रहती
आ
रही
है
पर
विडम्बना
देखिए
कि
अब
तक
हिंदी
कविता
का
समग्र
कोश
प्रकाशित
करने
का
साहस
किसी
ने
नहीं
दिखाया
है
।
इस
वास्तविकता
के
बावजूद
आपका
यह
उद्यम
किस
बुनियाद
और
किस
रणनीति
पर
ऐतिहासिक
सफलता
को
स्पर्श
करेगा?
जरा
विस्तारपूर्वक
बतायें।
-मैं
यह
तो
नहीं
कह
सकता
कि
आज
तक
हिन्दी
कविताओं
का
कोश
बनाने
का
यत्न
अब
से
पहले
किसी
ने
नहीं
किया
तो
उसके
क्या
कारण
रहे
होंगे।
किन्तु
समय
बदलता
रहता
है
और
बदलते
समय
के
साथ
मानव
जाति
नई
नई
तकनीकों
का
अविष्कार
करती
रहती
है।
आज
अंतरजाल
की
सुविधा
हमारे
दैनिक
जी |