नवगीत
साड़ी-टाई बदलें, या ये घर बदलें
जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने
दादी की हंसुली ने, माँ की पायल ने
उस कच्चे घर की सच्ची दीवारों पर
मेरी टाई टंगने से कतराती है ।
माँ को और पिता को यह कच्चा घर भी
एक बड़ी अनुभूति, मुझे केवल घटना,
यह अंतर ही संबंधों की गलियों में
ला देता है कोई निर्मम दुर्घटना,
जिन्हें रंगा जलते दीपक के काजल ने
बूढ़ी गागर से छलके गंगाजल ने
उन दीवारों पर टंगने से पहले ही
पत्नी के कर से साड़ी गिर जाती है ।
जब से युग की चकाचौंध के कोहरे ने

छीनी है आँगन से नित्य दीया-बाती,
तब से लिये आँगनों से, दीवारों से
बंद नाक को सोंधी गंध नहीं आती,
जिसे चिना था घुटनों तक की दलदल ने
सने-पुते झीने ममता के आंचल ने
पुस्तक के पन्नों में पिची हुई राखी
उस घर को घर कहने में शरमाती है ।
साड़ी-टाई बदलें, या ये घर बदलें
प्रश्नचिन्ह नित और बड़ा होता जाता,
कारण केवल यही दिखावों से जुड़ हम
तोड़ रहे अनुभूति-भावना से नाता,
जिन्हें दिया संगीत द्वार के सांकल ने
खाँसी के ठनके, चूड़ी की हलचल ने
उन संकेतों वाले भावुक घूंघट पर
दरवाजे की ‘काल-बेल’
हँस जाती है ।
कुंअर बेचैन

गुनगुन करने लगे हैं दिन
चिट्ठी की पांती से खुलने लगे हैं दिन,
सर्दियाँ होने लगी हैं और कुछ कमसिन ।
दोहे जैसी सुबहें
रुबाई लिखी दुपहरी,
हवा खिली टहनी-सी
खिड़की के कंधे ठहरी,
चमक पुतलियों में फिर भरने लगे हैं दिन,
नीले कुहासे टंके हुए आंचल पर पिन ।
कत्थई गेंदे की

खुशबू से भींगी रातें,
हल्का मादल जैसे
लगी सपन को पांखें,
ऋतु को फिर गुनगुने करने लगे हैं दिन,
उजाले छौने जैसे रखते पाँव गिन-गिन ।
सूत से लपेट धूप को
सहेजकर जेबों में,
मछली बिछिया बजती
पोखर के पाजेबों में,
हाथ में हल्दी-सगुन करने लगे हैं दिन,
सांझ जलती आरती-सी हुई तेरे बिन ।
शांति सुमन

कागजी मुखौटे
आसपास घूम रहे
कागजी मुखौटे ।
आँखों में थिरक रहे
पासे के दाँव,
हर चेहरा युयुत्सु
कुरुक्षेत्र गाँव ।
धोखे की धूप रोज
काढ़े-सा औटे ।
डूब रही रिश्तों की

झंझराई नाव
नदी रोज फैल रही
झेलकर कटाव ।
अनचीन्हे घाट-बाट
लोग कहाँ लौटे ?
साँकल तक माँगते हैं
पौनी-से नेग,
कहाँ गये अगवानी
आतुर संवेग ।
छू गये गाँवों को
किसके गजनौटे ?
मधुर कमल