ग़ज़ल
बेशक छोटे हों लेकिन
बेशक छोटे हों लेकिन धरती का हिस्सा हम भी हैं
जैसे प्रभु की सारी रचना,
वैसी रचना हम भी हैं।
इतना भी आसान नहीं है पढ़ना और समझ पाना
सुख की दुख की संघर्षों की पूरी गाथा हम भी
हैं।

आज नहीं हो कल तुमको भी साथ हमारे चलना है
एक ज़माना तुम भी थे तो एक ज़माना हम भी
हैं।
फ़न ने ही हमको दी है मर्यादा जीने मरने की
तो फिर फन के जीने मरने की मर्यादा हम भी
हैं।
ईश्वर ने तो लिख रक्खा है सबके माथे पर
लेकिन
अपने सुख के अपने दुख के एक विधाता हम भी
हैं।
जब जब भी इच्छा होती है रास रचा लेते हैं हम
अपने मन के वृंदावन के छोटे कान्हा हम भी
हैं।
ooo
भले ही मुल्क के
भले ही मुल्क के हालात में तब्दीलियाँ कम हों
किसी सूरत गरीबों की मगर अब सिसकियाँ कम
हों।
तरक्की ठीक है इसका ये मतलब तो नहीं लेकिन
धुआँ हो,
चिमनियाँ हों,
फूल कम हों,
तितलियाँ कम हों।
फिसलते ही फिसलते आ गए नाज़ुक मुहाने तक
जरूरी है कि अब आगे से हमसे गल्तियाँ कम
हों।
यही जो बेटियाँ हैं ये ही आखिर कल की माँए
हैं
मिलें मुश्किल से कल माँए न इतनी बेटियाँ कम
हों।
दिलों को भी तो अपना काम करने का मिले मौका
दिमागों ने जो पैदा की है शायद दूरियाँ कम
हों।
अगर सचमुच तू दाता है कभी ऐसा भी कर ईश्वर
तेरी खैरात ज्यादा हो हमारी झोलियाँ कम हों।
कमलेश भट्ट कमल

एक सपना मुझमें दाख़िल
जिन दरख़्तों पर कोई पत्ता हरा मिलता नहीं
चहचहाते पंछियों का घोंसला मिलता नहीं ।
दर्द और ख़ुश्बू का नाता ज़िंदगी का मर्म है
जिसने कांटों को न समझा, कुछ मज़ा मिलता नहीं ।
आदमी को दर्द से जो दूर ले जाए कहीं
आदमी को उम्रभर वो काफ़िला मिलता नहीं ।
दूरियाँ बढ़ती चली जाती हैं अपने-आप से

चाहने वालों को जब अपना ख़ुदा मिलता नहीं ।
एक सपना मुझमें दाख़िल मुद्दतों पहले हुआ
अब भटकता फिर रहा है रास्ता मिलता नहीं ।
रास्ते लंबे हैं लेकिन मुख़्तसर-सी जिंदगी
आदमी को उम्रभर चाहा हुआ मिलता नहीं ।
हो नहीं पाएगा मुमकिन लौटना ख़ुद में, अगर
तू ज़रा ख़ुद से कभी होकर तन्हा मिलता नहीं ।
खो न दे पहचान इक दिन वह हमेशा के लिए
जिसको सारी उम्र कोई आइना मिलता नहीं ।
ooo
फूल भी मारा तो पत्थर की तरह
वो मेरे दिल में रहा है रोज़ इस डर की तरह
लौट ना जाये कहीं इक दिन मुसाफ़िर की तरह ।
तूने अपनी ही नज़ाकत से किया कैसा सलूक
फेंक कर इक फूल भी मारा तो पत्थर की तरह ।
ज़ख़्म ही तुझको सिखा सकते हैं जीने का हुनर
शर्त है कांटों पे सोये नर्म-बिस्तर की तरह ।
एक दिन तू ख़ुद ही पहचानेगा अपने-आप को
जब तेरा होना चुभेगा तुझ को नश्तर की तरह ।
टूटने-वालों की हस्ती मिट नहीं जाती यूँही
मुद्दतों रहते हैं ज़िंदा एक खंडहर की तरह ।
कृष्ण सुकुमार

सब उसी के हैं
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफा हो जाएगा ।

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा ।
कितनी सच्चाई से, मुझसे ज़िंदगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा तो कोखई, दूसरा हो जाएगा ।
मैं खुदा का नाम लेकर, पी रहा हूँ दोस्तों
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा ।
सब उसी के हैं, हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आस्माँ
मैं जहाँ भी जाउँगा, उसको पता हो जाएगा ।
बशीर बद्र