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व्यंग्य

जीन्स में बांके बिहारी- तपन मुखर्जी

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जीन्स में बांके बिहारी

तपन मुखर्जी

        पने बांके बिहारी भी अब जीन्सधारी हो गए हैं। उन्हें अपनी लीलास्थली वृन्दावन में जीन्स, टी शर्ट पहना दिया गया है। हाथ में मोबाइल भी है। यानी कि बांके बिहारी जी आधुनिक हो गए हैं। उनकी काया पलट हो गई है। पुरातन पंथी से प्रगतिशील हो गए हैं।

 

        वक्त का तकाज़ा है। पुराना परिधान अब भक्तों को आकर्षित नहीं करता। आज के जमाने में मॉडर्न बनना जरूरी है। स्मार्टनेस आवश्यक है। बिना जीन्स, टीशर्ट के स्मार्ट कैसे हो सकते हैं। फिर कान पर एक मोबाइल भी तो जरूरी है। पहले पैर टेढ़ा रखते थे, अब गरदन को टेढ़ा रखना फैशन में है।

 

        उनके इस नए और नयनाभिराम स्वरूप से पुराने भक्तजन दुखी हैं। विरोध कर रहे हैं। पर बांके बिहारी प्रसन्न हैं। अब उनके सांवले-सलोने बदन पर पीतांबर नहीं है। जीन्स और टीशर्ट में नया लुक आ गया है। इक्कीसवीं सदी के मनभावन बन गए हैं। नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने लगे हैं।

 

        पुरानी गोपियाँ पीतांबर और मुरली पर फिदा थीं। यह अब आउट आफ फैशन हो गया है। आधुनिक गोपियाँ इस पर ध्यान नहीं देतीं। धोती धारण करना गंवहियाँपन की निशानी है। आजकल तो छैल छबीलों का ज़माना है। अपने ग्रामीण बाप को लोग भी नौकर बता देते हैं। बाप को, चाहे वह गाँव का क्यों न हो आधुनिक बनना जरूरी है।

 

        सलिए यह नया रूप अच्छा है। जीन्स और टीशर्ट में सही में कृष्ण कन्हैया सजने लगे हैं। मोबाइल में नई-नई रिंग टोन बजा रहे हैं। बांसुरी के स्वर को अब कोई सुनना पसंद नहीं कर रहा है। बांसुरी वादन पर दौड़ी-दौड़ी नहीं आती गोपियाँ। कहते हैं एकरसता आ गई है। बोर हो गए हैं सदियों से सुनते-सुनते। अब मोबाइल पर एक से एक रिंगटोन बजा रहे हैं। कभी ये वाला, कभी वो वाला। कभी ग़ज़ल वाला, कभी भजन वाला, कभी कव्वाली वाला, कभी गले वाला तो कभी नाक वाला। जिसको जैसा पसंद आए। हरेक की पसंद का राग है। रिंग टोन में तो बोर होने का सवाल ही नहीं। कभी ऐसा वाला सुनिये, कभी वैसा वाला सुनिये। जैसा वाला अच्छा लगे वैसा वाला सुनिये। पूरा गाना सुनना-सुनाना होता है तो एफ एम लगा लेते हैं। आडियो-वीडियो भी चलाते हैं। बांके बिहारी जी को एक और चीज अच्छी लगी। एसएमएस फेसिलिटी। बहुत सारी गोपियों को एक साथ संदेश भेज दीजिए। फलां कदम के नीचे इतने बजे से रास का आयोजन। पूरी नहीं आधी पहुँच ही जाएंगी। गोपनीयता भी बनी रहेगी। रास का अच्छा आयोजन भी हो जाएगा।

 

        मिस कॉल भी उन्हें अच्छा लगा। जिस गोपी को अपनी याद दिलानी हो मिस कॉल मार दो। हर्रा लगे न फिटकिरी।

 

        उन्होंने इस नई फेसिलिटी देने वालों के प्रति आभार व्यक्त किया है, जिन्होंने उस पुरातन पंथ से उबार दिया है और आधुनिकता के रंग से सराबोर कर दिया है। वे कुछ और नई सुविधाओं की भी अपेक्षा कर रहे हैं। मसलन बाइक।

 

        एक बाइक हो जाए तो और बांके हो जाएं। कभी इस सड़क पर तो कभी उस सड़क पर घूमेंगे कन्हैयागिरी करते हुए। कभी इस गोपी से मुलाकात तो कभी उस गोपी से बातचीत ! अफेयरों में पूरा बांकपन आ जाएगा। कन्हैयागिरी में स्मार्टनेस के साथ फास्टनेस आ जाएगी। कभी यहाँ प्रगट होंगे तो कभी वहाँ प्रगट होंगे। कभी गली वाली गोपी को ओब्लाइज करेंगे तो कबी सड़क चलती गोपी से चुहल कर लेंगे।

 

        जैसे आजकल के छोकरे घूमते हैं बाइक में सांय-सांय। वैसी ही इच्छा बांके बिहारी जी की भी हो रही है। शायद पूरी कर दें वृन्दावन वाले भक्तगण।

 

 

 

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