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जीन्स में बांके बिहारी- तपन मुखर्जी

कहीं कोई आप पर हँस तो नहीं रहा?- पंकज अवधिया

बेताल कथाःसमाजवादी मच्छर- गिरीश पंकज

 
 

कहीं कोई आप पर हँस तो नहीं रहा?

पंकज अवधिया

          कौन कहता है कि आज के युग में वरदान नहीं मिलते। यह अलग बात है कि वरदान माँगने वाले इंसान वरदानों से जल्दी उबने लगे हैं। मैं यह बात इतने अधिक विश्वास से इसलिये कह पा रहा हूँ कि मैं भी एक वरदान प्राप्त कर खो चुका हूँ। और वह वरदान था पशुओं की बातों को सुनने व समझने का। मानव की अप्रतिम उपलब्धियों से गर्वान्वित मैंने जब पशुओं से मानव जाति के विषय में सुना तो एक्सपायरी डेट के पहले ही मैंने यह वरदान परमपिता परमेश्वर को वापस लौटा दिया। वरदान की बात न जाने कहाँ से मार्केंटिंग से जुड़े मेरे एक मित्र को पता चल गई जिससे मैं हमेशा डरा करता हूँ कि कहीं वह मेरा मूल्य निर्धारित कर बिना किसी मोलभाव के किसी टेलीशॉप में न बेच दे। जानवरों की भाषा समझने व बोलने के वरदान की बात सुनकर उसने मुझसे कहा,  'यार, शेर से मेरी बाते करवा दें। मुझे फ्रिज बेचना है। शेर और फ्रिज? उसने कहा, हाँ फ्रिज खरीदने से शेर को कई फायदे है। उसे रोज शिकार नहीं करना होगा। एक दिन मजे से भिड़ के शिकार करो और एक महीने तक फ्रिज में उसे सुरक्षित रखो। कोई झंझट ही नहीं। मैंने उसे चेताया, यदि शेर शिकार नहीं करेगा तो उसका टाइम कैसे पास होगा। मित्र के पास जवाब था कि वह आराम करेगा। मैने कहा, फ्रिज आने से शेर की निश्चिंतता मिटेगी तो वह भी आदमी की तरह राजनीति प्रारंभ कर देगा। पहले के मनुष्य दिन का बड़ा हिस्सा भोजन की खोज व उसे पकाने में बिता देते थे। आज की सुविधाओं ने हमसे हमारी मेहनत व लगन छीन ली है और राजनीति के भंवर जाल में धकेल दिया है।

 

          वरदान प्राप्ति के कुछ दिनों के बाद जब मैं मुख्य सड़क से गुजर रहा था तो मुझे कुछ लोग दिखे जो कि एक भिखारी को मार कर भगा रहे थे। मैं सहसा रूक गया। अचानक मुझे अजीब सी खिलखिलाहट सुनायी दी। नीचे देखा तो एक कुत्ता खड़ा हँस रहा था। या कहे कि मजे ले रहा था। मैंने उसे डांटा तो उसने कटाक्ष किया ''खबरदार जो हाथ लगाने की जुर्रूत की तो। मुझे मारा तो तुम्हारी ही बिरादरी के लोग आ खड़े होंगे हमें बचाने।" फिर हँस कर बोला ''वाह रे इंसान। तुझे अपनी बिरादरी की चिंता नहीं। हजारों लोग अभाव से त्रस्त हैं और हमारी मौत मर रहे हैं। हमारी मौत अर्थात् कुत्ते की मौत पर आज इसके मायने बदल गये हैं।'' दो पैर वालों को कुत्ते की सी मौत भी नसीब नहीं हो रही है। एक साधारण से कुत्ते की यह मजाल की वह हम पर ऊंगली उठाये। मैं पत्थर उठाया पर अचानक कई कानूनी धाराएँ याद आ गई। मैं मन मसोस कर रह गया।

 

          एक दिन मैं कमरे में बैठा विचार मग्न था कि अंधेरे कोने से आती कुछ पतली सी आवाज़ें सुनाई दी। लगता था कुछ लोग विश्वविद्यालय व कॉलेज खोलने की बात कर रहे थे। ध्यान से देखा तो पाया कि यह मच्छरों की आवाज़ थी। उनकी निजी विश्वविद्यालय की बातें सुनकर मैं समझ गया कि ये छत्तीसगढ़ के मच्छर है। फिर वरदान की याद आयी। मैंने उनसे बात करने की ठानी। मैंने पूछा ''मच्छर और विश्वविद्यालय? बात कुछ जम नहीं रही। एक प्रबुद्ध मच्छर ने कहा कि आज तक मनुष्यों ने जितनी प्रगति की है उससे ज्यादा प्रगति हमने की है। यही कारण है कि वह आज तक हमारा समूल नाश नहीं कर सका है जबकि हम जब चाहे तब उनका सर्वनाश कर सकते हैं। वो तो हमारी मजबूरी है कि यदि इन्हें मार दिया तो हम भी भूखों मर जायेंगे। समझ लो हमने मनुष्यों को पाल के रखा है। हमारी चर्चा जारी ही थी कि कुछ युवा मच्छर अचानक उड़ पड़े। पूछा तो पता चला कि टीव्ही क़े प्राइम टाइम का समय हो गया है। ये युवा वैज्ञानिक है जो जाकर देखेगे कि मनुष्य ने किस नये उत्पाद को लांच किया है ताकि समय रहते उसकी काट खोजी जा सके। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मानव अधिकार की तरह मच्छर अधिकार भी अस्तित्व में है और कुछ कार्यकर्ता मच्छरों के बीच भी है। इन कार्यकर्ताओं ने शिकायत की कि मनुष्य मच्छरों व   मख्खियों दोनों से परेशान है। पर अगरबत्ती, क्रीम व जहरीले द्रव सिर्फ मच्छरों के लिये ही क्यों? यह अन्याय है? मैं विचारमग्न हो गया। उनकी बात सही थी। कार्यकर्ता उत्तेजित हो उठे और अचानक मैंने बहुत सी सुईयों का अनुभव किया। मैंने वहाँ से भाग लेने में ही भलाई समझी।

 

          जब से छत्तीसगढ़ राज्य बना है तब से अचानक कौवों की संख्या में कमी आ गई है। प्राणी शास्त्री इस प्राकृतिक सफाई कर्मी की घटती संख्या से चिंतित है। वरदान के  बहाने जब मैंने मुंडेर पर बैठे कौवों से यह पूछा तो वे बोले अब आप ही बताइये राजनीतिक कौवों के सामने हमारी क्या बिसात ? ठीक ही बात है पर यह बात हम कहते तो पोटा लग जाता हम पर। मेरी प्रयोगशाला में रखे कुछ पॉलीथीन खाने वाले कीड़ों से मेरी चर्चा हुई तो वे बड़े ही निराश लगे। कारण पूछा तो बोले कि हमने सोचा कि पॉलीथीन खाना शुरू करके हम देश की एक बड़ी समस्या को हल कर पायेंगे पर अब पता चला कि पॉलीथीन से ज्यादा खतरनाक तो हमारे भ्रष्ट नेता है जो कि दीमक की तरह देश को चट कर रहे हैं। हमे पॉलीथीन की जगह इन्हें चुनना चाहिये था।

 

          हमारी युवा पीढ़ी के तन से कम होते कपड़ों पर चर्चा करते हुये ऊँची डालों पर बैठे बंदर कई शाम बिता देते हैं। मेरे एक मित्र ने हाल ही में बंदरों से त्रस्त होकर खेतों के चारों ओर बाड़ में करंट लगा दिया है। उन्होंने बताया कि जब बंदर इस करेंट वाली बाड को पार करते हैं तो उनकी पूंछ करंट वाली बाड़ से टकरा जाती है। सप्ताह भर बाद हम फिर मिले। वे बहुत दुखी थे। बंदरों का प्रकोप वैसा ही था। मैने जब बंदरों से राज जानना चाहा तो एक बुजुर्ग बंदर बोला चलो मेरे साथ बाड़ के पास। बाड़ के पास पहुँचे तो बंदर ने एक हाथ में अपनी पूंछ पकड़ी और लगा दी छलांग। पूंछ तो बाड़ से टकराई ही नही। मनुष्य की होशियारी को एक बार फिर धता बता दिया इन पूर्वजो ने। बाद में युवा बंदरों ने बताया कि उन्हें बुर्जुगों ने यह उपाय सुझाया और फिर व्यंग्य किया कि हम बंदर मनुष्यों की तरह बुर्जुगों का अपमान नहीं करते हैं। उन्हें अपने साथ रखते हैं ताकि उनका अनुभव हमे कुछ नया बता सके।

 

          इतना सब सुनने के बाद मेरे पास एक ही उपाय बचा और वह था वरदान की वापसी। मैंने यह कार्य तुरंत कर दिया।

 

 

 

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