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संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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व्यंग्य

जीन्स में बांके बिहारी- तपन मुखर्जी

कहीं कोई आप पर हँस तो नहीं रहा?- पंकज अवधिया

बेताल कथाःसमाजवादी मच्छर- गिरीश पंकज

 

समाजवादी मच्छर

गिरीश पंकज

विक्रमादित्य ने जैसे ही डाल पर लटके बेताल को उठाया, बेताल हँसने लगा । हँसना तो बेताल का स्थायी भाव बन चुका था । लेकिन विक्रमार्क ने उसके हँसने की परवाह नहीं की, और राजमहल की ओर चल पड़ा । बेताल बोला- राजन तुम मेरे आदर्श हो । तुम पूजनीय हो । तुम को देखकर सोचता हूँ, काश पूरी मानव-जाति तुम्हारी तरह हो जाता । लेकिन न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी । हा,हा,हा !”

 

       विक्रम चुपचाप चला जा रहा था । वेताल मुस्कराया । फिर बोला-राजन, अब मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ । तुम्हारा मन बहलाना मेरा फर्ज है। तुम अपना फर्ज करो, मैं अपना फर्ज  निबाहूँ।

            विक्रमार्क के चेहरे पर हल्की-सी हँसी देखकर वेताल उत्साहित हो गया । गोया जेकपॉट हाथ लगा हो । उसने शुरू किया राजन, मैं आज दो खतरनाक मच्छर-परिवार की कहानी सुनाता हूँ । किसी शहर में डेंगू और चिकनगुनियाँ नामक प्रजाति के मच्छर रहते थे । वैसे शहर के लोग पहले ही चार चीजों से त्रस्त रहते थे। गुंडे, कुत्ते, नेता, पुलिस ।

 

       गुंडे कभी-कभार तंग करते थे। कुत्ते रात दौड़ाते। नेता अपनी हरकतों के कारण जनता को दुखी करते । पुलिस वाले जब-तब वीपीआई ड्यूटी के नाम पर लोगों को हलाकान करते रहते। बलात्कार, मारपीट आदि आदि से तो न जाने कितने लोग त्रस्त थे। इन सबके साथ मच्छर भी सक्रिय हो गए। बाकी मच्छर तो खैर अपने मच्छर होने के गुस्से का इजहार करते रहते थे। जहाँ गुंजाहत्त होती, अपने डंक मार देते । किसी के पिछले जन्म के कर्म कुछ ठीक होते तो बेचारे काटकर फूर्र    हो जाते लेकिन कुछ बेचारे बेमौत मारे जाते । लेकिन मरते मरते काटने के गर्व में भरे होते । मनुष्यों को काटने का गर्व ।

 

       इन्ही मच्छरों में एक था डेंगू और दूसरा था चिकनगुनिया । इन दोनों ने ठान लिया था कि इस देश के लोगों का जीना हरान कर देंगे । सो इन लोगो ने देश भर में अपनी आबादी बढ़नी शुरु कर दी। देखते ही देखते कोने-कोने में डेंगू और चिकनगुनिया के बंशज फैल गए । दोनों के सुझाव पर डेंगू और चिकनगुनिया ने लोगों का जीना कठिन कर दिया । आम आदमी परेशान । जिसे देखों डेंगू, जिसे देखो चिकनगुनिया । परेशान लोग मंत्री से मिले । विधायक से मिले । अफसर से मिले । किसी को फुरसत नहीं थी कि शरारती मच्छरों के खात्मे का ठोस उपाय करते । आम लोग परेशान होकर भूख हड़ताल पर बैठे । तब कुछ हलचल हुई । कुछ दवाइयाँ बँटी । गली-कूचों की सफाई भी हुई । हे राजन, यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन अचानक लोगों ने देखा कि वीवीआइपी इलाकों में जोरदार सफाई अभियान चलने लगा । डेंगू चिकनगुनिया का चर्चा होने लगी । समाजवादी मच्छरों की जय-जय होने लगी । अब राजन, तुम बताओ, कि अचानक सफाई अभियान ने जोर क्यों पकड़ लिया । समाजवादी मच्छर भी जय-जय क्यों होने लगी ? सोच समझकर बिल्कुल सही जवाब देना, वरना तुमको चिकनगुनिया और डेंगू दोनों हो जाएगा । फिर मत कहना कि पहले क्यों नहीं बताया !

 

       विक्रमार्क इस बीमारियों के बारे में सुन चका कि कैसे आदमी लस्त-पस्त हो जाता है । विक्रमार्क वेताल के सवालों पर सोचना शुरू किया और । फिर मुसकुराते हुए बोल पड़ा ऐसा है बेताल, तुम हमेशा मुझे ऐसे सवालों में उलझाते रहते हो जो बड़े कठिन होते है। बहुत सोचना पड़ता है लेकिन तुम्हारा सवाल सुनकर मेरा ध्यान समाजवाद की ओर गया । समाजवाद मतलब सबको समानरूप से देखने की भावना । तो जब डेंगू और चिकनगुनिया आम लोगों को काट-काट कर जान लिए जा रहे थे, तभी वे एक बार स्वत्रंता सेनानी की समाधि पर जा बैठे । वहीं उनको आत्मज्ञान हुआ कि क्यों व अब पैसे वाले, पहुँच वाले लोगों को भी काटा जाए । ऐसे लोगों को जो बड़े सुरक्षित बंगलों में रहते है। जहाँ मुसीबत भी आने के पहले सौ बार सूझती है। तो ऐसी जगहों पर डेंगू और चिकनगुनियाकी विरादरी ने धावा बोल दिया । देखने ही देखते अधिकांश वीआइपी लोग, उनके बच्चे, सबके सब बीमार पड़ गए । यह देखकर आम लोगों ने राहत की सांस ली । आपस में बतियाने लगे, कि देखो, कैसे समाजवादी मच्छर हैं। क्या गरीब, क्या पद-पैसे वाले । किसी को नहीं छोड़ रहे हैं । सबका खून चूस रहे हैं। जो देश का खून चूस रहे थे, उनका खून चुसकर वे लोग तो एक तरह से समाजवाद ला रहे हैं । यह मच्छरी समाजवाद है, जिसे जनता कभी भूल नहीं सकती।

 

       तो ये थे, समाजवादी मच्छर । अब रही बात अचानक साफ-सफाई तेज होने की । तो असल बात यह है कि उस इलाके में जब बड़े-बड़े लोग और उनके रिश्तेदार भी डेंगू और चिकनगुनिया से त्रस्त होने लगे तो सफाई अभियान ने जोर पकड़ लिया । यह देख कर समाजवादी मच्छर तक घबरा गए । उन्होंने फौरन तय किया कि अब इस इलाके को छोड़कर दूसरे शहर में धावा बोल दिया जाए । लेकिन पूरी तरह समाजवादी बन कर । गरीबों को काटो तो अमीरों को भी मत छोड़ो । यही है मच्छर-समाजवाद ।

 

            विक्रम की बात सुनकर वेताल गदगदायमान हो गया । विक्रम का मौन भंग हो चुका था, सो वेताल को मौका मिल गया । वह एक बार फिर डाल पर आकर लटक गया । विक्रम पीछे-पीछे भागा। आज उसकी रफ़्तार कुछ ज्यादा थी। वेताल की कहानी सुनकर विक्रमार्क पर मनोवैज्ञानिक असर हो चुका था। उसे लग रहा था कि उसे भी डेंगू और चिकनगुनिया हो सकता है। उसके काम के पास गुन...गुन...गुन की आवाज़ें आ रही थी । हो सकता हैं ये डेंगू और चिकनगुनिया वाले मच्छर ही हों । विक्रमार्क तेजी से दौड़ने लगा। धीरे-धीरे भुन...भुन की आवाज़ भी कम होने लगी । तब तक श्मशान पहुँच चुका था। बैतलवा डाल पर लटका हुआ था । उसके कान के पास भी भुन..भुन की आवाज़ें हो रही थी लेकिन ये आवाज़ें मच्छरों की नहीं थी ! कोई नज़र भी नहीं आ रहा था। विक्रम समझ गया कि भूत होंगे जो वेताल को कोई कथा-कहानी सुना रहे हैं।

 

 

 

व्यंग्य

मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक् शक्ति होती है - कार्लाइल

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