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लालटेन किरासन, कुछ धुआँ, बाती और कुछ कीट ये सभी एकाकार हैं इस धात्विक परिधि में इस कलई छूटे टीन की पेंदी में आग का समूद्र हिचकोले लेता जल रहा है भयंकर काली रात में ।
आग जलती है बात मान, मान इस टिन की परिधि
सर्कस के बाघ की तरह यह दुर्दांत आग राजा भैया है
जैसे कि इस काले-काले टिन से कोई परिचय नहीं जैसे कि वह नहीं जानती कैसे गर्म हुई यह लालटेन ।
तुम तो मौसमी आलस को पलकों तले रौंद पुतलियाँ घुमाने की जी-जान से मेहनत करती हो और भर रखे हैं बालों में चंपा के फूल ।
तुम कहाँ देख सकती हो प्रज्वलित अस्तित्व मेरा ? अनुमान लगा सकती हो, मैं जल रहा हूँ और जल रहा हूँ तीव्र वेदना से मामूली धोती और इस्तरी की हुई आधी कमीज़ में ।
चाँदनी रात तमाम मैदान मिलकर बना है एक सफेद चादर बिस्तर का जिसका ओर कहाँ छोर कहाँ, ठीक मेरी देह-सा । आकाश भी लगभग तुम-जैसा है । कभी-कभी लगता है मैं आकाश हूँ, पसरा हुआ पर खाली, और देखता हूँ जैसी पृथ्वी है
तुमने भी ठीक उसी तरह पसार रखे हैं हाथ,
जहाँ भी उतरूँ वहीं है तुम्हारा आलिंगन ।
होता है भ्रम ज़मीन और आसमान के मिलने का कहीं दूर । काश, तुम्हीं उड़ आओ प्रवास ओ मेरे विहंग, मैं यहाँ से हट नहीं पाऊँगा कि कहीं चाँद न डूब जाय । कि कहीं मेरे लौटते समय रास्ता न दिखे सूरज के प्रकाश में ।
समय पर एक नज़र तुम अधिष्ठात्री देवी हो असंभव घडियों की । सुबह का विस्फोट है तुम्हारे स्तन में । अकेली दुपहरी झाँकती है तुम्हारे काँख तले । जब तुम मुस्कराकर बातें करती हो अधेड़ों के साथ भर जाता है आकाश एक भग्न मनोरथ मध्यरात्रि की उसाँसों की हवा से ।
तुम अधिष्ठात्री देवी हो भयावह घड़ियों की । तुम्हारा कटाक्ष जीवन्यास देता है हस्पताल के अशुभ समय को । पत्थर के प्रायश्चित के लिए परिहास एक प्रेम-दीवानी पापिन नारी का । तुम्हीं साम्राज्ञी हो साँपों, टूटी नाव और जुआरी और भडुआ और वेश्याओं की ।
तुम अधिष्ठात्री देवी हो धुँधली चाहत की, भयार्त्त सपनों की जिसमें भागना बेकार है,
साक्षात्कार की, जो है भयावह क्योंकि सामने
कभी कोई आता नहीं और मर्मांतक विलाप के बहते नहीं आँसू तभी है वह अधिक कष्टदायी ।
तुम्हारा मुस्कराता चेहरा लौटते हुए मेरी तकिया पर पूछता है क्या मैं डर गया नहीं-नहीं मैं क्यों डरूँ किससे डरूँ कोई नहीं कुछ नहीं और यहाँ तक कि अब तो तुम्हारा मुस्कराता चेहरा तक नहीं तकिया पर ।
खड़ी हो तुम सुनसान प्लेटफॉर्म पर तुम्हारे फर-फर उड़ते बाल गुदगुदाते है उस खंभे को जिससे तुम टिकी हो, वह खिलखिलाकर हँसने लगता है और प्लेटफॉर्म के उस ओर आकाश में थोड़े बादल हैं नारंगी, और रात दौड़ी चली आती है लड़की का सतीत्व बचाने को दृढ़ संकल्प पिता की तरह शहर की सूनी सड़कों में, गलियों में, सड़क पटी पड़ी है टूटे काँच, पत्थर और अस्तव्यस्त पोस्टरों से ।
सहसा एक दिन हमारी मुलाकात होती है कई वर्षों बाद एक दूसरे की नाना उम्र की संतान-संततियों के बीच, वे ही हैं उस कहानी के अनिवार्य अगले पृष्ठ जिसमें प्रेमी-प्रेमिका होते हैं दो पेड़ या रेत की दो ढेरियाँ । हम दोनों के बातें करते समय कहीं से एक खोखला क्रोध आकर तहस-नहस कर डालता है पुराने गीतों की नींद ।
क्या और कहीं है एकांत
जहाँ तुम मुझे खींच ले जाओ हाथ थामे और सिर्फ एक मुस्कान से अनायास ही मिटा दो मेरा धूसर अतीत और रक्तहीन बाकी बची आयु !
ख़ुदी ही रख लिया हमने जो हमें देना था एक-दूसरे को । आज सिर्फ दे सकते हैं एक कप चाय, या बच्चों को बिस्कुट, बच्चे भी न जाने क्यों विदेश में पड़े सैनिकों के शव पर बादलों की तरह बह जाते हैं शून्य आकाश में ।
दुर्गा असंख्य प्रार्थनाओं से बने कमल पर चरण और महाशून्य में सिर । बिन माँ के बच्चों के आर्तनाद की ओर सांत्वना देने की मुद्रा में उठीं हथेली ।
घने पहाड़ी जंगल के अँधेरे में खुली वेणी समा जाती है । समुद्र में टूटते फेन के छींटे
कौन फेंक रहा था फूलों की पंखुडियों से
?
उत्तर की मूर्ति की ओर, जिस उत्तर को सुनने के लिए खुली हैं कई मकानों की कई खिड़कियाँ । सहसा कहीं से आकर काफी दिनों के बादल ढँक जाते हैं सारे आकाश को । बादल एक राक्षस है, उसके आते ही धड़ाधड़ बंद हो जाती है खिड़कियाँ और दरवाजे । सुनसान है सारा रास्ता । सिर्फ डोल रहा है एक भैंसा । (कविताओं का चयन ‘तैयार रहो मेरी आत्मा’ से )
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