रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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बाणभट्ट की आत्मकथा

देवराज

        बाणभट्ट की आत्मकथा श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी का पहला उपन्यास है। हिंदी में कोई दूसरा व्यक्ति इस तरह के उपन्यास या कथा को लिख सकता था, ऐसी कल्पना करना कठिन है । पं. रामचंद्र शुक्ल शायद संस्कृत साहित्य के उतने सरस-सहृदय पाठक न थे । भारतीय संस्कृति के अन्य अंगों से भी उनका ऐसा गहरा परिचय न था। द्विवेदी जी की प्रधान विशेषता है-कठोर पांडित्य के साथ एक अपूर्ण सहज सरलता तथा मस्ती का योग । द्विवेदी जी पूरी डिसिप्लिन के साथ पांडित्यपूर्ण ग्रंथों का निर्माण ही नहीं करते, वे उन्मुक्त निर्द्वंद्वता से हँस भी सकते हैं। संभवतः इस समय अनेक दृष्टियों से वे हिंदी माध्यम से बोलनेवाले दो-एक श्रेष्ठ वक्ताओं में हैं।

 

            द्विवेद्वी जी ने बाणभट्ट की आत्मकथा लिख डाली; मानो पांडित्य ने अपनी गरिमा से ऊबकर उच्छसित आत्म-विनोद करने का प्रयत्न किया हो । स्वयं बाणभट्ट भी कोरा कलाकार नहीं था, कम-से-कम पांडित्य प्रदर्शन के प्रति विमुख न था। उसकी अलिखित आत्मकथा लिखने का कोई दूसरा अधिकारी हो ही नहीं सकता था।

 

       जिन्होंने बाणभट्ट की कादंबरी तथा हर्षचरित नहीं पढ़े हैं वे ठीक से अनुमान नहीं लगा सकते कि कथा के रूप में द्विवेद्वी जी ने कितनी महत्त्वपूर्ण चीज हिंदी को दी है। साहित्य के साथ ही द्विवेद्वी जी यदि क्लासिकल भारतीय संस्कृति के गहरे जानकार न होते तो वे हरग़िज इस कथा का निर्माण न कर पाते। कथा में द्विवेद्वी जी के मुख्य उद्देश्य दो हो सकते हैं - एक, प्रसिद्ध बाणभट्ट की लेखन शैली की बिडंबना प्रस्तुत करना; और दूसरे, हिंदी पाठकों को संस्कृति साहित्य के, विशेषतः बाणभट्ट के, उज्ज्वल सौंदर्य-बोध की समृद्ध अवगति देना । इन दोनों दृष्टियों से वे पूर्णतया सफल हुए हैं।

 

        किंतु, द्विवेदी जी का कृतित्व यही तक सीमित नहीं है । एक स्वतंत्र कथाकार एवं  कलाकार के रूप में भी उन्हें आश्चर्यजनक सफलता मिली है। कथा में उन्होंने एक कहानी गढ़ने का प्रयत्न किया है, जिसकी सफलता का सबूत उसकी रोचकता है। मानवीय रोचकता की दृष्टि से हमेंकथा का पूर्वार्द्ध अधिक प्रिय लगा; उत्तरार्द्ध की रचना करते समय संभवतः लेखक कुछ ऊब महसूस करने लगा था। कथा अपूर्ण रह जाती;  अपनी परिणति की ओर नहीं बढ़ पाती । इसका एक कारण लेखक का अनावश्यक नैतिक संयम अथवा साहित्यिक साहसहीनता भी है। लेखक मानो अपनी वाणी पर एक विशेष प्रकार का प्रतिबंध या प्रतिरोध लगाकर लिख रहा हो । लेखक ने स्वयं इसे स्वीकार किया है- इस कथा में सर्वत्र प्रेम की व्यंजना गूढ़ और अदृप्त भाव से प्रकट हुई है। ऐसा जान पड़ता है कि एक स्त्री-जनोचित लज्जा सर्वत्र उस अभिव्यक्ति में बाधा दे रही है। इस बात में आत्म-कथा पूर्णतया बाणभट्ट के अनुरूप नहीं है।

 

        वैसे कथा में वे सब विशेषताएं हैं जो संस्कृत के, और विशेषतः बाणभट्ट के गद्य-काव्य में पायी जाती हैं । जैसा कि द्विवेदी  जी ने उपसंहार में लिखा है- कादंबरी की कला में आँखों का, अर्थात् प्रेक्षण, मूलतः चेतना का प्राधान्य है। कादंबरी का लेखक चित्र खड़े करने की कला में अद्वितीय है, यद्यपि वे चित्र सर्वत्र रसोद्रेक नहीं करते । उदाहरण के लिए वाणभट्ट ने महाश्वेता की शुभ्रता का चित्र खड़ा करने के लिए कई दर्जन उपमाएं खर्च कर डाली हैं । इस दृष्टि से मितभाषी कालिदास और मुखर बाणभट्ट के वैसे वर्णनों में कुछ साम्य है - यद्यपि बाणभट्ट् में उतने बारीक विश्लेषण की प्रवृत्ति नहीं है। कादंबरी के वर्णनों की भंति आत्मकथा के वर्णन भी कथा-प्रवाह में व्याधात उपस्थित करते हैं । मतलब यह कि आत्मकथा के वर्णन भी कथा-प्रवाह में व्याघात उपस्थित करते हैं। मतलब यह कि आत्मकथा की अधिकांश कमियां वाणट्ट की कमियों का सफल प्रतिफलन मात्र हैं।

 

        बाणभट्ट की सबसे बड़ी शक्ति और अशक्ति है - रागात्मक जरूरतों से निरपेक्ष, विदग्ध वैचित्र्यपूर्ण वर्णन के प्रवाह में बह जाना । कथा की कलात्मक जरूरतों को भुलाकर बाण मानो अपनी ही वाणी के प्रबल आवर्त में फंसकर रह जाता है। उसका शब्दों एवं उसके संगीत का अनुराग वैसा ही उत्कट है जैसे अंग्रेजी कवि स्वनवर्न का । और कवि की वर्णना का विषय कोई भी वस्तु या स्थान हो सकता है - एक अश्व या सरोवर उतना ही जितने कि नायक-नायिका अथवा अन्य पात्र। द्विवेद्वी जी ने बाणभट्ट की इन विशेषताओं का पूर्ण निर्वाह किया है। एक नमूना देखिए-

 

        इसी समय उस राजकन्या ने वीणा बजाना शुरू किया । मैंने ....इस कमनीयता की मूर्ति की ओर देखा। अत्यंत धवल प्रभा-पुंज से उसका शरीर एक प्रकार ढंका हुआ-सा ही जान पड़ता था, मानो वह स्फटिक-गृह में आबद्ध हो, या दुग्ध-सलिल में निमग्न हो, या विमल चीनांशुक से समावृत हो, या दर्पण में प्रतिबिबित हो, या शरत्कालीन मेघपुंज में अंतरित चंद्रकला हो । ....निश्चय ही यह धर्म के हृदय से निकली हुई है। मानो विधाता ने शंख से खोदकर, मुक्ता से खींचकर, मृणाल से संवारकर, चंद्रकिरणों के कूचक से प्रक्षालित कर, सुधा-चूर्ण से धोकर, रजत-रस से पोंछ, कुटज कुंद और सिंधुवार पुष्पों की धवल कांति से सजाकर ही इसका निर्माण किया था। अहा, यह कैसी अपूर्ण पवित्रता है ! यहां क्या मुनियों की ध्यान-संपत्ति ही पुंजीभूत होकर विद्यमान है, या रावण के स्पर्श-भय से भागी हुई कैलास पर्वत की शोभा ही स्त्री-विग्रह धारण करके विराज रही है, या बलराम की दीप्ति ही उनकी मल्लावस्था में उन्हें छोड़कर भाग आयी है, या मंदाकिनी की धारा ने यह पवित्र रूप ग्रहण किया है। (पृ. 39-41)

 

        भट्टिनी का पहली बार परिचय पाने पर बाणभट्ट उसके पवित्र व्यक्तित्व का इस प्रकार वर्णन करता है-उचित स्थान पर विधाता का पक्षपात हुआ है। हिमालय के सिवा गंगा की धारा को कौन जन्म दे सकता है ?  महासमुद्र के सिवा कौस्तुभ मणि को कौन उत्पन्न कर सकता है ? धरित्री के सिवा और कौन है जो सीता को जन्म दे सके ? मैं बड़-भागी हूँ, जो इस महिमाशालिनी राजबाला की सेवा का अवसर पा सका । अहा  ! किस पाप अभिसंधि ने इस कुसुमकलिका को तोड़ लिया था ? किस दुर्वह भोग-लिप्सा ने इस पवित्र शरीर को कलुषित करने का संकल्प किया था ? किस दुर्निवार पाप-भावना ने ज्योत्स्ना को मलिन करना चाहा था ? मेरे हृदय की भक्ति और बढ़ गयी । (पृ. 58)

       

        आत्मकथा की एक स्पृहणीय विशेषता है, उसकी व्यापक-विनोद भावना । बाणभट्ट जगह-जगह स्वयं अपने को लक्ष्य करके हँसता है। शुरू में ही वह बतलाता है, किस प्रकार उसे उसके गाँव के लोगों ने वंड (पूंछ कटे बैल) की उपाधि दी थी, जिसे उसने संस्कृत शब्द बाण द्वारा संस्कार करके अपने नाम की इज्जत बढ़ा ली । चौथे उच्छ्वास में एक पुजारी का बड़ा विनोदपूर्ण वर्णन है। वर्णन को विशेष विनोदपूर्ण बनाने के लिए पुजारी बाबा को बहुत ही विरूप चित्रित किया गया है यह कादंबरीकार के युग की कला की स्थूलता का सबूत है। यों आत्मकथा का हास्य स्वयं द्विवेद्वी जी की विशेषता है। छठे उत्छ्वास में  बाबा बाणभट्ट से, उसके कहने पर कि मैं अमंगल से डरता हूं, उससे इस प्रकार बातें करते हैं-

बाह्मण है न ?’

हाँ, आर्य  ? ’

तेरी जाति ही डरपोक है। क्यों से, महावराह पर तेरा विश्वास नहीं है ?’

है आर्य  ?’

झूठा ! तेरी जाति ही झूठी है ?’

पाठक इस संवाद की विनोदात्मकता की अधिक दाद दे सकेंगे, यदि व स्मरण रखें कि बाणभट्ट ही नहीं, आत्मकथा का लेखक भी स्वयं ब्राह्मण है।

 

        बाणभट्ट की आत्मकथा पढ़कर मन में एक प्रश्न उठता है क्यों द्विवेदी जी ने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का और अधिक सदुपयोग नहीं किया ? क्यों वे अपना अधिकांश समय रूखे रिसर्च-कार्य को ही देते रहे ? कहीं इसका कारण उस नैतिक साहस की कमी तो नहीं है जो आत्मकथा के श्रृंगार के दृप्त बनने में बाधक हुई है ?

 

 

 

 

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 सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता उससे भी दुर्लभ - ला फौन्तेन

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