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संस्कार

कहानी क्यों लिखता हूँ ?- मोहन राकेश

रोटी का मोर्चा और संस्कृति- जैनेन्द्र कुमार

 

अपने समय के महत्वपूर्ण लेखकों की आलोकित रचनाएं

 

रोटी का मोर्चा और संस्कृति

जैनेन्द्र कुमार

        क लेख मेरे देखने में आया, रोटी के मोर्चे पर संस्कृति के गीत अपना शीर्षक मैने वहीं से लिया है। उसके लिए लेखक का आभार मानना और उनसे क्षमा माँग लेना जरुरी है ।

 

       वह तो लेख क्या एक गद्य काव्य ही है । सुन्दर और भावुक । कला और भावुकता के योग से कठोर भी मनोरम दिख पड़ता हैः लेकिन इस जगह मनोहर मुझे प्रयोजनीय नहीं है । प्रयोजनीय है मोर्चा यानी उसकी समझ । मोर्चे पर जानता हूँ, भूख और भोग दोनों के द्वारा ही लेकिन उसका मोर्चा क्या चीज है, यह शायद गवेषणा की वस्तु है । यह भी पाना होगा कि फिर संस्कृति से उसकी क्या संगति है । 

 

        रोटी का एक मोर्चा तो मेरे यहाँ भी कायम है । उसका नाम है चौका । एक थाली में कक्कू, और कुन्ने बैठते हैं, तो अक्सर मोर्चा गरम देखता हूँ । छीन-झपट होती है, ले-दे मचती है, फिर मीठा उनहार, मनुहार भी होता है। उस चौके के और भी पहलू हैं । एक गृहिणी जो कि खाना बनाती है । दो, स्वामी जो सादर पहले जिमाये जाते हैं । तीन, कहारिन जो रोटी के झूठे बर्तन माँजती और बचा-खुचा पाने की जुगत में रहती है। फिर सबके बाद मेहतर जो बासी और जूठन बचने पर अपना हक जमाता है। चौका यदि मोर्चा है तो इन सबके लिए उसका रूप अलग-अलग है। पति महाशय के लिए वह रूप पैसा है, पत्नी के लिए सेवा, कहारिन के लिए चाकरी और मेहतर के लिए भीख, बच्चों के लिए वह एक ही साथ क्रीड़ा और कुश्ती का अखाड़ा है।

 

       लेकिन मैं जानता हूँ कि प्रश्न व्यक्तिगत नहीं है, परिवारिक भी नहीं है। इस पद्धति से सबका अपना-अपना होकर तो प्रश्न बिखर जाता है और शायद तब गँठीला भी उतना नहीं रहता । पर नहीं, प्रश्न का वह रूप निवैंयक्तिक नहीं है । निवैंयक्तिक ही वैज्ञानिक होता है। अतः मोर्चा असल वह है जो निवैंयक्तिक है। सामाजिक है, सार्वजनिक है । इसलिए वह राजनीतिक और तात्त्विक है।

 

       निस्संदेह दिमाग पर वहाँ तक जाने में जोर पड़ता है जहाँ रोटी का मोर्चा इस कदर क्रांतिकारी है कि स्थूल रोटी का वास्ता उससे नहीं रहता, खालिस मोर्चा ही मानो रह जाता है। जोर पड़ता है इसी से वह महत्त्वपूर्ण है ।

 

       उस रोटी को जानना आसान है जो गेहूँ से बनती है, बनाने में जिसके तरह-तरह की मेहनत लगती है और जो भूख भरती है। पर वह रोटी, जिसका सम्बन्ध न तो गेहूँ से है, न श्रम से है, बाल्कि सीधा सम्बन्ध क्रांति से और मोर्चें से है, इतनी गहन और सूक्ष्म हो जाती है कि उसे मुट्ठी में लेना और पेट में डालना सम्भव नहीं हो पाता । यह दिमाग की चीज़ मालूम होती है । अगर वह किसी की भूख मिटाती या बढ़ाती है तो शायद दिमागवाले के दिमाग की ही ।

 

       रोटी का मोर्चा इस तरह उनका नहीं मालूम होता जो पेट के भूखे हैं, वह उनका है जो भूखे दिमाग के हैं । वह मोर्चा दिमागियों का है।

 

       एक मन्दिर के द्वार पर अक्सर देखते हैं कि भूखमरों की पाँत लगी है। भूखों को पाँत में लाना छोटी बात नहीं है। उसके लिए भीड़ और गिन-गिनकर ही उन्हें दे सकते हैं, हो-हल्ला पसन्द नहीं करते, तरतीब पसन्द करते हैं । इसलिए एक को एक ही रोटी मिले, यह सुभीता अपनी ओर से लालाजी को देने के लिए भुखमरों ने पाँत बाँधना सीख लिया हूँ । जब तक पक्ति है, तब तक शायद मोर्चे का पूरा मजा हमको उस दृश्य में नही दीखेगा । पर बहुधा पाँत टूट जाती है और छीन-झपट चल पड़ती है। रोटी के मोर्चें का चित्र उससे हू-व-हू और कहाँ मिलेगा, मैं जानता नहीं हूँ ।

 

       रोटी को चौके से तोड़ लीजिये और मोर्चे से जोड़ दीजिये । चौके से जुड़कर वह श्रम की और व्यवस्था की वस्तु हो जाती है। लेकिन इसमें मोर्चे की हानि है। क्रांति मोर्चे के सिवाय कहीं और से नहीं निकलती है। इससे रोटी के सवाल को श्रम से जोड़ना खतरनाक है। यों रोटी बनेगा पर मोर्चा टूटेगा। मोर्चे को मजबूत रखने के लिए वह नहीं होने देता होगा। इसलिए भूख की बात को इतना ऊँचा उठाना होगा कि भूख का काम हो ही न सके । कोलाहल में शक्ति है, भूख है, तभी तक कोलाहल की प्रवृत्ति है, भूख मिटने पर शोर मचाने का चाव धीमा हो सकती है। इसलिए बौद्धिक का यह कभी कर्तव्य नहीं है कि श्रम करे या श्रम करावे । उसका कर्तव्य इससे कम नहीं हो सकता कि वह क्रांति करे और क्रांति कराये ।  कारण,  वह बौद्धिक  है, दूर की सोचता है, सुक्ष्म को पकड़ता है । भूख में से क्रांतिकारी शक्ति जगाने का जो काम है वह उसका है । उसके लेखे क्या बुरा हो कि भूख बढ़े । पेट की आग को राजनीति की आग बनाना उतना कठिन नही होगा । उस आग के जोर से ध्वंस होगा और उससे तख्ता उलट-पलट होगा । तब नये राज्य को होना होगा । और वह नया राज किनका होगा ?  सिवाय उनके और किनका, जिन्होंने मोर्चो बाँधा था और जिन्होंने मोर्चो से कम का कोई काम नहीं किया था । बौद्धिक की बुद्धि आसपास क्यों रहे;  वह शक्ति से स्त्रोत, उसके द्वारा विश्व का इतिहास, उसकी राजनीति और उसका अर्थशास्त्र उसने व्यर्थ ही नहीं पड़ा । बेपढ़ा रहता तो कदाचित् श्रमिक उसे बनना पड़ भी सकता था । पढ़-लिखकर भोला किसान मजदूर बनेगा ही क्यों । धनिक न बन सका, तो धनिक का दुश्मन बनना तो उतना असम्भव कार्य नहीं है । उस पद्धति से एक दिन धनिक के सिर पर प्रभु बनकर बैठने की तरकीब निकल आ सकती है । बौद्धिक बनकर, बुद्धि पैनाकर वह इतना भी नहीं कर सका, तो उससे और क्या की जा सकती  है ? नहीं, वह प्रचार करेगा संगठन करेगा और क्रांति करके ही छोड़ेगा । श्रमिक की ओर से उसकी सहानुभूति में बौद्धिक वर्ग को ही तो नये राज्य का अधिनायकत्व सम्हालना होगा । उसके लिए खुद रोटी से ज्यादे रोटी के मोर्चे पर आँख रखनी होगी।

 

            मैं मानता हूँ कि रोटी के मोर्चो पर संस्कृति नहीं चाहिए, संस्कृति का गीत नहीं चाहिए । मेरे विचार में  वहाँ रोटी का श्रम भी उतना नहीं चाहिए । वहाँ मोर्चा चाहिए, गीत भी मोर्चे का ही चाहिए ।  और मोर्चे को चेताने के लिए रोटी से ज्यादे उसका अभाव चाहिए । वहाँ तीखी और बाँकी राजनीति चाहिए । रोटी के लिए प्लान बन सकते हैं, स्कीमें बन सकती हैं, लेक्चर बन सकते हैं और मार्च-कूच के नक्शे बन सकते हैं । क्योंकि इन सबकी मोर्चे से संगति और स्वयं रोटी से सगति नहीं है ।

 

       रोटी के मोर्चे मुझे इस तरह दो ही दिखाई देते हैं । घर-घर और उस के लिए मेहनत हो रही है, अनाज उगाया जा रहा है, चक्की पीसी जा रही है, वह तो ठंडे श्रम की बात है । इसलिए वह तो मोर्चे के नाम पर उतनी विचारणीय नहीं है । उसके लिए विचार से अधिक लगन और बात से अधिक काम चाहिए। उसके लिए राज की बात करने और राज की चाह करने से अधिक स्वयं कम में काम चला लेने ओर अधिक-से-अधिक उपजाने की दरकार होगी । इससे उसमें मोर्चा कम बनेगा, काम अधिक बन चलेगा । अतः उसकी बात वृथा है । मोर्चे असल में दो हैः(1) जो पर उपकारी है, (2) जिसके ऊपर क्रांतिकारी है ।

 

       1. उपकारी रोटी का सफल मोर्चा बना पाता है । हो यह भी सकता था कि भिखारी भिखारी न रहता, वह नागरिक होता और अपने हक और श्रम में से रोटी पा जाता । उपकारी उस सम्भावना पर जाना नहीं चाहता । रोटी के लिए उसके आगे हाथ पसारनेवाले नहीं होंगे, तो वह रोटी बाँटने का काम कैसे कर सकेगा ?   वह काम तो अच्छा है न । इससे उसको तसल्ली मिलती है । स्वयं तो उसे भोग और आराम में रहना पड़ता है । इस काम में लगता है कि वह धर्म कर रहा है । धर्म का अवसर खोने की बात उस भावनाशील के मन में क्यों आने लगा । इसलिए उसका मुख्य लाभ यह नहीं है कि भुखे को रोटी मिल जाय, उसमें यह भी शामिल है कि उसके अपने हाथों से बँटकर वह रोटी उनके मिले । वह घन के रुप में उनसे खींचता है, फिर दान के रुप में वही इन्हें देता है । इसमें लाभ यह होता है कि मोर्चो पैदा होता है । प्रकृति से जो दो आदमी थे, इस व्यवस्था से एक उनमें दानी और दूसरा दयनीय बनता है । अमीर और गरीब का लोप होने से मोर्चे का मजा कम न हो जायगा ?

 

       2. दूसरा  मोर्चा जो उससे बड़ा है राजनीतिक विचारक और क्रांति के कर्मचारी की कला सृष्टि है । ए भूखे लोगो, तुम भूखे हो न ? आओ मैं तुम्हें स्वर्ग की बात बताता हूँ । वहाँ रोटी ही नहीं है, मन चाहा सब कुछ है ।..... वह देखो ...दीखा ? उसके लिए, बोलो, कुछ करोगे ? तो आओ, मुझे वोट दो । ....ओ प्रतिपक्षी,? सुन, मेरी वोट भूखे की रोटी की वोट है, जबकि मेरा बेईमानी की। ...वह अवश्य चाहता है कि सब को रोटी मिले, लेकिन उसके अपने हाथों से बँटकर मिले । अपनी जगह पर अपनी मेहनत से हर कोई अगर अपनी रोटी कमा लेगा तो इस तरह राजनीतिक शक्ति के एकत्र होने का अवसर कैसे आयेगा । वोट के रास्ते से पहले सबकी रोटी एकत्र करके अपने पास करली जाय; तब फिर उनको बराबर-बराबर बाँटने का काम हम कर ही लेंगे । ऐसे पार्टी स्टेट के माध्यम से सब में एकता रहेगी और रोटी केन्द्र में बँटी होने के कारण समता भी सब जगह समतल रहेगी । रोटी अपने हाथ से दूसरे को दी जाय, इसका स्वाद एक अलग ही चीज है। सबको सहजभाव से रोटी मिलते जाने से वह स्वाद पूरा नहीं हो पाता, इसके लिए मोर्चा बनाना जरूरी होता है। जिसको कहते है राष्ट्रीयकरण, सरकारीकरण, वह बहुत कुछ यही मोर्चाबन्दी है। दस हजार मिल-मजदूर क्लर्क एक सरकार से रोजी पाते हैं । लाखों-करोड़ों प्रजाजन शासनासन पर बैठे राजन्य जनों की कृपा से साँस लेते और पेट पालते हैं । इस अधिकार-भोग का सुभीता मोर्चा खड़ा किये बिना कैसे बन सकता है। इससे ऐ नागरिको ! पार्टी अनुशासन में पाँत बनाकर बैठो । नम्बर आये तब अपना नाम बोलना और वोट देना । उसके बाद तुम्हारी तरफ से हम जायेंगे और सब रोटी जहाँ जमा हैं, वहाँ से लाकर बराबर-बराबर तुम में बाँट देंगे । जानते हो तुम क्यों भूखे हो ? क्योंकि अव्वल तो एक रोटियों का ढेर नहीं है। कुछ अपने चौके चलाते हैं । रोटी, जो किसी की निजी सम्पत्ति है, वही तो मुसीबत है। तुम हमें मौका दो कि ठीनकर पहले सबकी रोटियों का एक बड़ा ढेर लगा दें, फिर देखना कि हम सबको पूरी तरह पेट भरकर देते हैं कि नहीं । पर सावधान ! हम ही हैं जो तुम्हारा पेट भरेंगे । उस अधिकार की जगह कहीं दूसरों कों पहुँचने दिया तो गजब ही हो जायगा ।'

 

       यह रोटी का दूसरा मोर्चा उसके हाथ नहीं है जिसके हाथ में पकी-पकाई रोटी है । यह उसके पार है जिनके हाथ खाली हैं, जिससे जिनके पार रोटी के बड़े वायदे और नक्शे हैं । वायदे छोटे की वजह नहीं है, इससे मोर्चा भी बड़ा है। धन की कूत हो सकती है, आशाएँ अकूत हैं । इसलिए आशाओं पर भूख को और भूखों को पालने वालों का रोटी का यह मोर्चा सचमुच ही, उपकारियों के मोर्चे से बहुत जबर्दस्त और ताकतवर होता है।

 

       इन दोनों से बाहर तीसरे मोर्चे की मुझे खबर नहीं है । तीसरे जन शायद वे हैं जिन्हें रोटी के लिए सहयोग और श्रम करना पड़ता है। तीसरे इसलिए कि कोलाहल में भूख और भूखों के नाम पर पेटभरों के जो दो पक्ष सामने आते हैं, मोर्चाबन्द तौर पर वे ही सामने दिखाई देते हैं । असल भूख और असल रोटी की उपज और माँग के लोग तो वोट में पड़कर तीसरे बनने को ही रह जाते है । वे मोर्चा नहीं रोटी चाहते हैं और अपने श्रम में से रोटी निकालने में उन्हें कोई आपति नहीं है। वे शब्द के नहीं श्रम के लोग हैं, नेता जाति के नहीं जनता-बिरादरी के है।

 

       अतः प्रश्न मोर्चे का नहीं है। प्रश्न यह है कि बिना मोर्चे सीधे सात्विक श्रम में से रोटी मिलना क्या सम्भव न बन सकेगा ?

 

       निश्चय ही रोटी अगर मोर्चाबन्दी में से मिलती है तो श्रम का शोषण कभी समाप्त न होगा। तब चालाक ही होंगे जो श्रमिक का पेट भरनेवाले बनकर उन पर हूकूमत जमायेंगे । अगर शोषण को मिटाना है तो जीवन में श्रम को अपना स्थान पाना होगा और मोर्चावादियों को मोर्चे छुड़ाकर असल काम में लगाना होगा।

       राजनीति की लफ्फाजी गूँगे और अनपढ़ मेहनती को कब तक भरमाती और बहकाती रहेगी ? क्या मोर्चा सुलगा कर उस पर अपनी रोटी पकानेवालों के लिए इंधन बनना ही जनता का काम रहता चला जायगा?

 

       समय है कि राजनीति का भूत हम पर से उतरे । सब दल सोचते हैं कि सत्ता आ भर जाय हमारे हाथ में एक बार, तो बस हम यह और वह करके धरती पर स्वर्ग चुटकियों में ला बिठायेंगे । ऐसे उटोपियोंके पीछे चलाकर शब्दवादियों ने जगत् में त्राहि-त्राहि  मचा दी है।

 

       बस यही संस्कृति की संगति है। राजनीतिक क्या शिकारी ही रहेगा ? वह संस्कारी न बनेगा ? अपनी वासनाओं को वह खुली छुट ही देगा कि उन्हें लगाम भी देना वह जानेगा । सच यह है कि संस्कृति के सिवा यह किसी और का काम नहीं है कि होड़बाजों और स्पर्द्धावादियों के गिरोहों और मोर्चों के बीच वह उस निरीह मानव की प्रतिष्ठा करे जिसके पास स्नेह का हृदय और काम-काज के हाथ हैं । मानव-व्यक्तित्व और मानव-श्रम की प्रतिष्ठा यदि संसकृति की ओर से ही नहीं आयेगीं, तो फिर किस ओर से उसकी आशा की जा सकती है? मतवादों और राष्ट्रवादों के दर्पोद्धत उन्मादों के बीच मानव को और मानव-जाति को भुनते-मरते ही नहीं रहना है। इसीलिए कहीं कोई और मोर्चा नहीं है, मानव-व्यक्ति स्वयं ही वह मोर्चा है और रचनात्मक और सर्जनात्मक सब शक्तियों को वहाँ ही लगना है । शेष व्यर्थताओं पर कान न देकर एक मानव पर टेक रखनेवाली श्रद्धा का नाम संस्कृति है। उसके सिवा संस्कृति भी और कहीं नहीं है। और कहीं यदि उसकी दुहाई है तो मान लीजिये कि वह उस ओढ़न में इस या उस तरह की दलबन्दी ही है।

 

       मूल में सांस्कृतिक आधार के बिना रोटी के मोर्चे सिर्फ ताकत हथियाने और अस्त्र-शस्त्र बढ़ाने के साधन होंगे । तब सिर्फ दो कौमें होती जायेंगी; एक जो खायेगी और जो हुकूमत करेगी, दूसरी जो उपजायेगी और भूखी रहेगी । सरकारों के बजट का असल भाग फौज, युद्ध और बचाव के लिए होगा और बनाना नहीं बिगाड़ना बड़ा काम होगा । वह रंक होगा जो बनाता, उपजाता है, राजा वह होगा जो बिगाड़ता और लुटाता है। संस्कृति की सावधानी के अभाव में शिकारी हमें आदर्श होगा और श्रमिक हमारे लिए नगण्य । मोर्चें की बातें जाने-अनजाने वही दिन लायेगी । संस्कृति की तत्परता शायद उसे बचा सके ।

 

 

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