रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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प्रवासी-कवि

 

 

द्मेश गुप्त

 

       जन्म- 5 जनवरी 1965, लखनऊ, उत्तरप्रदेश । शिक्षा- लामार्टीनियर कॉलेज, क्रिश्च्यन कॉलेज एवं लखनऊ विश्वविद्यालय, इंस्टीट्यूट ऑफ रूर बैतराँ ड्यूपाँ, फ्राँस में केमिकल इंजीनियरिंग का अध्ययन एवं कॉस्मेटिक इंडस्ट्रीज पर शोध । हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से पत्रकारिता तथा साहित्यरत्न । फैडरिक टेलर अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, अमेरिका से एमबीए, आईटी में में पीएच.ड़ी की उपाधि । उपलब्धियाँ- 15 वर्ष की आयू में बुद्धिस्ट एजुकेशनल सोसायटी के तत्वाधान में श्रीलंका की यात्रा, अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, 1993, मैनचैस्टर में दो सत्रों की सहअध्यक्षता । 1993 से 1995 तक प्रतिवर्ष यू.के. अंतरराष्ट्रीय हिंदी कवि सम्मेलन का संयोजन । 7वें विश्व हिंदी सम्मेलन, 2003,सूरिनाम में सहभागिता । लंदन में हिदी पत्र का 5 वर्षों तक संपादन । द्वितीय अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, 1997, यू.के. का संयोजन । छठवें विश्व हिंदी सम्मेलन, 1999, यू.के. का संयोजन । तृतीय अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, 2003, लंदन का संयोजकत्व । संबंद्धता- संपादक, प्रवासी टाइम्स । संस्थापक एवं अध्यक्ष, यू.के. हिंदी समिति । मुख्य संपादक एवं प्रकाशक, पुरवाई(यू.के. में एकमात्र हिंदी पत्रिका) संयोजक, यूरोपियन हिंदी समिति । संरक्षक, कृति यू.के., बर्मिंघम । अध्यक्ष, ऑक्सफोर्ड बिजनेस कॉलेज एवं स्कूल ऑफ एशियन पर्फामिंग आर्टस् । काव्य संग्रह-आकृति, सागर का पंछी । दूर के बाग में सोंधी मिट्टी (यू.के. के हिंदी कवियों का संग्रह) सम्मान-एनआरआई मदर इंडिया इंटरनेशनल अवार्ड-92, ताज महोत्सव सम्मान-1997, विदेश में हिंदी प्रचार हेतु सम्मान-2000,उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, अक्षरम् (दिल्ली)द्वारा सम्मान-2003,

  

संपर्क-130 Pavilion Way, Ruislip Mddx. London HA4 9JP U.K.

Tel: 00 44 20 8866 6521/7956 562805 Fax: 0044 20 8866 7844

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दोहरी नागरिकता

एक नए स्वप्न में जी रहे हैं

आजकल कृष्ण,

किसी ने उनसे कहा है

कि अब वे

दोनों के साथ रह सकते हैं

यशोदाके भी और देवकी के भी !

अब उन्हें नहीं

देना पड़ेगा तौल कर

इस प्रश्न का उत्तर

कि वे किससे अधिक प्रेम करते हैं

यशोदा से, या फिर देवकी से !

उतारना चाहते हैं वे कोख का कर्ज़

निभाना चाहते हैं कुछ फ़र्ज

देवकी के गाँव पर

बिना छोड़े यशोदा की अँगूली

जिसे पकड़ कर

आ खड़े हैं कृष्ण

अपने पाँव पर ।

मुक्त हो जाएँगे अब वे

तन और मन के बँटवारे से,

नहीं उठेंगे

अब उनकी निष्ठा पर कोई सवाल,

नहीं कहलाए जाएँगे

वे अपनो के बीच पराए,

सिर्फ भाव, शब्द या इतिहास ही नहीं

दे सकेंगे वे

कुछ अधिकार भी

जन्मभूमि के

विरासत में,

चल सकेंगे

दोनों माँओं

के हाथों को थामकर अब कृष्ण ।

 

इस नए स्वप्न में

दोहरी नागरिकता के

जी रहे हैं आज

विश्व के कोने-कोने में फैले हुए

भारत के कृष्ण

 

गेहूँ का रंग

 

कल लंदन की एक गली में

मेरे पिता से

वृद्ध दिखने वाले पर

उछालता हुआ

बियर का कैन

निकल गया कोई अंग्रेज ।

 

पहले मन में आया

कि भिड जाऊं उस गोरे से

फिर देख कर

सहमी-सी लकीर

उस वृद्ध के चेहरे पर

मैंने थाम लिया उनका हाथ

और महसूस किया

उस स्पर्श से

उनके कदमों की

बढ़ती हुई शक्ति को ।

 

वे बोले, कहाँ से हो?”

मैंने कहा, लखनऊसे और आप ?

वे बोले, लाहौरसे !

तब से

आने लगी है मुझे

हर गेहुँए

गेहूँ के रंग में

अपने परिवार की महक ।

 

सच्चाई

 

स्टेशन पर

बिलख-बिलख कर

रोने लगा

जब मेरा बटुआ चुराते हुए

मैंने पकड़ लिया

उस बच्चे को

वह मुझे चोर-चोर कहने लगा

मैंने उससे माफ़ी माँगी और

सौ का नोट देते हुए

बढ़ गया रेल की ओर

मैं बरदाश्त नहीं कर पाया

उसकी आँखों से चीखती-चिल्लाती

सच्चाई

और सामने आ गए मेरे

उसके पूर्वजों के

वो हज़ारों अँगूठों के निशान

जो आज भी

बड़ी किफ़ायत से

दफ़न है

पूँजीपतियों के

लॉकरों में ।

 

 

 

 

प्रवासी-कवि

 खाली मस्तिष्क शैतान का कारख़ाना बन जाता है - महात्मा गाँधी

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