
ज़किया ज़ुबैरी
ज़किया ज़ुबैरी का
जन्म
वाजिद अली शाह के शहर अवध में (लखनऊ) उस वर्ष हुआ जब गांधी जी
ने अंग्रेज़ो भारत छोड़ो आन्दोलन की शुरूआत की थी। ज़किया जी की
स्कूल और कॉलेज के पढ़ाई आज़मगढ़ और इलाहाबाद में हुई। उन्होंने
स्नातक की डिग्री बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राप्त की।
ज़किया जी को बचपन से ही पेंटिंग, कविता एवं कहानी से लगाव था।
लंदन में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के माध्यम से ज़किया ज़ुबैरी
हिन्दी, उर्दू एवं अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं के साहित्य एवं
संस्कृति की प्रगति के लिये कार्य करती हैं। इनकी संस्था संगीत,
साहित्य एवं संस्क़ति से जुड़े कार्यक्रमों का निरंतर आयोजन करती
रहती है। ज़किया ज़ुबैरी हिन्दी एवं उर्दू, दोनो भाषाओं में समान
अधिकार से कविता एवं कहानियां लिखती हैं। एम.क्यू.एम. की सक्रिय
सदस्य होने के अतिरिक्त, आजकल व् लंदन के बरॉ-ऑफ़-बारनेट से लेबर
पार्टी के काउन्सलर के पद पर कार्यरत हैं।
संपर्क :
115, The Reddings, Mill Hill, London NW7 4JP (UK)
ई-मेल
:
zakiaz@aol.com

ये नज़दीकियाँ
तुम से बिछड़ कर फिर
ओढ़ कर तन्हाई की चादर अपनी
जो मैं चली
तो सो चुके थे
दरख़्तों के साये
और सितारे भी
तकते-तकते राह
ढल चुकी थी
चाँद की आख़िरी किरणें भी
छत की मुंडेरों पे
दम तोड़ चुकी थीं।
मैं चली तो, मगर
तुम्हारा व्यक्तित्व, मेरा ध्यान
तुम्हारा प्रेम, मेरे प्राण
मेरे होठों की चमकती लाली
मेरे गालों का छलकता-सा गुलाल
भीगी आँखों से मेरी बहता काजल
इक अनूठे सौंदर्य का आकर्षण
हवाले है, तुम्हारी नज़दीकियों के।
टूटी हुई हस्ती का वज़ूद...
माला के जो मनके,
टूट कर बिखर जाते हैं
और उनमें से जो एक
छिप जाता है कहीं, चुपके से
गुम हो जाता है।
और उस इक मनके के बिछड़ जाने से
लुट सा जाता है माला का अपना वज़ूद।
तुम ही बताओ
जब तुम हुए मेरी हस्ती से जुदा
क्या ख़ुशियों ने लगाया है तुम्हें गले?
शोख़ झ़ोंकों ने हवा के
कभी चूमा है तुम्हें?
और क्या
तारों भरी रात ने
जाना है तुम्हें?
खो गये तुम तो केवल
जीवन के हंगामों में
और मैं
एक टूटी हुई माला की तरह
यूं थकी हारी सी बिखर जाती हूं
जिसका नहीं है कोई
पूरे संसार में
अपनी टूटी हुई हस्ती का वज़ूद!
अपनी टूटी हुई हस्ती का वज़ूद!
मन है मंदिर
जब धूप चमकती निकली हो
और ठण्डी हवा भी चलती हो
फूलों की महक भी फैली हो
और धानी चुनरिया उड़ती हो
बगिया में तिपाई रखी हो
और प्याली से चाय छलकती हो
धढ़कन भी घटती बढ़ती हो
फिर छाया तुम्हारी दिखती हो
पुरवइया के हर झोंके से
बस ख़ुश्बू तुम्हारी आती हो
और गोरी रास्ता तकती हो
यादों को लपेटे बैठी हो
ऐसे में अचानक गूंज उटे
मन है मन्दिर, प्रेम है भक्ति
!
मन है मन्दिर, प्रेम है भक्ति
!
मैं तोड़ के जग के नाते सभी
सजदे में झुकूँ और रोने लगूँ
यूं ख़ुद को तुम में खोने लगूँ।