
उषाराजे सक्सेना
गोरखपुर,
उत्तर प्रदेश में जन्मी,
विगत चार दशक से इंग्लैंड में प्रवासी भारतीय के रूप में जीवनयापन
करनेवाली,
कवियित्री,
कहानीकार उषाराजे सक्सेना ने ब्रिटेन में हिंदी की गतिविधियों पर
निरंतर सक्रियतथा
स्वतंत्र-लेखन ।
उषा जी केवल अप्रवासी भारतीयों पर ही कलम नहीं चलातीं वे अन्य
देशीय प्रवासियों के साथ ब्रिटिश मूल के लोगो के जीवन में भी
झाँकती हुई बेबाकी और सहजता से कहानियाँ और लेख लिखती हैं। विभिन्न
शिक्षण संस्थाओं में शिक्षण कार्य
।
लंदन बारो ऑफ़ मर्टन के पाठयक्रम का हिंदी अनुवाद तथा पाठयक्रम की
सहायक पुस्तकों की रचना।
आपकी रचनाएं
जापान के ओसाका विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में
सम्मिलित हैं। कहानियों का अंगरेज़ी तथा भारतीय भाषाओं में अनुवाद।
कृतियाँ-काव्य-संग्रह-
'विश्वास
की रजत सीपियाँ'-इंद्रप्रस्थ प्रकाशन-
दिल्ली- 1976, 'इंद्रधनुष
की तलाश में'-इंद्रप्रस्थ
प्रकाशन- दिल्ली-1997,कहानी
संकलन- 'मिट्टी की
सुगंध-(संपादन)-राधा-कृष्ण प्रकाशन-दिल्ली 1999,(ब्रिटेन
के कथाकारों का प्रथम कहानी संकलन),'प्रवास
में'- प्रभात प्रकाशन दिल्ली
2002, 'वाकिंग पार्टनर'-
राधाकृष्ण प्रकाशन- दिल्ली 2004,निबंध-'ब्रिटेन
में हिंदी'-मेधा बुक्स-दिल्ली
2006
सम्मान-'हिन्दी
विदेश प्रसार साहित्य सम्मान सेवा'-2001
में हिंदी संस्थान लखनऊ- उत्तर प्रदेश
'कथा
यूक़े'-'पद्मानंद
साहित्य सम्मान'
कहानी संग्रह
'वाकिंग
पार्टनर'
2005
।
संपादन-
सह-संपादक-
'पुरवाई'
संपर्क: 54, Hill Road,
Mitcham, Surrey CR4 2HQ, UK,
Email-
usharajesaxena@hotmail.com
तथा usharajesaxena@gmail.com
Tel.( 00 44 ) (0) 208 640 8328

पृथ्वी सपाट होती जा रही है....
कभी-कभी
लगता है,
बंद दरवाज़ों के अंदर
लंबी और उदास रातें,
करवट बदल रही हैं।
बाहर,
हवा के रुख़ में बेचैनी, और
तिलमिलाहट है।
सूखती झीलों और नदियों में
दम तोड़ती मछलियाँ
कुछ और साँसें चाहती हैं।
तमाम कटे वृक्षों की
मृत होती जड़ें,
कुछ और जीना चाहती हैं।
नुचे हुए पंखोंवाली
मासूम मुर्गाबियाँ
बिखरी हुई आस्थाओं के बीच,
जीने का
भरसक प्रयास कर रही हैं।
लगता है
तमाम आँखें
बदरंग और लुटे हुए सपनों को
पलकों में बंद करने की कोशिश में
बीनाई खोती जा रही हैं।
लगातार बढ़ता हुआ आदमियों का हजूम
सूत की लछियों-सी दिनों-दिन
सिकुड़ती सड़कें,
पैरों में लिपटती जा रही हैं
और
पृथ्वी असहाय और सपाट होती जा रही है.....
क्या होगा पृथ्वी का?......
आज नहीं,
जब मैं छोटी थी,
माँ कहती थी,
अतृप्त आकाँक्षाओंवाले
अकाल मृत्यु पा
अदृशय, तृषित, अशरीर
वायुमंडल में
भूत बन भटकते हैं।
देखती हूँ,
आज सब ओर
आकांक्षाओं के
रीते कटोरे लिए
देहधारी, क्षुधित,
अतृप्त आत्माएँ
स्वांग भरे
टहल रही हैं
आश्चर्य है
उन्हें शांत करने के लिए
आज
कोई भी जादू-टोना या टोटका
किसी पीर-मुल्ला या पंडित-ओझा के पास नहीं है
क्या होगा पृथ्वी का.....
क्यों नहीं रहने देते मुझे अपने जैसा..
साँस भर हवा,
एक टुकड़ा रोटी।
सोने के लिए दो गज़ ज़मीन
तुम्हें भी चाहिए और मुझे भी
तुम पूरी क्यों झपटना चाहते हो
आओ, ज़रा मेरे पास बैठो
यूँ ही शाँत जल में कंकरियाँ मत फेंको
मेरी आखों के आईने में झाँककर देखो
उनमें तुम्हारी ही आकांक्षकओं का प्रतिबिंब है।
मेरा जिस्म
तुम्हारी ही जिस्म की तरह
मांस-मज्जा से बना
नाज़ुक जज़्बातो भरा है।
मेरा नन्हा बेटा
जो कबूतर को दाना चुगते देख
तालियाँ बजा रहा है,
तुम्हारे बेटे जैसा हँसता&f[kyf[kykrk
है।
मेरी माँ तुम्हारी माँ की तरह
रोज़ अल-सुबह
मेरे उमरेदराज़ के लिए
मन्नते माँगती है।
मेरी पत्नी,
तुम्हारी पत्नी की तरह
नेक और ईश्वर से आस्था रखनेवाली
सब कुछ तो है हमारा तुम्हरे जैसा
फिर क्यों तुम हमेशा मेरा
सबकुछ झपटने की फिराक में लगे रहते हो.....
