रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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प्रवासी-कवि

 

शैल अग्रवाल

जन्म- 21 जनवरी 1947, भारत की सांस्कृतिक नगरी वाराणासी में । शिक्षा- संस्कृत, चित्रकला में स्नातक, अंगरेज़ी साहित्य में एम.ए । अभिरूचि-दर्शन एवं कला साथ ही जीवन-मृत्यु व अंतराल का सर्वस्व । लेखन-कहानी, कविता, लेख व नाटक । प्रकाशन- कुछ पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में। कृतियाँ- समिधा (काव्य), ध्रुवतारा (कहानी)

 

संप्रति- ब्रिटेन में जीवन से संलग्न होकर निरंतर लेखन

 

 

कोहरा

 

घर, खेत, सड़क, पहाड़

किनारों तक सरक कर

समुद्र में

कूदने को तैयार

एक आजाद पक्षी

अपने ही पँखों के

विस्तार में भटका

पहचान ढ़ूँढ़ता

जाने कब खोल पाए

आकाश के ढक्कन से

ढकी धरती की

बंद यह डिबिया

 

बीज और वृक्ष

 

मन की इस धरती पर

एक छाँव की तलाश में

इस नन्हें पौधे के वृक्ष बनने तक

इसकी हवा, पानी, खाद

सब कुछ मैं ही तो हूँ

क्योंकि

मेरे अपने रूप

 

आँच

 

मोमबत्ती यह

कब से जल रही है

सिहर-सिहर कर

पिघल रही है और

पिघल-पिघल कर

अँधेरों से लड़ रही है

डरना स्वाभाविक है

अँधेरा घना है

लड़ना जरूरी है

सबकुछ निगलने की

ज़िद पर जो अड़ा है

पिघलने दो इसे पर

दिल इसका आज भी

मोम का ही बना है

वैसे भी

पिघलते हैं जो

वे ही तो अपनी

आँच में जलते हैं

पिघलते हैं जो

वे ही तो

अँधेरों से

लड़ सकते हैं

 

 

 

 

प्रवासी-कवि

 भाग्य जिसे प्यार करता है, उसे मूर्ख बना देता है - बेकन

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