
ब्रिटेन की हिंदी कविता-
तेजेन्द्र शर्मा

ब्रिटेन
में हिन्दी कविता गतिमान है। इस समय सत्येन्द्र श्रीवास्तव,
गौतम सचदेव, प्राण शर्मा, सोहन राही, डा. कृष्ण कुमार जैसी
वरिष्ठ पीढ़ी के कवि भी सक्रिय रूप से रचनाएं लिख रहे
हैं, तो एक मध्य पीढ़ी जिसमें उषा राजे सक्सेना, उषा वर्मा,
शैल अग्रवाल एवं दिव्या माथुर जैसे कवि शामिल हैं अपनी
उपस्थिति का अहसास दिला रही है। पद्मेश गुप्त एवं मोहन राणा की
युवा पीढ़ी भी विश्व भर में अपनी कविता का परचम फहरा रहे हैं।
यह ठीक है कि ब्रिटेन में हिन्दी कविता एक लम्बे अर्से से लिखी
जा रही है, किन्तु क्या हम इसे ब्रिटेन की कविता कह सकते हैं?
ब्रिटेन की कविता कहलाने के लिये यह आवश्यक होगा कि इन कविताओं
में ब्रिटेन के सरोकार दिखाई दें। और इसके लिये आवश्यक है कि
कवि अपने आपको ब्रिटेन का हिस्सा समझे और यहां के सामाजिक,
सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिवेश के साथ संबंध स्थापित करे।
यहां ऐसे भी कवि हैं जो कि चालीस वर्षों से इस देश में रह रहे
हैं और लिख भी रहे हैं। किन्तु ब्रिटेन उनके लेखन में कहीं
दिखाई नहीं देता। यहाँ के मौसम, रिवाज, राजनीति, कुछ भी उनकी
कविताओं में घुसपैट नहीं कर पाते। वैसे मेरा अपना प्रयास यही
रहता है कि मेरी रचनाओं में ब्रिटेन का जीवन किसी न किसी रूप
में अवश्य दिखाई दे। फिर चाहे मैं ग़ज़ल लिखूँ, व्यंग्य या फिर
कविता, मैं अपने आपको यहां के जीवन से अलग नहीं कर पाता।
ठीक भारत की ही तरह, ब्रिटेन में भी अलग अलग स्वाद और पहचान की
कविता रची जा रही है। कुछ कवि ऐसे हैं जो अपने अपने सत्य
ढूँढने के प्रयास कर रहे हैं, तो वहीं बहुत से कवि ऐसे हैं जो
कि अपने पाठक एवं श्रोता के साथ संवाद स्थापित करना चाहते हैं।
मोहन राणा का कवि अपने मन की परतों को खोलता उनका विश्लेशण
करता है तो पद्मेश गुप्त का कवि पूरे पाठक वर्ग के साथ अपने
अनुभवों को बाँट लेना चाहता है।
ब्रिटेन में उस प्रकार की मंचीय कविता की रचना नहीं की जाती
जिसे भारत में हेय दृष्टि से देखा जाता है। यहाँ का कवि जैसी
कविता लिखता है, उसे ही मंच पर सुनाता भी है। यहां मंचीय कवि
एवं गंभीर कवि जैसी अलग प्रजातियां अभी तक पनप नहीं पाई हैं।
ठीक भारत ही की तरह ब्रिटेन में भी तुकांत कविता कम दिखाई और
सुनाई पड़ती है। अतुकांत कविता लिखना आसान भी है और उसके कोई
मानदण्ड भी कड़े नहीं है। इसलिये विचार और चिंतन से भरी
कविताएं अधिक लिखी जाती हैं।
प्राण शर्मा, गौतम सचदेव, सोहन राही एवं कुछ हद तक उषा राजे
सक्सेना एवं दिव्या माथुर हिन्दी ग़ज़ल से जुड़े हैं। इनमें
केवल प्राण शर्मा एक अकेले ग़ज़लकार हैं जिनके संपूर्ण हिन्दी
ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सोहन राही मूलत:
उर्दू के ग़ज़लकार हैं जो देवनागरी लिपि में अपनी रचनाएं लिख
लेते हैं। लेकिन वे अपने गीत पूरी तरह से हिन्दी में ही लिखते
हैं। गौतम सचदेव, उषा राजे सक्सेना एवं दिव्या माथुर समय समय
पर ग़ज़ल विधा के साथ प्रयोग करते रहते हैं।
ब्रिटेन में हिन्दी कवियों की ठीक-ठीक संख्या बता पाना संभव
नहीं है। वर्तमान संकलन में ब्रिटेन के सभी हिन्दी कवि शामिल
हैं, ऐसा भी हमारा दावा नहीं है। हमने प्रयास किया कि ब्रिटेन
में लिखी जा रही हिन्दी कविता के प्रतिनिधि हस्ताक्षरों को
आपके सामने प्रस्तुत कर सकें। बहुत से नाम छूट भी गये हैं। एक
तो हम समयबद्ध ढंग से काम कर रहे थे और मित्रों को बस दो एक
बार ही याद दिलवा पाये कि समय निकला जा रहा है। सवाल पूछा जा
सकता है कि यह संकलन क्यों। तो मित्रो इस पर इतना ही कहूंगा कि
हम तो चाहते हैं कि इस देश में रह रहे हिन्दी कवियों के
बेशुमार संकलन निकलते रहें और भारत के लेखकों, कवियों एवं
पाठकों अपनी उपस्थिति का अहसास दिलवाते रहें।
कला ज्योति. लंदन
एवं गीतांजलि बहुभाषीय समुदाय, बर्मिंघम अपने सदस्यों
को कविता लिखने के लिये प्रेरित करते हैं। इन संस्थाओं के
मुखिया श्रीमती पुष्पा भार्गव एवं डा. कृष्ण कुमार के अनथक
प्रयासों से हिन्दी कविता ब्रिटेन में अपने पांव जमा पा रही
है। इन संस्थाओं के कवियों की कविताएं संस्था के नाम के
अंतर्गत दी गई हैं।
इस संकलन की नींव सृजनगाथा वेबज़ीन की
पहल से पड़ी
जब भाई जय प्रकाश मानस जी ने इस योजना के विषय में
प्रस्ताव रखा। फिर
मित्र गिरीश पंकज ने इस प्रक्रिया में सहयोग देना शुरू किया।
भाई जय प्रकाश मानस द्वारा आयोजित प्रथम ऑनलाईन कवि सम्मेलन ने
भी विश्व को एक छोटा गाँव बनाने का काम करते हुए इस योजना को
बल दिया और आज यह संकलन*
आपके सामने है।
* सृजनगाथा डॉट कॉम ने 'यहाँ
से वहाँ तक (टेम्स
नदी के तट से गंगा की कविताएँ)'
नाम से एक कविता संकलन भी प्रकाशित किया है जिसमें इन सभी
कवियों की इन कविताओं के साथ लगभग 125 प्रवासी कविताएँ संमादृत
हैं ।-संपादक
